Suruchi Sharma: कहते है कि जो सच्चा कलाकार होता है तो वो बिना बोले ही अपनी कला से ही अपनी सच्ची भावना को दुनिया के सामने उजागर कर देते है.. कोई अपनी कला में कितना पारंगत है और कलाकार की साधना कला को लेकर कितनी डीप है.. ये आप उसकी कलाकारी से जान सकते है.. एक ऐसी ही कला की सच्ची साधना करने वाली है जालंधर की मोनोक्रोम और मिश्रित-मीडिया चित्रकारी में पारंगत हासिल करने वाली चित्रकार सुरुची शर्मा। अपनी चित्रकारी में प्रकृति से जुड़ाव को दिखाने वाली सुरुची की पिछले दिनो एक प्रदर्शनी में आदिवासी जीवन और उनकी सादगी की कहानियों को बयां करने के लिए मोनोक्रोम चित्रकारी ने कला जगत से जुड़े लोगो का ध्यान अपनी तरफ खींचा। जानते है कि प्रकृति को अपनी चित्रकारी में जीवित करने वाली सुरुचि शर्मा कौन है और कैसे शुरु हुई उनकी चित्रकारी की यात्रा।
सुरुचि शर्मा जालंधर की रहने वाली है, वहीं से उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा भी हासिल की थी, सुरुचि कहती है कि चित्रकारी के प्रति लगाव उन्हें तब शुरु हुआ जब वो तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। उन्हें कला की प्रेरणा उनकी दादी से मिली थी, जिन्हें बचपन से वो जटिल मेहंदी के डिज़ाइन, रंगोली और खुद अपने हाथो से रंग बिरंगी गुड़िया बनाते देखती थी। अपनी दादी के हाथों की कला को वो उनके पास घंटो बैठ कर देखा करती थी, जिससे उनके मन में भी कुछ ऐसा करने की इच्छी जागने लगी, जिसमें दादी की कला की खूबसूरती भी शामिल हो, बस फिर क्या था, उन्होंने चित्रकारी में हाथ आजमाना शुरू कर दिया।
अपनी कला को निखारने के लिए सुरुचि ने अपीजय कॉलेज में एडमिशन ले लिया, जहां से उनके करियर को नई दिशा मिली.. लेकिन आज सुरुचि को जो पहचान हासिल हुई है वो उन्हेंरवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित कला-आधारित केंद्र शांतिनिकेतन में जाकर मिली थी, जहां उनके गुरु, डॉ. सुरजीत कौर और बसुदेव बिस्वास ने उनकी कला पर भरोसा जताया औऱ उनकी कलात्मक पहचान को और ज्यादा तराश। वो चित्रकारी तो करती थी लेकिन उन्होंने तब तक एक लक्ष्य नहीं बनाया था कि वो किस तरह की चित्रकारी करेंगी, लेकिन साल 2002 में उन्हें शहरी की धूलभरे शोर से हटकर महाराष्ट्र के एक आदिवासी गांव सथल वाडा में 4 महीने बिताने का मौका मिला.. इस दौरान सुरुचि एक स्वतंत्र कलाकार की तरह ही थी, लकिन इन 4 महीने के प्रवास ने उन्हें उनके उस मकसद से मिला दिया था जो उन्हें संपूर्ण कलाकार बनाने वाला था।
वहां के रोजमर्रा के जीवन में मौजूद शांत लय और प्राकृतिक परिवेश को गहराई से समझा, प्रकृति और सादगी से परिपूर्ण गांव का जीवन उन्हें इतना प्रभावित कर गया कि वो सबकुछ उनकी चित्रकारी में भी उतरने लगा। वहां कर सुरुचि ने गांव की गहराई को, वहां के जीवन शैली को चित्रकारी के रूप में उतारा था, जब वो गांव से लौटी तो उन्होंने जिमखाना क्लब में ‘इन सर्च’ नाम से गांव में बनाई सारी पेंटिग की प्रदर्शनी लगाई थी। ये प्रर्दशनी काफी सक्सेसफुल रही थी औऱ सुरुचि मोनोक्रोम एकरंगीय शैली की चित्रकारी करने वाली कलाकार के रूप में प्रसिद्ध हो गई। उनकी चित्रकारी की सबसे बड़ी खासियत है कि मानव आकृतियाँ बनावट और छाया से इस तरह उभरती है जैसे वो एक यथार्थवादी और स्वप्निल लगने वाली दुनिया से हो। उनकी हाथो से बनी मिश्रित माध्यम की कृतियों कला से प्रेम न करने वालों को भी अपनी ओर आकर्शित कर लेती है।
उनकी कलाओं को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कोई जीवित चित्रकारी हो। सुरुचि पिछले 2 दशको से चित्रकारी के माध्यम से जालंधर का नाम पूरी दुनिया में रोशन कर रही है। प्रकृति के साथ उनका लगाव उनकी कला में साफ दिखाई देता है। सुरुचि चित्रकारी करने के साथ साथ अब वर्तमान में वो जालंधर के डीएवी पब्लिक स्कूल में आर्ट एजुकेटर है। जो बच्चों की रचनात्मक भावनाओं को जीवित रखने और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने वाली कला की शिक्षा देती है। सुरुचि की कला भारतीय संस्कृति को एक नए रूप में देखने की प्रेरणा देती है।































