Delhi protests market loss: दिवाली का त्योहार सिर पर है और यह समय राजधानी के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस (CP) के व्यापारियों के लिए साल की सबसे बंपर कमाई का होता है। लेकिन इस बार बाजारों की रौनक पर विरोध-प्रदर्शनों और ट्रैफिक जाम का ग्रहण लग गया है। रास्तों पर भारी बैरिकेडिंग, जगह-जगह पुलिस के पहरे और जाम के खौफ से ग्राहक बाजार का रुख करने से बच रहे हैं। आलम यह है कि किसी की दुकान पर ताला लटका रहा, किसी की तीन दिन से बोहनी तक नहीं हुई, तो किसी की दैनिक कमाई घटकर आधी रह गई है।
यह पूरी हलचल वोटर लिस्ट में बदलाव यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुई थी। विपक्षी ‘INDIA’ गठबंधन के सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए विरोध मार्च के चलते मध्य दिल्ली के कई इलाकों में आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई। इसका सीधा असर उन छोटे-बड़े दुकानदारों और कामगारों की जेब पर पड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी रोज आने वाले ग्राहकों पर टिकी है।
‘तीन दिन बिल्कुल बिक्री नहीं हुई, किराया और बिल कैसे भरें?’| Delhi protests market loss
कनॉट प्लेस के ई-ब्लॉक में पिछले 15 सालों से चल रही ‘गिगल्स’ गिफ्ट शॉप के संचालक गौरवजीत कोचर का दर्द साफ झलकता है। उन्होंने बताया कि शनिवार और रविवार को हालात ऐसे थे कि दुकान पूरी तरह बंद रखनी पड़ी और सोमवार को जब शटर उठाया तो इक्का-दुक्का लोग ही नजर आए। लोगों के मन में डर था कि सीपी के रास्तों पर लंबा जाम मिलेगा या वे किसी हंगामे के बीच फंस जाएंगे।
कोचर ने मायूस होते हुए कहा, “पिछले तीन दिन कारोबार के लिहाज से बेहद खराब निकले। बिक्री पूरी तरह ठप रही।” गिफ्ट कारोबारियों के लिए दिवाली का समय सबसे अहम होता है, जब आम लोग अपनों के लिए तोहफे खरीदते हैं और कंपनियों से बल्क ऑर्डर मिलते हैं। दुकानदारों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि बिक्री भले शून्य हो, लेकिन भारी-भरकम किराया, कर्मचारियों का वेतन और बिजली का बिल माफ नहीं होता।
कहीं मिठाई बची, तो कहीं वेंडरों को सताया जब्ती का डर
प्रदर्शन का असर अलग-अलग कारोबारों पर अलग दिखा। जहां हल्दीराम जैसे बड़े आउटलेट में काम सामान्य रहा, वहीं काके दा होटल के कर्मचारियों के मुताबिक ग्राहकों की आवाजाही काफी सुस्त रही। स्टेट्समैन हाउस के बाहर गरम गुलाब जामुन, रसगुल्ला और हलवा बेचने वाले एक स्ट्रीट वेंडर ने बताया कि सोमवार को उसका ज्यादातर सामान बिक ही नहीं सका। मिठाइयों की शेल्फ लाइफ कम होती है, ऐसे में माल बचने का सीधा मतलब भारी आर्थिक नुकसान है। जब उनसे आंदोलन पर राय पूछी गई तो उनका सीधा जवाब था— “विरोध सही हो या गलत, यह हम जैसे गरीबों के पेट पर लात मारता है।”
उधर फुटपाथ पर मोबाइल कवर, स्क्रीन गार्ड, मोजे और रूमाल बेचने वाले पटरी दुकानदारों को डर था कि भीड़भाड़ और सख्ती के बीच नगर निगम या पुलिस उनका सामान न समेट ले, जिससे उनकी पूरे दिन की दिहाड़ी मारी जाती।
कैब ड्राइवरों की रोज की कमाई घटकर रह गई 400 रुपये
इस मंदी की आंच सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं रही। सड़कों पर पहिया घुमाकर पेट पालने वाले कैब ड्राइवरों की हालत भी खस्ता हो गई। कैब चालक सुधीश कुमार यादव ने बताया कि जहां सामान्य दिनों में हर 10 से 15 मिनट में एक पैसेंजर मिल जाता था, वहीं अब नई दिल्ली इलाके में एक सवारी के लिए डेढ़-डेढ़ घंटे इंतजार करना पड़ रहा है। पाबंदियों और डायवर्जन के चलते उनकी रोजाना की 1,000 रुपये की कमाई घटकर 400 से 500 रुपये पर सिमट गई है।
राजनीति और मुद्दों से परे, इन तमाम मेहनतकशों के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ दो वक्त की रोटी और त्योहार की खुशियों का है। अब सबकी निगाहें इसी उम्मीद पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में पाबंदियां हटेंगी, ग्राहक फिर से बाजारों में लौटेंगे और दिवाली से पहले धंधा अपनी खोई हुई रफ्तार पकड़ेगा।











































