Punjab Politics: क्या है वो वजहें, जिनके चलते पंजाब में नहीं चल पाता बीजेपी का मैजिक?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 28 सितम्बर 2021, 05:30 AM Updated: 28 सितम्बर 2021, 05:30 AM
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अगले साल 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है, जिसमें एक राज्य पंजाब भी है। एक तरफ कांग्रेस और AAP विकास के मुद्दे को केंद्र बना रही है, तो वहीं बीजेपी ने हिंदू कार्ड खेला है। 117 विधानसभा सीटो में से 45  सीटे हिंदू बहुल इलाके वाली है और इसलिए बीजेपी ने 21 प्रतिशत सिखों को केंद्र में रखने के बजाए दलितों और हिंदुओ को केंद्र में रखा है। लेकिन अब सवाल ये है कि जब बीजेपी पूरे देश में मजबूत हो रही है तो फिर क्यों पंजाब में बीजेपी को जमीन तलाशने में भी इतनी ज्यादा मुश्किलें हो रही है? आखिर क्यों बीजेपी पंजाब में इतनी कमजोर है? आज हम इसी सवाल का जवाब जानने की कोशिश करेंगे…

जब अकाली दल के साथ भी बीजेपी

पंजाब में जब 1984 के दंगे हुए थे तब पंजाब में जरूरत थी कि सिख समुदाय और हिंदू समुदाय को एकजुट करने की जरूरत है। 1992 से पहले अकाली दल अकेले पंजाब में चुनाव लड़ती थी, लेकिन तभी भी एक बड़ा तबका अकाली दल को पंसद नहीं करता था। बीजेपी भी अलग ही चुनाव लड़ती थी और सरकार बनाने के लिए दोनों एक साथ आते थे। लेकिन 1992 में दोनों ने गठबंधन करके चुनाव में आने की तैयारी की।

1996 में अकाली दल ने मोगा डेक्लरेशन पर साइन किया और 1997 में दोनों पार्टी पहली बार एक साथ आई। इस डेक्लरेशन के तहत अकाली दल ने तीन बातों पंजाबी आइडेंटिटी, आपसी सोहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा को मेन मुद्दा बनाया।

वहीं कांग्रेस पंजाब में एक मजबूत पार्टी रही थी, तो किसी भी कीमत पर बीजेपी के लिए अकाली दल से गठबंधन ही पंजाब में उसकी जमीन तैयार कर सकता था।

फिर बदले हालात…

लेकिन 2017 के बाद हालात बदलने लगे। एक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक अकाली दल को पंजाब चुनाव में करारी मात मिलने के पीछे जाट वोट बैंक था। जाटों की संख्या वहां सिखों से ज्यादा है और जाट वोटर्स कांग्रेस के पाले में जा रहे थे। जिसके कारण ही पहली बार हुआ जब 117 सीटों में से अकाली दल 15 सीटो पर सिमट गई। तो वही बीजेपी को तो सिर्फ 3 सीटें ही मिली। यानि की बीजेपी अकाली दल के बिना पंजाब में कुछ नहीं है। अब ऐसे में सितंबर 2020 में इस गठबंधन में फूट पड़ गई। जिसका कारण बना किसान आंदोलन।  

अब बीजेपी और अकाली दल की राहें अलग

अकाली दल केंद्र सरकार के 3 कृषि कानूनों के लाने के फैसले से नाखुश थी और उन्होंने अपनी 2 दशक की दोस्ती को किसानों के भले के लिए तोड़ दिया। अकाली दल के अलग होने से बीजेपी फिर से मुहाने पर आ गई है। बीजेपी के लिए पंजाब में अपनी जड़े मजबूत करना बेहद मुश्किल है, जिसका नतीजा ये है कि आगामी चुनाव में बीजेपी सिख समुदाय को साधने के बजाए दलितों और हिंदुओ को मनाने में लगी है। इतना ही नहीं इस बार चुनाव में मुख्य चेहरा पीएम मोदी ही होने वाले हैं। खबरो की मानें तो पीएम मोदी दुर्गा पूजा के बाद पंजाब में करीब 30 रैलियां करने वाले हैं।

अब सवाल ये है कि बीजेपी का हिंदू कार्ड क्या पंजाब में काम करेगा, क्योंकि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि भले ही पंजाब में 21 प्रतिशत सिख हो लेकिन किसान केवल सिख नहीं है बल्कि हिंदू तबका भी है और 3 कृषि कानूनों से सभी वर्ग को परेशानी है। ऐसे में क्या हिंदू कार्ड खेलकर बीजेपी पंजाब में जीत पाएगी? क्या बीजेपी के बड़े चेहरों के आने के बाद भी पंजाब में बीजेपी मजबूत हो पाएगी? 

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