Akal Takht: 17 सदी की शुरुआत हुई.. दिल्ली पर मुगल बादशाह जहांगीर का शासन था.. तो वहीं दूसरी तरफ सिखों के पांचवे गुरु अर्जनदेव जी सिख धर्म को बढ़ाने के लिए दुनिया में उसका प्रचार कर रहे थे.. 1604 में गुरु अर्जुनदेव जी ने पहले आदिग्रंथ का संकलन पूरा किया था। ये आदिग्रंथ ही आगे चल कर श्री गुरु ग्रंथ साहिब में तब्दील हुआ। इस ग्रंथ में हिंदू संतो और मुसलमान पीरो की वाणियों को संकलित किया गया था, तो वहीं दूसरी तरफ लाहौर का दीवान चंदू शाह ने जहांगीर तक एक झूठी खबर पहुंचाई कि गुरु अर्जनदेव जी आदि ग्रंथ में इस्लाम के खिलाफ बातें लिख रहे है। चंदू शाह गुरु साहिब से उस अपमान का बदला ले रहा था, जब उसने अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव गुरु साहिब के बेटे के लिए भेजा था, लेकिन उन्होंने उससे ये कह कर इंकार कर दिया था कि ईश्वर ने खुद इस रिश्ते से इंकार कर दिया है। जिससे चंदू शाह गुरु साहिब से बदला लेने की साजिश रचने लगा।
अकाल तख्त का इतिहास – History of Akal Takht
जहांगीर ने तुरंत आदेश भिजवाया कि वो आदि ग्रंथ से इस्लाम से जुड़ी बातें हटवा दें, लेकिन गुरु साहिब ने साफ इंकार कर दिया कि आदि ग्रंथ परम पिता परमेश्वर की वाणी है, और उसमें एक भी शब्द में कोई बदलाव नहीं होगा। वहीं राजकुमार खुसरो को भी गुरु साहिब ने शरण दी थी, जिससे जहांगीर औऱ नाराज हो गया था, और उसने 2 लाख रूपय का जुर्माना लगा दिया.. लेकिन गुरु साहिब ने वो भी देने से इंकार कर दिया कि उनके पास जो भी पैसे है वो गुरु घर का धन है औऱ संगत सेवा के लिए है। जहांगीर को जब गुरु साहिब की इस जिद का पता चला उसने तुरंत गुरु साहिब को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। गुरु साहिब को मई 1606 में गोइंदवाला साहिब से गिरफ्तार कर लिया औऱ लाहौर लाया गया। जहां उन्हें बिना खून बहायें तड़पा कर मारने की सजा सुनाई गई। गुरु साहिब को उबलते पानी में बिठा दिया गया, गर्म तवे पर बिठा दिया गया, गर्म रेत में उन्हें डाला गया।
Also Read: फ्लॉप फिल्म का वो गाना जो बन गया अमर, Lag Ja Gale की कहानी सुनकर रह जाएंगे हैरान
अकाल तख्त क्यों बनाया गया?
तमाम यातनाओं के बाद भी वो जपनाम करते रहे.. जिसके बाद रावी नदी में लीन हो गये, और सचखंड चले गए। लेकिन उनके साथ हुए इस अन्याय ने छठे गुरु को हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया.. उन्होंने सबसे पहले जहांगीर को ही चुनौती दी। गुरु गद्दी हासिल करते ही पीरी यानि की आध्यात्मिक शक्ति के साथ साथ मीरी यानि की संसारिक और राजनैतिक अधिकारों को भी संस्थागत बनाया..और 1606 में अमृतसर के हरमंदिर साहिब परिसर के सामने पहले श्री अकाल तख्त की स्थापना की थी। जो कि 12 फीट उंचा बनाया गया था, जिसे खुद बाबा बुड्ढा और भाई गुरदास जी ने बनाया था। ये ऊंचाई दरअसल जहांगीर को चुनौती थी, क्योंकि उस दौरान उसने आदेश जारी किया था कि कोई भी गैर मुसलमान शासक 3 फीट से उंचा सिंहागन नहीं बना सकता था.. लेकिन गुरु साहिब ने 12 फीट का सिंहासग बना कर उसे श्री अकाल तख्त कहा.. जो कि काल के परे ईश्वर का तख्त है।
सिखों के लिए अकाल तख्त ही सबसे बड़ी अदालत
ये प्रतीक था कि सिख किसी के गुलाम नहीं है, उनकी अपनी स्वतंत्र संप्रभुता है.. वो केवल अकाल तख्त के आगे ही सिर झुकायेंगे। यहां गुरु साहिब ने दो तलवारे धारण की थी जो मीरी पीरी को एक साथ जोड़ता है। ये एक आदेश है कि हर सिख के लिए अकाल तख्त ही सबसे बड़ी अदालत है। जिस तरह से छठे गुरु यहां अपनी अदालत लगाते थे, वैसे ही सिख धर्म को मानने वाले हर एक सख्श के लिए अकाल तख्त का आदेश ही सर्वोपरि होगा। अकाल तख्त के आगे कोई सीएम, कोई राजा, कोई नेता बड़ा नहीं है.. सबको अकाल तख्त का आदेश मानना ही होगा। संसार की कोई वस्तु, कोई व्यक्ति अकाल तख्त से उंचा नहीं है। आज के समय में 5 अकाल तख्त है, और उनके आदेशों को ही सिखों के लिए सर्वोपरि माना जाता है।










































