Sonam Wangchuk protest: पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून और जवाबदेही की मांग को लेकर पिछले 23 दिनों से चल रहा सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का भूख हड़ताल आंदोलन अब समाप्त हो गया है। सोमवार को केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई बातचीत के बाद वांगचुक ने अपना अनशन खत्म करने का फैसला लिया। हालांकि, संसद मार्च के दौरान आंदोलन को अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिलने और प्रदर्शनकारियों को रास्ते में ही रोक दिए जाने के बाद इस आंदोलन की प्रभावशीलता को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
यह आंदोलन सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर अभिजीत दीपके के आह्वान पर शुरू हुआ था। उन्होंने इंस्टाग्राम पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ नाम से एक पेज बनाया, जिसे लाखों लोगों ने फॉलो किया। इसके बाद NEET समेत विभिन्न भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों पर कड़े कानून बनाने और जिम्मेदारी तय करने की मांग को लेकर 28 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन शुरू किया गया।
22 दिन तक अनशन, फिर अस्पताल में भर्ती| Sonam Wangchuk protest
सोनम वांगचुक करीब 22 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहे। इस दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने का निर्देश दिया, जिसके बाद पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले गई। डॉक्टरों ने डिहाइड्रेशन, शरीर में पोटैशियम की गंभीर कमी और बढ़े हुए कीटोन स्तर पर चिंता जताई थी। आंदोलन की प्रमुख मांगों में पेपर लीक मामलों में तत्काल जवाबदेही तय करना और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी शामिल थी।
संसद मार्च नहीं रहा सफल
आंदोलनकारियों की योजना मानसून सत्र की शुरुआत के साथ संसद का घेराव कर अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाने की थी। लेकिन कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के कारण प्रदर्शनकारियों को संसद भवन की ओर बढ़ने से पहले ही रोक दिया गया। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब और भारतीय रिजर्व बैंक के पास प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच तनाव की स्थिति बन गई। भीड़ को हटाने के लिए पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया और आंसू गैस के गोले भी छोड़े। इस दौरान कम से कम सात प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और संसद के कुछ प्रवेश द्वार भी कुछ समय के लिए बंद कर दिए गए।
क्यों नहीं मिला अन्ना हजारे जैसा जनसमर्थन?
आंदोलन के दौरान लगातार यह तुलना भी होती रही कि आखिर सोनम वांगचुक का आंदोलन 2011-12 के अन्ना हजारे आंदोलन जैसी व्यापक जनभागीदारी क्यों नहीं जुटा सका। इस पर अलग-अलग तरह की राय सामने आई। कुछ लोगों का मानना रहा कि दोनों आंदोलनों की परिस्थितियां और नेतृत्व अलग थे। वहीं कुछ विश्लेषकों ने कहा कि आंदोलन के नेतृत्व, रणनीति, राजनीतिक धारणा, जनता के भरोसे और मौजूदा राजनीतिक माहौल जैसे कई कारण इसकी सीमित पहुंच की वजह बने। सोशल मीडिया पर भी इस विषय को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
अनशन खत्म करने पर बदला रुख
सोमवार सुबह तक सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया पर साझा अपने हस्तलिखित संदेश में कहा था कि यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था में हाल की विफलताओं और पेपर लीक जैसे मामलों की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करती या राजनीतिक दल संसद में इस मुद्दे को उठाने का भरोसा नहीं देते, तो उनका अनशन जारी रहेगा। हालांकि बाद में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत के बाद उन्होंने अपना 23 दिन लंबा अनशन समाप्त कर दिया।
फिलहाल आंदोलन भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में सुधार और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर बहस अभी भी जारी है। आने वाले दिनों में सरकार और विपक्ष इस विषय पर क्या रुख अपनाते हैं, इस पर सभी की नजर बनी रहेगी।































