यूपी चुनाव से पहले सीएम योगी ने चला बड़ा दांव, क्या इसकी काट निकाल पाएगा विपक्ष?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 30 सितम्बर 2021, 05:30 AM Updated: 30 सितम्बर 2021, 05:30 AM
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योगी मंत्रिमंडल के विस्तार का काफी वक्त से इंतजार किया जा रहा था और आखिरकार रविवार को हो ही गया। तो सवाल ये है कि यूपी चुनाव से पहले क्यों जरूरत पड़ी योगी को मंत्रिमंडल विस्तार की? क्या जातीय-क्षेत्रीय समीकरण सुधारना चाहती है योगी सरकार ? इन सवालों पर हम गौर करेंगे…

कैबिनेट विस्तार के पीछे जातीय समीकरण समझें…

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने मंत्रिमंडल में शामिल हुए सात नए चेहरों को उनके पद की शपथ दिलवाई जिसमें जितिन प्रसाद, डॉ. संगीता बलवंत बिंद इसके अलावा धर्मवीर प्रजापति, पलटूराम, छत्रपाल गंगवार को शामिल किया गया। इसके अलावा यूपी कैबिनेट में दिनेश खटीक और संजय गोंड़ के नाम को भी शामिल कर लिया गया। यहां पर जातीय समीकरण को समझना होगा।

कैबिनेट मंत्री जितिन प्रसाद को और अन्य सभी को राज्यमंत्री बनाया गया है। मंत्रिमंडल विस्तार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले जितिन प्रसाद एक मात्र ब्राह्मण नेता हैं और जो बाकी के 6 लोग है उसमें से 3 ओबीसी के हैं और जो 2 हैं वो अनुसूचित जाति के हैं और 1 अनुसूचित जनजाति के हैं। यूपी के मंत्रिमंडल विस्तार में भी केंद्र की तरह जातीय समीकरणों पर गौर किया गया है।

बीजेपी ने कैबिनेट विस्तार से यह साफ कर दिया है कि आने वाला जो एसेंब्ली इलेक्शन में वो सत्ता में वापसी को पुख्ता करने के लिए ओबीसी इसके साथ ही एससी/ एसटी श्रेणियों पर पूरा पूरा ध्यान दे रही है। इसमें जातीय समीकरण को बनाए रखने के लिए पूरा बैलेंस किया गया है और तो और बीजेपी ने राज्य के सभी हिस्सों में अपना प्रतिनिधित्व तय करने के लिए भी इस तरह के कदम उठाई है।

योगी की टीम में अब कुल इतने मंत्री

योगी मंत्रिमंडल में अभी की संख्या की बात करें तो कुल मंत्रियों की संख्या अब 60 हो चली है और इनमें 24 कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं और 9 राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार है और इनमें जो 27 हैं वो राज्यमंत्री हैं। अब परस्थितियों पर गौर करते हैं तो यूपी चुनाव में बमुश्किल रह गए हैं चार महीने और बीजेपी सत्ता पर बने  रहने के लिए नए नए तरीकों को आजमा रही हैं।

अब ये भी बात सामने आई है कि कथित तौर पर योगी सरकार से ब्राह्मण समुदाय नाखुश हैं। जितिन प्रसाद को कैबिनेट मंत्री बनाकर ब्राह्मण समुदाय की नाखुशी को दूर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। बहेड़ी से विधायक छत्रपाल गंगवार है जिनको  राज्यमंत्री बना दिया गया और इसके पीछे की रणनीति इस तरह से देखी जा सकती है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार का छत्रपाल गंगवार एक विकल्प हो सकते हैं। हाल के वक्त की बात करें तो हुआ ये है कि संतोष गंगवार केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर किए गए हैं और ऐसे में छत्रपाल कुर्मी वोटरों को लाने का जिम्मा उठाएंगे।

दलित नेता के तौर पर दो चेहरे जो शामिल किए गए हैं वो बलरामपुर सुरक्षित सीट से विधायक पलटूराम है और हस्तिनापुर सीट से विधायक दिनेश खटीक को मंत्री का पद दिया जाता है। देखने वाली बात है कि चुनाव से ठीक पहले जो मंत्री शामिल हुए भले ही थोड़े वक्त के लिए पर चुनौतियां दोहरी हैं। एक तो खुद की पुरानी परफार्मेंस को दोहराकर सियासी जौहर दिखाना होगा और मेहनत करते हुए स्वजातीय वोटों को पार्टी की तरफ मोड़ना होगा।

क्यों पड़ी मंत्रिमंडल को विस्तार की जरूरत?

चलिए इस पर गौर करते हैं। चुनावी आचार संहिता की वजह से मंत्रियों को बस तीन महीने के लिए काम करना हो ऐसे में इन मंत्रियों पर मेन जिम्मेदारी जो होगी वो चुनाव प्रचार की ही होगी, तो फिर क्यों अभी मंत्रिमंडल विस्तार किया गया। दरअसल, चुनावी विश्लेषकों की माने तो मंत्रियों को भले ही काम करने का ज्यादा समय न मिले पर इस विस्तार से जातीय समीकरण को बैलेंस करने का जो काम किया गया है उससे चुनाव के वक्त सरकार को काफी ज्यादा फायदा पहुंच सकता है।

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