Mongla Port Bangladesh: भारत की सीमा से महज 80 KM दूर, जो बंदरगाह कभी भारत के लिए बेहद रणनीतिक बंदरगाह माना जाता था, आखिर आज बांग्लादेश उसे भारत से वापस क्यों ले रहा है? जानिए साल 2015 के उस समझौते का सच, जिसे रद्द करके बांग्लादेश अब यह रणनीतिक जमीन चीन की झोली में डालने जा रहा है।
क्या है 2015 की महाडील?
साल 2015 में जब बांग्लादेश ने भारत को मोंगला पोर्ट (Mongla Port) के इस्तेमाल की अनुमति दी थी, तब भारत और बांग्लादेश के बीच कनेक्टिविटी, व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से यह महाडील एक मील का पत्थर साबित हुई थी। जून 2015 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश का दौरा किया था, तब तत्कालीन बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ मिलकर कई ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे।
पूर्वोत्तर राज्यों के लिए खुला सीधा रास्ता
बता दें कि इस महाडील के तहत बांग्लादेश ने भारत को अपने दो सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों—मोंगला पोर्ट (Mongla Port) और चटगाँव पोर्ट (Chattogram Port) के इस्तेमाल की मंजूरी दी थी। इसके जरिए भारत को अपने मुख्य भूभाग (जैसे कोलकाता) से मोंगला पोर्ट होते हुए देश के पूर्वोत्तर राज्यों (North-East States) जैसे त्रिपुरा, मेघालय और असम तक माल भेजने का सीधा रास्ता मिल गया। इस समझौते से पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुंचाने की दूरी और समय दोनों बहुत कम हो गए थे।
110 एकड़ का ‘भारतीय आर्थिक क्षेत्र’
इस डील का सबसे बड़ा हिस्सा मोंगला पोर्ट के ठीक बगल में 110 एकड़ जमीन पर एक विशेष ‘भारतीय आर्थिक क्षेत्र’ (Indian Economic Zone) विकसित करना था। इस जमीन पर भारतीय कंपनियों को अपनी फैक्ट्रियां, वेयरहाउस और लॉजिस्टिक्स हब बनाने थे। इस प्रोजेक्ट को विकसित करने के लिए भारत सरकार ने बांग्लादेश को लाइन ऑफ क्रेडिट (LoC) यानी बेहद कम ब्याज पर करोड़ों डॉलर का कर्ज देना तय किया था।
भारत सरकार ने 2018 में मोंगला पोर्ट की इस जमीन को डेवलप करने का जिम्मा हीरानंदानी ग्रुप को सौंपा था, जिसके साथ 2022 में बांग्लादेश ने फाइनल एग्रीमेंट किया। लेकिन अब बांग्लादेश की नई हुकूमत ने भारत को बाहर करने के लिए इसी टाइमलाइन का इस्तेमाल किया। उन्होंने आरोप लगाया कि दो साल बीत जाने के बाद भी भारतीय कंपनी ने जमीन पर कोई काम शुरू नहीं किया। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक तकनीकी बहाना है, असली मकसद भारत को हटाकर चीन को एंट्री देना था।
समय और पैसे की बचत
साल 2015 में ही दोनों देशों ने कोस्टल शिपिंग एग्रीमेंट पर भी हस्ताक्षर किए। इसके तहत भारत और बांग्लादेश के जहाजों को एक-दूसरे के बंदरगाहों पर सीधे आने-जाने की अनुमति मिली। इससे पहले भारत से बांग्लादेश जाने वाले मालवाहक जहाजों को श्रीलंका (कोलंबो) या सिंगापुर होकर जाना पड़ता था, जिससे समय और पैसा दोनों बर्बाद होते थे। मोंगला पोर्ट को इस समझौते के तहत ‘पोर्ट ऑफ कॉल’ (Port of Call) घोषित किया गया था।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने 2015 में भारत को आवंटित मंगला पोर्ट को अब चीन को सौंपने का फैसला किया है, जो भारतीय सीमा से मात्र 80 किमी दूर स्थित है। पिछले साल भारत के साथ हुए इस करार को रद्द करने के बाद अब इस रणनीतिक बंदरगाह पर चीन की सीधी मौजूदगी होगी। यह भू-राजनीतिक बदलाव… pic.twitter.com/RjZkfQ7zM0
— Nedrick News (@nedricknews) June 27, 2026
भारत के लिए यह क्यों थी ‘महाडील’?
भारत को अपने उत्तर-पूर्वी राज्यों (North-East States) तक सामान पहुंचाने के लिए हमेशा सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के बेहद संकरे और संवेदनशील रास्ते पर निर्भर रहना पड़ता था। युद्ध या आपातकाल की स्थिति में इस रास्ते पर खतरा हमेशा बना रहता है। मोंगला पोर्ट मिलने से भारत को पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक सुरक्षित और वैकल्पिक समुद्री रास्ता मिल गया था।
मोंगला पोर्ट (Mongla Port ) पर भारत की मौजूदगी बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में चीनी नौसेना के बढ़ते दखल को रोकने के लिए भारत का सबसे बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक हथियार थी। भारत यहाँ से चीन की हर हरकत पर सीधे नजर रख सकता था।
आखिर बांग्लादेश ने समझौता क्यों किया रद्द?
साल 2024 में शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा भूचाल आया। पहले मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और फिर जून 2026 में बनी नई सरकार का रुख भारत के प्रति काफी सख्त और विरोधी रहा है। बांग्लादेश की इस नई हुकूमत ने भारत के प्रभाव को कम करने के लिए शेख हसीना के समय हुए सभी बड़े समझौतों की समीक्षा (Review) शुरू की और मोंगला पोर्ट (Mongla Port ) प्रोजेक्ट को निशाना बनाया।
चीन पिछले कई सालों से बांग्लादेश को अरबों डॉलर का कर्ज देकर अपने पाले में करने की कोशिश में जुटा था। बांग्लादेश की नई सरकार को भारी आर्थिक मदद की जरूरत थी और चीन ने इसी मजबूरी का फायदा उठाया। मोंगला पोर्ट के पास मौजूद भारतीय इकोनॉमिक जोन की जमीन को भारत से छीनने के लिए बीजिंग ने बांग्लादेश पर भारी कूटनीतिक दबाव बनाया।
बांग्लादेश की सरकार ने इस महाडील को रद्द करने के लिए एक तकनीकी बहाना सामने रखा। उनका आरोप था कि भारत के हीरानंदानी ग्रुप को साल 2022 में अंतिम मंजूरी मिलने के बावजूद, कंपनी ने अगले दो सालों में जमीन पर कोई बड़ा मैन्युफैक्चरिंग या इंफ्रास्ट्रक्चर का काम शुरू नहीं किया। इसी धीमी रफ्तार का हवाला देकर प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया गया, जो कि महज एक बहाना था।
मोंगला पोर्ट की इस रणनीतिक जमीन को भारत से छीनने का असली मकसद इसे चीन की सरकारी कंपनी (CCECC) को सौंपना था। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार भारत के मुकाबले चीन को अपना सबसे बड़ा रणनीतिक और व्यापारिक पार्टनर मान रही है, और यह फैसला उसी का नतीजा है।































