Baba Ala Singh: 1801 में जब महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में सिख सम्राज्य की स्थापना की थी, उससे पहले पंजाब की भूमि 12 मिसलों में बंटी हुई थी, जिन्हें महाराजा रणजीत सिंह ने एक करने की कोशिश की थी, उन्हीं मिसलों में से एक था फूलकियान मिसल। जिन्हें फूलकियान राजवंश भी कहा जाता है, इस राजवंश की स्थापना भले ही चौधरी फूल सिद्धू-बरार ने की थी लेकिन इसे राजवंश में बदलने का श्रैय जाता है बाबा अला सिंह को, जिन्होंने पटियाला शहर को बसाया था, किला मुबारक बनवाया था और मुगल और अफगान दुर्रानी साम्राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया था, तो वहीं फूलकियान राजवंश ने सिख सम्राज्य के वर्चस्व से खुद को बचाने के लिए ब्रिटिश हुकुमत से हाथ मिलाया था।
इतना ही नहीं एक तरफ जहां 1839 में महाराजा रणजीत सिंह जी के मरने के बाद सिख सम्राज्य तबाह हो गया औऱ अंग्रेजी हुकूमत के हाथों में चला गया था तो वहीं फूलकियान राजवंश एक ऐसा राजवंश था जिसने भारत की आजादी तक पटियाला पर शासन किया था। अपने इस लेख में हम पटियाला के महाराजाओं के बारे में जानेंगे जो पंजाब के प्रमुख ‘फूलकियान राजवंश’ के दौरान शासक थे.. जिनकी शुरुआत बाबा आला सिंह से हुई थी।
फुलकियन वंश की वंशावली
दरअसल इतिहासकारों के अनुसार फुलकियान वंश के सदस्य रावल जैसल सिंह के छोटे बेटे हेम से अपना ताल्लुक बताते थे, जिन्होंने 1156 से1168 तक शासन किया था, उन्होंने ही जैसलमेर राज्य की स्थापना की थी औऱ वो वहां के पहले शासक भी थे। वहीं इस फूलकियान मिसल की स्थापना करने वाले चौधरी फूल सिंह सिद्धू-बरार, जिन्हें बाबा फूल के नाम से भी जाना जाता है, वो छठे गुरू गुरु हरगोबिंद के एक प्रमुख सिख मोहन के पोते थे। बाबा फूल फुलकियान मिसल के संस्थापक थे , जिनका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया था। आगे जाकर मुगलो ने बाबा फूल को चौधरी की आधिकारिक उपाधि दे दी, और वो मुगलो के सहायक सरदार भी बने.. यानि की फुलकियान राजवंश ने अन्य सिखों का तरह मुगलो से दुश्मनी नहीं मोली,, बल्कि उनके साथ चले थे।
1763 में फुलकियान राजवंश की स्थापना
जब बाबा अला सिंह ने 1763 में फुलकियान राजवंश की स्थापना की थी, तब दो सालो के बाद ही 7 अगस्त 1765 को उनकी मौत हो गई थी, जिसके बाद उनके जिवित बचे पोते अमर सिंह को फुलकियान समाज्य की गद्दी सौंपी गई.. क्योंकि बाबा अला सिंह के तीन बेटो की पहले ही मौत हो चुकी थी। अमर सिंह को पहला राजसी प्रतीक दिया गया था, जिसके बाद पटियाला राज्य एक स्वतंत्र राज्य के रूप में 1809 तक राज करता रहा था, ऐसे में जब महाराजा रणजीत सिंह ने सभी मिसलो को एक करना शुरु किया तब 1809 में इसके राजा ने अंग्रेजी हुकुमत के साथ संधि कर ली थी और 1947 तक वो अंग्रेजी हुकुमत के अधीन रह कर ही शासन किया था।
पटियाला को ब्रिटिश संरक्षण में रख दिया
बाबा अला सिंह के उत्तराधिकारी अमर सिंह को 1767 में राजा-ए-राजगन बहादुर की उपाधि दी गई थी, जो कि 1782 तक अमर सिंह की मृत्यु तक थी, जिसके बाद पटियाला समुदाय की गद्दी साहिब सिंह को दी गई थी। जिसने 1813 तक पाटिलाया पर शासन किया था। इस दौरान उन्होंने भी अला सिंह की परंपरा को बनाए रखा और अंग्रेजी हुकूमत से बैर लेने के बजाए 1809 की अमृतसर संधि के तहत पटियाला को ब्रिटिश संरक्षण में रख दिया, जिससे महाराजा रणजीत सिंह ने पटियाला पर कभी चढ़ाई नहीं की उल्टा 1813 में करम सिंह के गद्दी संभालने के बाद 1814 के बाद पटियाला में महत्वपूर्ण वृद्धि औऱ विकास हुआ।
यानि की अंग्रेजी हुकुमत के साथ हाथ मिलाकर उन्हें फायदा ही हो रहा था, इसलिए जब 1845 में पहला एंग्लो-सिख युद्ध हुआ तब पटियाला की सैन्य ताकतों ने अंग्रेजी हुकुमत का साथ दिया, जिससे खुश होकर ब्रिटिश हुकुमत ने शिवालिक पहाड़ियों से उत्तर की ओर राजस्थान तक दक्षिण की ओर और ऊपरी यमुना और सतलुज का क्षेत्र पटियाला रियासत को दे दिया। फुलकियान रियासत अपने समय की दूसरी सबसे मजबूत रियासत बन गई थी।
भूपिंदर सिंह ने महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया
इसके बाद गद्दी गई महाराजा राजिंदर सिंह के हाथों में जिन्होंने अंग्रेजी हुकुमत के अधीन रह कर पटियाला को बखूबी संभाला था, लेकिन 1900 में उनकी मृत्यु हो गई औऱ 8 नवंबर 1900 के 9 साल के भूपिंदर सिंह को पटियाला की गद्दी दी गई, लेकिन तब भी उनके पास पूर्ण सत्ता नहीं थी, उनके सही उम्र तक आने तक 4 अप्रैल 1910 तक एक रीजेंसी परिषद ने शासन किया..जिसके बाद उन्हें गद्दी मिली थी। लेकिन एक तरफ महाराजा भूपिंदर सिंह ने महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया और औपनिवेशिक प्रशासन के साथ बेहतर रिश्ते किये थे तो वहीं राजसी वैभव दिखाने के लिए फिजूलखर्ची भी खूब की जाती थी। 10 आधिकारिक पत्नियों के साथ-साथ 350 महिलाओं का एक हरम हुआ करता था, उनके पास करीब 44 रॉल्स रायस कारें होने की भी जानकारी मिलती है, 2,930 हीरे, बर्मी माणिक और 234 कैरेट का पीला हीरा शामिल करके पटियाला हार बनवाया था।
हालांकि उन्होंने कई ऐसे कार्य भी किये जो उनके आधुनिक सोच का नतीजा थी, उन्होंने आर्थिक स्थिरता बनाये रखने के लिए स्टेट बैंक ऑफ पटियाला की स्थापना की और पटियाला में शहरी सुधारों की देखरेख खुद की थी, वो बेहतर खिलाड़ी भी थे, और उन्होंने रणजी ट्राफी को शुरू करने के लिए 500 डॉलर दिय थे। लेकिन 1938 में उनकी मृत्यु के बाद 23 मार्च 1938 को उनके बेटे यादवेंद्र सिंह गद्दी पर बैठे, उन्होंने अपने पिता वाली गलती नहीं की बल्कि बचे हुए संसाधनों को सार्वजनिक कल्याण, शिक्षा और बुनियादी विकास करने के ले किया, उन्होंने आधुनिकीकरण , स्वास्थ्य सेवा और कृषि उत्पादकता में सुधार लाने का काम किया। इतना ही नहीं दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने खालसा डिफेंस ऑफ इंडिया लीग की स्थापना की जिसके कारण सिख सैनिकों को ब्रिटिश सेना में शामिल होने में आसानी हुई। महाराज यादवेंद्र ने जिन्ना का पाकिस्तान में विलय करने का ऑफर ठुकरा कर 5 मई 1948 को औपचारिक रूप से विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर पटियाला को भारत का हिस्सा माना, भारत सरकार ने भी उन्हें 1948 से 1956 तक पीईपीएसयू के राजप्रमुख नियुक्त कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने विस्थापित सिखों को फिर से बसाने के लिए काम किया था। जिसके बाद पटियाला पूर्ण रूप से भारत का हिस्सा हो गया। और ऐसे और ऐसे फुलकियान राजवंश की सत्ता समाप्त हुई थी। आपको ये जानकारी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।
































