Ram Mandir: ये दौर था 17वी सदी के आसपास का.. ये वो समय था जब सिख समुदाय असल मे खुद को सनातनी संस्कृति से अलग नहीं मानता था, स्वयं सिख गुरुओ ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम से खुद को जोड़ कर कई बार प्रस्तुत किया है। लेकिन हैरानी की बात है कि पंजाब की धरती से राम जी का बहुत गहरा सबंध है.. जिसे समय के साथ भुला दिया गया… इतना ही नहीं राम जी के परम भक्त को दिया गया एक भेंट आज सिख धर्म की मजबूत नींव का हिस्सा है..
लेकिन अक्सर उसे अनदेखा करके बदलते समय के साथ सिखों औऱ सनातन को बिल्कुल अलग कर दिया गया। लेकिन जब आप सिख ग्रंथो को पढेंगें तो पायेंगे कि राम सिखों के लिए भी कितने जरूरी है। सिख संस्कृति में रामायण और उनके किरदारो को महत्ता दी जाती है. अपने इस लेख हम बात करेंगे सिखों की धरती पंजाब का रामायण काल से क्या संबंध है, साथ ही निहंगो के लिए राम और हनुमान इतने अहम क्यों है।
दशम ग्रंथ में श्री राम के राज्यभिषेक की घड़ी की कल्पना – Ram Mandir
दशम गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखित दशम ग्रंथ में श्री राम का जिक्र है, जिसमें गुरु साहिब ने उन्हें धरती पर मानव कल्याण और धर्म की रक्षा कर उसे फिर से स्थापित करने के लिए आने वाले 24 अवतारों में से एक माना है। गुरु साहिब ने दशम ग्रंथ में श्री राम (Ram Mandir)के राज्यभिषेक की घड़ी की कल्पना कर बहुत सुंदर पंक्तियां लिखी थी। दशम ग्रंथ की 680 पेज नंबर से लेकर 694 पेज नंबर तक गुरु साहिब ने केवल श्रीराम के राज्यभिषेक होने और उस वक्त जो माहौल था, उसका वर्णन खुद किया है। इन पक्तियों में गुरु साहिब ने राम का जिक्र करते हुए कहा था कि जिसकी जैसी भावना होगी राम उनको उसी रूप में दिखेंगे।
वहीं गुरबाणी में भी आपको कई बार राम का वर्णन मिलता है, गुरु साहिबानो को असल में राम के नाम को मोक्ष के रास्ते पर जाने का मार्ग बताया है। पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अंग 339 में संत कबीरदास की बानी मौजूद है। जो प्रभु से जुड़ने का मार्ग बता रहे है औऱ प्रभु से जुड़ने के बाद उन्हें कैसा महसूस हो रहा है उसके बारे में बताया है। यानि की राम से सिखों का नाता हमेशा से रहा है.. जो साफ करता है कि सनातन के प्रति सिख कभी उदासीन नहीं थे।
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पंजाब की धरती पर रामायण की धरोहर – Ram Mandir
इतिहासकारों के अनुसार रामायण को अपने शब्दों में पहली बार शब्दों में उतारने वाले महर्षि वाल्मिकी की तपोभूमि के रुप में अमृतसर का जिक्र किया है। कहा जाता है कि अमृतसर में मौजूद श्री राम तीर्थ (Ram Mandir) स्थल महर्षि वाल्मिकी का आश्रम हुआ करता था, जहां माता सीता अपनी गर्भावस्था के दौरान रही थी औऱ यहीं पर श्रीराम के दोनो बेटे लव और कुश का जन्म हुआ था और उन्होंने अपना बचपन यहीं बिताया था। अमृतसर के कलेर में दिवाली के 15 दिन बाद आयोजित होने वाला राम तीर्थ मेला पूरे भारत में काफी मशहूर है, ये मेला सिखों औऱ हिंदुओ दोनो के लिए काफी अहम माना जाता है। इतिहासकारो की माने तो लाहौर और कसूर को लव कुश ने ही बसाया था। वहीं गुरु साहिब ने अपनी आत्मकथा बिचित्र नाटक में खुद को श्री राम के पूर्वज लव के वंशज वेदी वंश का बताया है। वहीं प्रथम गुरु गुरू नानक देव जी को कुश के वंश का बताया है। लव के वंशज वेदी कहलाते थे औऱ कुछ के वंशज सोढी कहलाते थे।
निहंगो से राम का नाता – Ram Mandir
गुरु साहिब ने जब खालसा की स्थापना की थी, तब तक वो राम से काफी प्रभावित थे और उन्होंने श्रीराम का कई बार महिमामंडन किया था, लेकिन जब उन्होंने खालसा अपनाने वाले सिखों के लिए पंच ककार अनिवार्य किया तबव शायद बेहद कम लोग जानते है कि पंच ककार में से एक कचेहरा अथवा कच्छा असल में हनुमान जी से प्रेरित था, कछेहरा सबसे पहले श्री राम ने ही अपने परम भक्त हनुमान को दिए थे। जिसे दशम गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों के लिए सबसे महत्वपूर्ण परंपरा का हिस्सा बना दिया। यानि की दशवे गुरु ने खुद को कभी सनातन से अलग नहीं किया था।
वो राम (Ram Mandir) को न केवल मोक्ष का रास्ता मानते थे, बल्कि उनकी धरोहरो का अनुसरण भी करते थे। गुरु साहिब ने मुगलो ने राम जन्मभूमि की रक्षा के लिए अपनी खालसा सेना को आयोध्य भेजा था। सिख धर्म में राम का नाम निराकार और साकार रूप दोनो में ही माना जाता है। श्रीराम की धरोहर को केवल हिंदू ही नहीं बल्कि सिखों ने भी बहुत संभाला है उसका सम्मान किया है…और खालसा पंथ को राम के आदर्शो के अनुसार ही आगे बढ़ाया था। सिखों का रामायण और राम से गहरा नाता रहा है.. जिसे अब शायद हिंदू के साथ साथ सिख भी भुलाने लगे है। जबकि हमें अपने सहीं इतिहास का जब तक पता नहीं होगा तब तक आप उसके न्याय नही कर सकते है।





























