Sikhism in Afghanistan: अफगान सिखों का संघर्ष, तालिबान के कब्जे के बाद भारत से लेकर कनाडा तक कुछ ऐसा रहा उनका सफर

👤 vickynedrick@gmail.com | Nedrick News 🕒 Published: 31 दिसम्बर 2024, 12:00 AM 🔄 Updated: 31 दिसम्बर 2024, 12:00 AM
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Sikhism in Afghanistan: 2021 में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर तालिबान का कब्जा होने के साथ ही देश में लोकतांत्रिक सरकार का अंत हो गया। इस घटनाक्रम ने न केवल देश में रह रहे अल्पसंख्यकों को बुरी तरह प्रभावित किया, बल्कि अफगान सिख और हिंदू समुदाय के लिए जीवन बेहद कठिन बना दिया। तालिबान के कब्जे (Taliban takeover of Afghanistan) के बाद अफगान सिखों और हिंदुओं के लिए अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़ना मजबूरी बन गई। भारत सरकार ने उनकी मदद के लिए विशेष प्रयास किए, और वे तस्वीरें आज भी लोगों के जेहन में हैं, जब अफगान सिख परिवार सिर पर पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब लेकर काबुल एयरपोर्ट से निकले थे।

Sikhism in Afghanistan Taliban
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भारत से कनाडा की ओर पलायन- Sikhism in Afghanistan

तालिबान के अत्याचारों से बचकर भारत आए सिखों का जीवन हालांकि सुरक्षित हुआ, लेकिन उनके लिए बेहतर भविष्य की तलाश जारी रही। अब उनमें से अधिकांश कनाडा में बस गए हैं। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत आए लगभग 350 अफगान सिखों में से दो-तिहाई, यानी 230 सिख, अब कनाडा में रह रहे हैं। कनाडा में निजी प्रायोजक और सिख फाउंडेशन ने इन शरणार्थियों को बसाने में बड़ी भूमिका निभाई।

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कनाडा में बेहतर जीवन की शुरुआत

टोरंटो में रह रहे एक अफगान सिख ने बताया कि उन्हें कनाडा में सोशल सिक्योरिटी कार्ड, बैंक अकाउंट, और परमानेंट रेजीडेंस (PR) मिल चुका है। यहां तक कि तीन साल बाद वे कनाडा की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। कनाडा में इन सिख परिवारों को शुरुआती एक साल के लिए मंथली स्टाइपेंड, रहने के लिए घर, राशन, मोबाइल फोन, और बच्चों की मुफ्त शिक्षा जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं।

अफगानिस्तान में सिखों का इतिहास

अफगानिस्तान में सिखों का इतिहास सदियों पुराना है। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव ने 15वीं सदी में काबुल की यात्रा की थी, और उसके बाद कई सिख परिवार वहां बस गए। 1970 के दशक में अफगानिस्तान में सिखों की आबादी लगभग 5 लाख थी। लेकिन 1978 में शुरू हुई जंग और तालिबानी शासन के बढ़ते अत्याचारों के चलते उनकी आबादी तेजी से कम होती चली गई।

गुरुद्वारों और मंदिरों की तबाही

अफगानिस्तान में धार्मिक स्थलों को भी तालिबानी हिंसा का सामना करना पड़ा। 1989 की जलालाबाद लड़ाई के दौरान अफगानिस्तान के लगभग सभी गुरुद्वारे और मंदिर तबाह हो गए। 2022 में काबुल स्थित गुरुद्वारा करते परवान पर भीषण हमला हुआ, जिसमें कुछ लोगों की मौत हो गई, लेकिन इमारत को नुकसान नहीं पहुंचा।

भारत में सिखों की मदद

अफगान सिखों के भारत आने के बाद खालसा दीवान वेलफेयर सोसाइटी ने उनकी मदद का बीड़ा उठाया। हालांकि, अभी भी 120 सिख परिवार कनाडा के वीजा का इंतजार कर रहे हैं। भारत से कनाडा जाने वाले सिखों में से अधिकतर कंस्ट्रक्शन, ट्रक-ड्राइविंग, और पेट्रोल पंपों पर काम कर रहे हैं।

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तालिबानी कब्जे के बाद सिखों का पलायन

अफगानिस्तान में सिखों की स्थिति दशकों से बिगड़ती जा रही थी, लेकिन तालिबान के कब्जे के बाद यह पूरी तरह असहनीय हो गई। 2021 के बाद सिखों के लिए अफगानिस्तान में रहना लगभग नामुमकिन हो गया। उनकी सुरक्षा और अस्तित्व के लिए भारत उनका पहला ठिकाना बना। हालांकि, बेहतर भविष्य की तलाश में अब वे कनाडा या अमेरिका जैसे देशों का रुख कर रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन की आवश्यकता

अफगान सिखों की कहानी केवल धार्मिक उत्पीड़न का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह एक पूरी मानवता के लिए चिंता का विषय है। तालिबानी कब्जे के बाद अफगानिस्तान में न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों, बल्कि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों का भी हनन हुआ है।

नया जीवन, नई चुनौतियां

कनाडा में पहुंचने के बाद भी इन सिख परिवारों को अपने जीवन को दोबारा बसाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, कनाडा सरकार और सिख फाउंडेशन के प्रयासों से वे अब एक स्थिर और सुरक्षित जीवन जीने की ओर बढ़ रहे हैं।

भारत का योगदान

भारत ने तालिबान के कब्जे के समय अफगान सिखों की मदद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उनकी दीर्घकालिक बसावट और पुनर्वास में अब अन्य देशों का समर्थन आवश्यक हो गया है।

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