Gurudwara in Bihar: सिख धर्म के परम पूज्य पांच अकाल तख्तों में से एक तख्त पटना साहिब बिहार से पटना में मौजूद है। जाहिर के दसवे गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म स्थान होने के कारण ये स्थान पहले ही पवित्र हो चुका है.. वहीं अकाल तख्त के होने के बाद सिखो के लिए बिहार एक पूजनीय स्थान है। इतना ही नहीं बिहार में एक सिख कम्युनीटी है, जिन्हें अग्रहरि सिख या नानकपंथी सिख कहा जाता है। यानि कि सिख धर्म की यहां अनगिनत निशानियां है.. उन्हीं निशानियों में से एक है पवित्र और ऐतिहासिक गुरुद्वारे। बिहार में करीब 200 से भी ज्यादा छोटे बड़े गुरुद्वारे मौजूद है। अपने इस लेख में हम बिहार के 5 प्रमुख गुरुद्वारों के बारे में जानेंगे..
गुरुद्वारा बाल लीला साहिब – Gurudwara Bal Leela Sahib
22 दिसम्बर 1666 को पटना में नौवें सिख गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी और माता गुजरी के घर सिखों के भविष्य में होने वाले दसवे गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ था। जन्म के बाद उन्होंने करीब 5 साल पटना में ही बिताये, जहां उनकी शुरुआती शिक्षा शुरु हुई.. उन्होंने बाल लीलायें की.. उनकी इन लीलाओं की याद में ही गुरुद्वारा बाल लीला साहिब मैनी संगत स्थापित किया गया। जिसे तब के राजा फतेहचंद मैनी ने एक महल के स्थान पर 1668 में बनवाया था। फतेहचंद मैनी की रानी को गुरुसाहिब धर्म माता कहते थे। ये गुरुद्वारा 24 घंटे सातों दिन खुला रहता है।
सिंधी गुरुद्वारा कटहलबाड़ी – Sindhi Gurudwara Kathalbari
दरभंगा में सिँधी और सिखो की आस्था का प्रतीक है सिँधी गुरुद्वारा कटहलवाड़ी। सिंधी समुदाय जहां पहले गुरु गुरु नानक देव जी और पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब को फॉलो करते है, जो खुद को नानकपंथी भी कहते है तो वहीं ये सिखों के लिए भी बेहद पवित्र स्थान है। इस गुरुद्वारे का निर्माण 1947 के बाद किया गया जब पंजाब से सिंधी समुदाय के लोग यहां आकर बस गए। ये गुरुद्वारा सातों दिन सुबह 5 बजे खुलता है और रात 9 बजे तक खुला रहता है।
श्री गुरु तेग बहादुर ऐतिहासिक गुरुद्वारा – Shri Guru Tegh Bahadur Historical Gurudwara
कटिहार के लक्ष्मीपुर में नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर के आगमन, औऱ कुछ महीने बिताने की याद में बनाया गया है श्री गुरु तेग बहादुर ऐतिहासिक गुरुद्वारा। 1670 में गुरुसाहिब कई सालो की यात्रा के बाद बिहार लौटे थे.. तब वो पहली बार अपने बेटे से भी मिले थे। यहां गुरुसाहिब का पवित्र हुकुम नामा औऱ हस्तलिखित गुरु ग्रंथ साहिब भी रखा हुआ है। ये गुरुद्वारा सातो दिन और 24 घंटे खुला रहता है। कहा जाता है कि गुरु साहिब के प्रवचनो से प्रभावित होकर पूरे गांव ने सिख धर्म अपना लिया था।
गुरुद्वारा श्री गुरु नानक शीतल कुंड
राजगीर- बिहार के ऐतिहासिक नालंदा जिले के राजगीर शहर में स्थित है , गुरुद्वारा श्री गुरु नानक शीतल कुंड। जो कि पहले गुरु गुरु नानक देव जी को समर्पित है। कहा जाता है कि गुरु साहिब अपनी उदासी के दौरान 1506 में पहली बार राजगीर आयें थे। उस वक्त यहां के लोगो ने पीने की पानी की समस्या बताई थी..जिसके बाद गुरु साहिब ने एक स्थान पर मुस्कुराते हुए अपने पैर रखे… जिसके बाद गर्म पानी के स्त्रोंतो के बीच एक ठंडे पानी का सोता फूट पड़ा, जिस कारण इसे शीतल कुंड कहा गया। इस वक्त तो इमारत यहां मौजूद है उसे 2022 में बनवाया गया, लेकिन उससे पहले ये एक छोटा सा गुरुद्वारा मौजूद था। ये गुरुद्वरा सातों दिन खुलता है जो कि सुबह 5 बजे संगतो के लिए खोला जाता है और रात 10 बजे तक खुला रहता है।
गुरुद्वारा कंगन घाट साहिब
दसवे गुरु गुरु गोबिंद सिंह को समर्पित गुरुद्वारा कंगन घाट साहिब पटना में गंगा नदी के किनारे बना हुआ भव्य गुरुद्वारा है। गुरु साहिब जब बच्चे थे और दोस्तो के साथ खेल रहे थे तब उन्होंने अपने दोस्तो को संसारिक बंधनो से मुक्त होने का संदेश देते हुए एक कंगन नदी में फेंका था, जब उनकी मां ने पूछा कि कंगन कहां गिरा तो उन्होंने अपना दूसरा सोने का कंगन भी पानी में फेंक दिया.. और बोले यहां गिरा। ये संदेश की संसारिक चीजें केवल बाहरी सुख देती है.. मानसिक शांति नहीं। इसी स्थान पर भक्ति पंडित शिव दत्त को गुरु साहिब के बाल रूप में अपने इष्ट देव के दर्शन हुए थे.. जिसने उन्हें आत्मिक शांति दी थी.. इस कारण ही इस गुरुद्वारे को गुरुद्वारा कंगन घाट साहिब कहा गया है। गुरुद्वारा कोई भी हो.. वो सिख धर्म का आध्यात्मिक ताकत को, सिख धर्म की परंपरा को दर्शाता है। जो हर सिख के लिए बेहद पूजनीय है।













































