SIPRI Nuclear Report: दुनिया में ताकत और सुरक्षा की दौड़ लगातार तेज होती जा रही है। हर देश चाहता है कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी देशों से सैन्य रूप से मजबूत रहे। इसी प्रतिस्पर्धा का सबसे अहम हिस्सा परमाणु हथियार भी हैं। हाल ही में स्वीडन की प्रतिष्ठित थिंक टैंक SIPRI की एक रिपोर्ट ने वैश्विक सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत ने पहली बार शांतिकाल के दौरान 12 परमाणु हथियारों की तैनाती की है। वहीं चीन ने भी अपने तैनात परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाकर 34 कर दी है।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद लोगों के मन में एक सवाल फिर उठने लगा है कि आखिर कोई देश परमाणु बम कैसे बनाता है? क्या इसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था या दूसरे देश से अनुमति लेनी पड़ती है?
क्या परमाणु बम बनाने के लिए किसी की मंजूरी जरूरी होती है? SIPRI Nuclear Report
सीधा जवाब है- नहीं। किसी भी देश को परमाणु हथियार विकसित करने के लिए किसी अन्य देश, संयुक्त राष्ट्र या किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से औपचारिक अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती। हर संप्रभु राष्ट्र अपनी सुरक्षा नीतियों के अनुसार फैसला लेने के लिए स्वतंत्र होता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी देश बिना किसी परिणाम के परमाणु कार्यक्रम शुरू कर सकता है। यदि कोई देश अंतरराष्ट्रीय समझौतों की अनदेखी करते हुए परमाणु हथियार विकसित करता है, तो उसे वैश्विक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध और कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
क्या है NPT और क्यों माना जाता है इसे अहम?
परमाणु हथियारों की होड़ को नियंत्रित करने के लिए वर्ष 1968 में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) बनाई गई थी। इस समझौते का उद्देश्य दुनिया में नए परमाणु देशों की संख्या को सीमित करना था। इस संधि के तहत अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को आधिकारिक परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता दी गई। इन पांच देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति मिली, जबकि अन्य देशों से अपेक्षा की गई कि वे परमाणु हथियार विकसित नहीं करेंगे।
यदि कोई देश इस संधि पर हस्ताक्षर करता है, तो वह परमाणु हथियार विकसित करने या उनसे जुड़ी तकनीक हासिल करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकता।
भारत ने NPT पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
भारत शुरू से ही NPT का आलोचक रहा है। भारत का मानना रहा है कि यह संधि भेदभावपूर्ण है क्योंकि यह कुछ देशों को विशेष अधिकार देती है, जबकि बाकी देशों पर प्रतिबंध लगाती है। इसी वजह से भारत ने कभी भी NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए। इसके बावजूद भारत आज दुनिया की प्रमुख परमाणु शक्तियों में गिना जाता है और उसके पास मजबूत परमाणु क्षमता मौजूद है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी परमाणु नीति पूरी तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन पर आधारित है।
किन देशों ने नहीं मानी यह संधि?
भारत के अलावा पाकिस्तान और इजरायल ने भी NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। दोनों देशों ने अपनी स्वतंत्र परमाणु क्षमता विकसित की है। वहीं उत्तर कोरिया पहले इस संधि का हिस्सा था, लेकिन वर्ष 2003 में उसने NPT से अलग होने का फैसला किया और बाद में अपने परमाणु परीक्षण शुरू कर दिए।
परमाणु सामग्री हासिल करना क्यों है मुश्किल?
परमाणु हथियार बनाने के लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छा ही पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए संवर्धित यूरेनियम, विशेष तकनीक और अत्याधुनिक वैज्ञानिक ढांचे की जरूरत होती है। इसी उद्देश्य से दुनिया के 48 देशों ने मिलकर न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) का गठन किया है। यह समूह परमाणु सामग्री और तकनीक की वैश्विक खरीद-फरोख्त पर नजर रखता है और तय करता है कि कौन-सा देश किस प्रकार की तकनीक या सामग्री हासिल कर सकता है।
भारत अभी NSG का सदस्य नहीं है, लेकिन लंबे समय से इसकी सदस्यता पाने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की बढ़ती ऊर्जा और रणनीतिक जरूरतों को देखते हुए NSG सदस्यता उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
बदलती दुनिया में बढ़ रही परमाणु प्रतिस्पर्धा
SIPRI की हालिया रिपोर्ट ने यह संकेत दिया है कि दुनिया में परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा एक बार फिर तेज हो रही है। भारत, चीन, अमेरिका, रूस और अन्य देशों की रणनीतिक गतिविधियां दिखाती हैं कि वैश्विक सुरक्षा का मुद्दा आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है।
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