शस्त्रधारी निहंग सिखों को मुगलों ने मगरमच्छ क्यों कहा था? यहां पढ़िए पूरी कहानी

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आपने वैसे सिखों को देखा होगा, जिनके सिर पर बड़ी सी नीले रंग की पगड़ी होती है और हमेशा वे अपने साथ हथियार रखते हैं…ये सिख लड़ाके होते हैं, योद्धा होते हैं..इन्हीं सिखों  को शस्त्रधारी निहंग सिख कहा जाता है..निहंग सिखों को लेकर कई  कहानियां हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन सिखों को मुगलों ने मगरमच्छ क्यों  कहा था?

शस्त्रधारी निहंग शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है. इसके पीछे कई मतभेद है. कुछ इतिहासकारों की मानें तो निहंग शब्द फारसी भाषा का एक शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ मगरमच्छ होता है. निहंग सिखों को मगरमच्छ की संज्ञा मुगलों ने दी थी. कहा जाता है कि मुगलों का ऐसा मानना था कि सिख लड़ाके युद्ध में मगरमच्छ की तरह लड़ते थे.

जिस तरह मगरमच्छ को पानी में हराना मुश्किल है उसी तरह निहंगो को युद्ध के मैदान में हराना असंभव है. यह भी कहा जाता है कि निहंग संस्कृत भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है- जिसे किसी तरह की शंका न हो, भय न हो, मोह न हो. निहंग शब्द का प्रयोग श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में भी हुआ है, जिसका अर्थ निडर और बेसब्र बताया गया है.

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सिख धर्म के प्रहरी हैं निहंग

सिख समुदाय के निहंग सिख ऐसे सिख है जो दस गुरुओं के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने के लिए हर वक्त तत्पर रहते है. दस गुरुओं के काल के दौरान यह सिख गुरु साहिबानों के मजबूत प्रहरी होते थे. वह गुरु महाराज द्वारा रची गई रचना गुरु ग्रंथ साहिब के प्रहरी अभी तक हैं. अगर कभी सिख धर्म पर आंच आई तो निहंग उस वक्त अपने प्राणों की चिंता किए बगैर सिख और गुरु ग्रंथ साहिब की रक्षा अपनी आखिरी सांस तक करते हैं. यह पूरी तरह से सिख धर्म के लिए सदैव समर्पण की भावना रखते हैं. निहंगों का उत्थान 1699 में माना जाता है, जब गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ का निर्माण किया था.

गुरु गोविंद सिंह जी ने निहंग नाम की युद्धक सेना का निर्माण किया था, जिसे गुरु की फौज भी कहा जाता है. निहंग सिखों ने इतिहास में अहमद शाह अब्दाली सहित कई आक्रमणकारियों से युद्ध किया था और उन्हें धूल चटाई थी. सिख धर्म में निहंग सिखों की पोशाक की भी अलग ही पहचान है. इनकी पोशाक के पीछे एक कहानी प्रचलित है.

हमेशा हथियारों से लैस होते हैं

इतिहास में दर्ज कहानी के मुताबिक गुरु गोविंद सिंह जी के चौथे पुत्र फतेह सिंह जी एक बार नीला चोला और डुमाला के साथ नीली पगड़ी पहने हुए गुरु के समक्ष प्रस्तुत हुए थे. अपने पुत्र को इस पोशाक में इतना प्रतापी देखकर गुरुजी ने कहा कि यह खालसा के प्रतापी सैनिक निहंगो की वेशभूषा होगी, तभी से निहंग सिखों की पोशाक नीले रंग की होती है. उनकी पगड़ी अन्य सिखों की अपेक्षा ऊंची होती है, जिसमे दोधारी तलवार लगी होती है. निहंग सिख हमेशा अपने पास कमरबंद खंजर रखते हैं. वे हथियारों से लैस होते हैं. इसके अलावा इनकी पोशाक में युद्ध के जूते, कड़ा और ढाल शामिल होती है.

निहंग सिख पूरे साल अपने स्थानों पर डेरा जमाए रहते हैं लेकिन हर साल वे दमदमा साहिब, तलवंडी साबो, आनंदपुर साहिब और अमृतसर की वार्षिक तीर्थ यात्रा पर अवश्य निकलते हैं. साथ ही धार्मिक आयोजनों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते है. निहंग सिख मार्शल आर्ट और घुड़सवारी में भी माहिर होते हैं.

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