Shibu Soren Death News: कब बिगड़ी शिबू सोरेन की तबीयत? झारखंड के ‘गुरुजी’ की मौत से जुड़ा हर सवाल यहां जानिए

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 04 अगस्त 2025, 05:30 AM Updated: 04 अगस्त 2025, 05:30 AM
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Shibu Soren Death News: झारखंड की राजनीति से आज एक बहुत बड़ा नाम हमेशा के लिए चला गया। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को सुबह निधन हो गया। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उन्होंने सुबह 8:48 बजे अंतिम सांस ली। वो 81 साल के थे और बीते कई हफ्तों से बीमार चल रहे थे। उनकी मौत की खबर फैलते ही पूरे झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई। लोग उन्हें प्यार से ‘गुरुजी’ या ‘दिशोम गुरु’ कहकर बुलाते थे, और आज वही गुरुजी सबको हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। अब सवाल है कि आखिर शिबू सोरेन का निधन कैसे हो गया, आइए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।

और पढ़ें: Shibu Soren Death: झारखंड के ‘गुरुजी’ नहीं रहे, झारखंड मुक्ति मोर्चा सुप्रीमो शिबू सोरेन का निधन

कब से बीमार थे गुरुजी? (Shibu Soren Death News)

खबरों की मानें तों, शिबू सोरेन को कई बीमारियां थीं। वह 19 जून 2025 से दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में भर्ती थे। उन्हें किडनी की पुरानी बीमारी थी, डायबिटीज और दिल से जुड़ी दिक्कतें भी थीं। हाल ही में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आया था, जिसके बाद उनकी हालत और बिगड़ गई। वो डायलिसिस पर थे और उनकी बायपास सर्जरी भी हो चुकी थी। जुलाई में तबीयत थोड़ी ठीक हुई थी, लेकिन अगस्त की शुरुआत में हालत फिर गंभीर हो गई और उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था।

उनके इलाज में सीनियर डॉक्टर्स की पूरी टीम जुटी थी, लेकिन इस बार वो जिंदगी की जंग हार गए। उनके साथ उनकी पत्नी कल्पना सोरेन, बेटे और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पूरा परिवार मौजूद था।

हेमंत सोरेन ने क्या कहा?

पिता के निधन पर हेमंत सोरेन ने बेहद भावुक होकर कहा,
“आज मैं शून्य हो गया हूं। गुरुजी हमें छोड़कर चले गए।”

ये शब्द सुनकर समझा जा सकता है कि सिर्फ एक पिता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, एक साथी और झारखंड की आत्मा आज हमेशा के लिए खो गई।

कौन थे शिबू सोरेन?

शिबू सोरेन के बारे में बात करें, तो वह सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, वो एक आंदोलन थे। झारखंड के आदिवासी समुदाय के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 1970 के दशक में जब महाजनों का शोषण चरम पर था, तब उन्होंने लड़ाई छेड़ी।

कहा जाता है कि उनके पिता सोबरन मांझी की हत्या ने उन्हें झकझोर दिया और यहीं से उनके सामाजिक संघर्ष की शुरुआत हुई। 1973 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। उन्होंने झारखंड को बिहार से अलग एक राज्य बनाने की लड़ाई सालों तक लड़ी, और आखिरकार 2000 में ये सपना पूरा हुआ।

आपको बता दें, वो तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। आठ बार दुमका से लोकसभा सांसद और तीन बार राज्यसभा सांसद भी रहे। हालांकि उनके राजनीतिक करियर में विवाद भी रहे, लेकिन उनका योगदान इतना बड़ा था कि उस पर ये बातें भारी नहीं पड़ीं।

झारखंड में गहरा शोक

गुरुजी के जाने की खबर से पूरे राज्य में उदासी छा गई है। लोग सोशल मीडिया पर उन्हें याद कर रहे हैं, श्रद्धांजलि दे रहे हैं। राज्य सरकार अब उनके अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटी है। माना जा रहा है कि उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

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