Bhai Himmat Singh: एक 17 साल का युवक.. जो कि उड़ीसा के जगन्नाथपुरी में जल वाहको के एक निम्न जाति झीवर समुदाय में जन्मा था.. पिता गुलजारी और माता धन्नों किसी तरह से अपने बच्चे को पाल कर बुढापे का सहारा बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनके बच्चे का जन्म एक महान कार्य के लिए हुआ.. जो उस धर्म की मजबूत नींव बनने वाला था जो भविष्य में मानवता की पहचान को कायम करेगी.. जो समानता औऱ संगत सेवा को ही परम धर्म मानने वाले है.. जी हां, दसवे पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा 1699 में जब खालसा की स्थापना की गई.. तब निस्वार्थ भाव से अपना सिर देकर इस 17 साल के बच्चे ने साबित कर दिया कि गुरु के आदेश के आगे उसकी जान की भी कोई कीमत नहीं है.. हम बात कर रहे है गुरु साहिब के हाथों पहली बार अमृत चख कर उनके पंज प्यारों में शामिल होने वाले भाई हिम्मत सिंह जी की.. जो तीसरे पंज प्यारे बने थे.. अपने इस लेख में हम भाई हिम्मत सिंह की बात करेंगे.. जिन्होंने गुरु सेवा के लिए सबकुछ त्याग दिया।
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खालसा पंथ की नींव का स्तम्भ
उड़ीसा में झीवर समुदाय एक निम्न जाति मानी जाती थी.. और जहां जातिगत भेदभाव की कुप्रथा का बोलबाला हो, वहां भला झीवर समुदाय के लोगो कैसे उस कुप्रथा से अछूते रहते। इसी समुदाय में साल 1661 में जन्मे थे भाई हिम्मत सिंह.. जिन्हें माता पिता ने नाम दिया हिम्मत राय। जातिगत अपमान और भेदभाव को सहते हुए बड़े हुए भाई हिम्मत सिंह ने जब दसवे गुरुसाहिब के बारे में जानना शुरु किया तो वो उनसे प्रभावित हुए बना नहीं रह सकें.. गुरु साहिब द्वारा लोगो के बीच जातिगत भेदभाव को खत्म करके भाईचारे, सबको एक समान समझे जाने औऱ एक ईश्वर के विचारो मे भाई हिम्मत सिंह को खुद ही गुरु साहिब की तरफ झुकाना शुरु कर दिया। भाई हिम्मत सिंह जब 17 साल के हुए तो उन्होंने अपने माता पिता से आज्ञा लेकर गुरु साहिब के सानिध्य में रह कर नकी सेवा करने और उनके चरणों में जीवन बिताने के लिए आंनदपुर साहिब आ गए साल था 1978 का.. जब गुरु साहिब मात्र 12 साल के थे.. औऱ गुरु गद्दी पर विराजमान हो गए थे। गुरु साहिब ने भाई हिम्मत सिंह की भक्ति और गुरु के प्रति उनकी निष्ठा देखकर उन्हें अपने सानिध्य में रख लिया।
भाई हिम्मत सिंह जी का जीवन और संदेश
वो उनकी दिल से सेवा करते थे.. समय बीतता गया.. गुरु साहिब के साथ रहकर भाई हिम्मत सिंह ने सिख मार्शल परंपरा और आध्यात्मिक समतावाद को सीखा.. वो गुरु साहिब के साथ मिलकर कई युद्धो में शामिल हुए औऱ वो दिन भी आया जब बैशाखी के दिन गुरु साहिब ने सिख धर्म को पहचान देने के लिए खालसा की स्थापना की.. लेकिन खालसा को फैलाने के लिए उन्हें ऐसे योद्धाओ की जरूरत थी। जो बिना झिझके खालसा के लिए अपना सिर कटाने को राजी हो जाये.. गुरु साहिब ने लोगो को एकजुट करने के लिए और अपने योद्धाओ की तलाश करने के लिए देशभर में सिख संगतो को वैशाखी के दिन आनंदपुर आने का न्यौता दिया था। सैकड़ो की भीड़ वहां पहुंची.. सबकुछ सामान्य ही था, लेकिन अचानक गुरु साहिब संगत के बीच आए.. और नंगी तलवार को दिखाते हुए पूछा कि क्या कोई ऐसा है जो धर्म की रक्षा के लिए उन्हें अपनी शीश की बलि दें।
पांचो खालसा के पहले पंज प्यारे कहलाये
हजारों की भीड़ से सबसे पहले भाई दया राम उठे, फिर भाई धरम दास उठे और भाई हिम्मत राय ने अपने शीश की बलि देने की पेशकश की.. फिर भाई मोहकम चंद और फिर साहिब चंद आगे आये.. ये घटना सही मायने में कोई बलि नहीं थी बल्कि ये केवल गुरु साहिब की परिक्षा थी अपने निष्ठावान शिष्यों को खोजने की.. गुरु साहिब ने पांचो को तंबू में लेजाकर नए कपड़े पहचाने और सबके सिर पर पगड़ी बांधी.. फिर खुद लोहे के बर्तन में पतासे और पानी डाल कर अपने खंमडे से अमृत किया .. और पांचो को अमृत पान करवाया.. इस अमृतपान के साथ ही वो पांचो खालसा के पहले पंज प्यारे कहलाये। वो खालसा के वो सेनापति थे जिनके कंधो पर सिख धर्म की रक्षा का दायित्व डाला गया था.. जिन्हें उन्होंने पूरी जिम्मेदारी और आस्था से निभाया। भाई हिम्मत राय को अमृत चखने के बाद नाम मिला भाई हिम्मत सिंह।
हिम्मत सिंह पूरी बहादुरी से एक योद्धा के रूप में आनंदपुर के आसपास के इलाकों में धर्म का प्रचार कर रहे थे.. उन्होंने शाही सेनापति और सरदारो के साथ युद्ध में भाग लिया.. लेकिन दिसंबर 1704 में जब मुगल सेनापति वज़ीर खान और शेर मोहम्मद खान ने गुरुसाहिब को आनंदपुर छोड़ने के लिए विवश कर दिया तो वो चमकौर में रहने लगे थे लेकिन वहां भी मुगलो ने हमला कर दिया.. इस दौरान गुरु साहिब के सिखो ने पीछे हटने के बजाय मुगलो से युद्ध का रास्ता चुना, जिसमें भाई हिम्मत सिंह भी थे..हजारों मुगलो पर 40 सिखो ने शेर की तरह हमला किया। इस दौरान भाई हिम्मत सिंह पर जिम्मेदारी थी को वो किसी तरह से मुगलो की नजरो से बचाकर गुरु साहिब को वहां से निकाल सकें और वो जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभाई।
गुरु साहिब भेष बदल कर चमकौर से निकल गए.. लेकिन भाई हिम्मत सिंह के साथ दो औऱ पंच प्यारे भाई मोहकम सिंह, भाई साहिब सिंह के साथ 40 सिख चमकौर के युद्ध में मुगलो के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गए। भाई हिम्मत सिंह समेत सभी सिखों ने अदम्य साहस और धर्म के प्रति अपनी निष्ठा दिखाते हुए साबित किया था कि वो सिर कटा सकते है लेकिन झुका नहीं सकते। भाई हिम्मत सिंह के बलिदान और उनकी गुरु भक्ति के सम्मान में पुरी में हीगुरुद्वारा आरती साहिब के सामने भाई हिम्मत सिंह मेमोरियल चिल्ड्रन पार्क बनवाया गया है जिसे श्री गुरु नानक देव जी धार्मिक एवं धर्मार्थ ट्रस्ट ने बनवाया है। पुरी में आने वाले सिख संगत गुरुद्वारे के साथ साथ इस पार्च में भी जरूर आते है। आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।












































