चंडीगढ़ के पास छिपा है 5000 साल पुराना महानगर! जानिए संघोल का अनसुना इतिहास – Sanghol History

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 04 Jun 2026, 04:22 PM | Updated: 04 Jun 2026, 04:22 PM

Sanghol History: पंजाब केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी भारत के लिए एक अहम क्षेत्र रहा है। सबसे पुरानी और संपन्न ह़ड़प्पा सभ्यता का पंजाब की धरती पर फलना फूलना हो, या फिर सिख धर्म जैसे महान धर्म का स्थापना की धरती हो… इन्ही ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है संघोल..जिसे कुषाण काल में महानगर का दर्जा प्राप्त हुआ था। य़हां की खुदाई में एक तरफ जहां हडप्पा सभ्यता के अवशेष मिले है तो वहीं मौर्येत्तर काल तक की भी निशानियां मिलती है।

इतना ही नहीं संघोल बुद्ध काल के समय में भी काफी अहम नगरी मानी गई है, जिसका जिक्र खुद चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपने लेखों में लिखा है। अपने इस लेख में हम जानेंगे पंजाब की धरती के पहले महानगर संघोल के बारे में.. कैसे ये महानगर कई कालो को खुद में समेटे हुए है, साथ ही कैसे संघोल कैसे बौद्ध धर्म की प्रमुख नगरी भी बन गई।

संघोल का वो इतिहास जो आज भी हैरान करता है

चंडीगढ़ से करीब 42 किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे 5 के पास एक कस्बा है सघोल.. जब आप संघोल को करीब से जानेंगे तो समझ सकेंगे कि ये कोई आज की नगरी नहीं बल्कि करीब 5000 साल पुराने इतिहात को खुद में समेटे हुए है। केवल सिखों के लिए के लिए ही नहीं बल्कि हिंद, पहलो, कंफिसियस, कुषाण, मौर्य, हुण, यवन और मुगलों का भी एक बड़ा इतिहास सघोल की भूमि से जुड़ा है।

व्य़ापार का मुख्य केंद्र संघोल

हड़प्पा सभ्यता की शुरुआत के समय से ही संघोल उत्तर भारत में सभ्यता व संस्कृति की धरोहरों में सबसे अहम नगर रहा है। सघोल की खोजबीन चार चरणों में की गई है, जिसमें सबसे पहले 1964 में खुदाई की गई थी, जिसके दौरान कुषाण काल के अवशेष में पहली सदी से लेकर तीसरी शताब्दी ईसवी के अवशेष प्राप्त हुए… जो बताते है कि तब ये शहर विकसित था औऱ अपने चरम पर था, ये व्य़ापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था।

वहीं 1968 में खुदाई की गई तो एक प्रचीन बौद्ध स्तूप  मिला था, उसके बाद 1985 में खुदाई की गई जिसमें पहली और दूसरी शताब्दी ईस्वी की 117 पत्थर की संरचनाएं मिली जो असल में मथुरा कला की मूर्तियां है। खुदाई के दौरान यहां से हूण शासक तोरामान, मिहिरकुल,  गोंदों कंफिसियस, कुषाण और अर्ध जनजातीय, के साथ साथ हिंद, पहलो, के समय की भी मुद्रायें मिली थी, जिससे पुरातत्विद ऐसा मानते है कि हो न हो, यहां टकसाल भी जरूर मौजूद होगा।

बौद्ध धर्म के अवशेष

1968 में खुदाई के दौरान यहां बौद्ध स्तूप होने के निशान मिले थे। इतिहासकारों के अनुसार यहां सम्राट अशोक ने अपनी 84 हजार स्तूपों में से पांच स्तूप यहां भी बनवाये थे, लेकिन फिलहाल आपको केवल 2 स्तूपों के होने के ही साक्ष्य मिलते है, लेकिन बाकि के 3 स्तूपों को यहां के लोगो ने जाने अंजाने में नष्ट कर दिया था। बौद्ध अभिलेखों में इस स्थान को संघल कह कर बुलाया गया है, जो बाद में संघोल नगर कहलाने लगा था। वहीं चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के वृतांत के अनुसार ये बौद्ध स्तूप का मिले अवशेष असल में ईसा पूर्व सातवीं सदी के हो सकते है। ये वो समय था जब पंजाब की धरती पर  विशिष्ट कला शैली विकसित होनी शुरु ही हुई थी, उस समय के  वृहद स्तूप के भग्नावशेष इस समय को दर्शाते है। हालांकि हुणों के आक्रमण के कारण ये स्थान बुरी तरह से नष्ट हो गया.. जिसे अब तक कई बार बसाया गया है।

क्या है दंतकथा

इस स्थान को लेकर एक दंतकथा भी है, जिसके अनुसार ये स्थान राजा भरतरी की राजधानी हुआ करती है, जिसकी राजधानी संगलादीप हुआ करती थी। दंतकथाओं के अनुसार संघोल का ही प्राचीन नाम संगलादीप भी हुआ करता था। वहीं पंजाब के लोक कहानियों में रूप बसंत का जिक्र मिलता है, जिसके अनुसार राजा भरतरी के दो बेटे थे रूप औऱ बसंत। दोनो की मां का निधन होने के बाद राजा ने दूसरी शादी कर ली थी, लेकिन सौतेली मां ने दोनो भाईयो को साजिश कर के महल से निकलवा दिया.. दोनो में एक भाई रूप महल पहुंच गया औऱ दूसरा बसंत झोपड़ी में पहुंच गया। लेकिन दोनो भाईयो का प्रेम कम नही हुआ.. और दोनो ने संसारिक मोह को छोड़ कर आध्यत्म को अपना लिया था। जिसे आज भी पंजाब की लोक संस्कृति में गाया और सुना जाता है।

संघोल की खुदाई में मिले अवशेषों को सहेजने के लिए यहां पर सरकार ने संघोष संग्रहालय भी बनवाये है, जहां आपको हड़प्पा से लेकर मोर्य काल तक के करीब 15000 अवशेष देखे जा सकते है। संघोल आज के समय में एक महत्वपूर्ण पुरातत्व साइट है, जो इतिहास के उन पन्नों की कहानी कह रहा है, जिसके बारे में शायद चर्चा भी न की जाती हो। अपना महान इतिहास जानकर हमेशा गर्वित महसूस कराने वाली ये धरती.. हमेशा खास है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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