दलितों को मंदिर में एंट्री दिलाने के लिए किया गया वो सत्याग्रह, जिसमें अंबेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़ने की ठान ली थी!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 17 नवम्बर 2021, 05:30 AM Updated: 17 नवम्बर 2021, 05:30 AM
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कालाराम मंदिर सत्याग्रह के बारे में क्या आप जानते हैं? अगर नहीं, तो फिक्र की कोई बात नहीं क्योंकि आज  हम इस कालाराम मन्दिर सत्याग्रह के बारे में पूरे डीटेल में जानेंगे।

2 मार्च 1930 को भीमराव अंबेडकर ने अछूतों के मंदिर में एंट्री करवाने के लिए कालाराम मंदिर सत्याग्रह चलाया था। ये सत्याग्रह नासिक के कालाराम मन्दिर में हुआ था। दरअसल, देश में हिन्दुओं में ऊंची जातियों को जहां जन्म से ही मन्दिर प्रवेश का अधिकार था लेकिन हिन्दू दलितों को ये अधिकार प्राप्त नहीं था। इस सत्याग्रह में करीब 15 हजार दलित लोग शामिल हुए थे, जिनमें ज्यादातर महार समुदाय के थे।अन्य मांग व चमार थे और महिलाओं की इसमें भारी संख्या थी। 

5 वर्ष 11 महीने एवं 7 दिन तक ये सत्याग्रह चला। नासिक के कालाराम मन्दिर में एंट्री कराने के अंबेडकर के इस सत्याग्रह और संघर्ष को आज भी याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने सवाल किया था कि “ईश्वर अगर सबके हैं तो उनके मन्दिर में कुछ लोगों को ही प्रवेश क्यों दिया जाता है?” इस सत्याग्रह में दादासाहब गायकवाड, सहस्त्रबुद्धे, देवराव नाईक, डी.व्ही. प्रधान, बालासाहब खरे, स्वामी आनन्द भी साथ  थे। तब आम्बेडकर का कहना था कि “हिन्दू इस पर भी सोचें कि क्या मन्दिर प्रवेश हिन्दू समाज में दलितों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का अन्तिम उद्देश्य है ? या उनके उत्थान की दिशा में ये पहला कदम है ? यदि ये पहला कदम है, तो अन्तिम लक्ष्य क्या है ? यदि मन्दिर प्रवेश अन्तिम लक्ष्य है, तो दलित वर्गों के लोग उसका समर्थन कभी नहीं करेंगे। दलितों का अन्तिम लक्ष्य है सत्ता में भागीदारी।”

ये शब्द बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के हैं तब के वक्त में। इस सत्याग्रह की जो खास बात रही थी वो ये थी कि पूरे महाराष्ट्र से लोग इससे जुड़ने के लिए नासिक शहर पहुंचे थे। साल 1930 के 2 मार्च को अंबेडकर के अध्यक्ष के तौर पर एक सभा हुई जिसमें सत्याग्रह कैसे होगा उसकी योजना बनाई गई। अहिंसा के मार्ग से सत्याग्रह करने के बारे में सबको बता दिया गया और 3 मार्च 1930 को सत्याग्रहियों ने चार तुकडीयां तैयार कर मन्दिर के चारों दरवाजे पर जाकर तैनात हो गए। पुलिस और मन्दिर के पुजारी तो सत्याग्रह करने वालों से मांग का पुरजोर विरोध किया और मन्दिर के सभी दरवाजे बन्द कर दिए। पूरे मन्दिर को कड़ी सुरक्षा के घेरे में पुलिस ने रखा हुआ था, जिससे कोई अछूत मन्दिर में घुस ही न सके।

फिर चला हमले का दौर और  इन सत्याग्रहिओं पर सवर्ण हिन्दुओं ने हमला करना शुरू कर दिया। उन पत्थर बरसाए, लोगों की काठीओं से पिटाई की गई। इस दौरान तो अंबेडकर भी जख्मी हो गए। ऐसे हालात में भारी संख्या में होने के बाद भी कम संख्या में आए सवर्ण हिन्दुओं पर पलटकर हमला नहीं किया क्योंकि इस सत्याग्रह में दलितों ने अंबेडकर के दिए “अहिंसा से सत्याग्रह करना है” के आदेश को आखिर तक माना। ये सत्याग्रह करीब करीब 6 साल तक चलता रहा पर राम के मन्दिर का दरवाजा आखिर तक दलितों के लिए खुला नहीं और ऐसी हालत को देख अंबेडकर ने घोषणा कर दिया कि वो हिन्दू धर्म का त्याग करने जा रहे हैं।

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