History of Qila Mubarak: वैसे तो जब बड़े बड़े विशाल किलो की बात आती है तो सबसे पहले राजस्थान का नाम लिया जाता है, लेकिन क्या हो अगर हम आपसे ये कहें कि अगर आपको वाकई में एक जीवंत किला देखना है तो आपको पंजाब के बठिंडा जाना चाहिए, जहां पहली शताब्दी का एक ऐसा किला मौजूद है, जिसे देखने के लिए खुद सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी भी गए थे। ये किला जो सिखों के इतिहास को तो खुद में समेटे हुए है साथ ही उस इतिहास का भी साक्षी है जब हूणों ने हमला किया था, ये साक्षी है भारत की पहली महिला सुल्तान रजिया सुल्तान के उस कैद का, जिसने कारण उनकी सल्नत चली गई।
जी हां हम बात कर रहे हैं पंजाब के दिल में बसी ऐतिहासिक नगरी बठिंडा में मौजूद किला मुबारक के बारे में। अपने इस लेख में हम जानेंगे इस ऐतिहासिक किले के बारे में, जो राजस्थान के किलो से कई सदी पहले बना था और आज भी जीवंत किला कहलाता है। ये किला जिसे प्रेम की, आध्यात्मिकता और प्राचीन समय के बेहतरीन कला की निशानी कहा जाता है। क्या है कहानी किला मुबारक की।
किला मुबारक का इतिहास – History of Qila Mubarak
पुरातत्व विभाग ने जब किला मुबारक के बनने के समय की जांच की तो वो भी हैरान रह गए। क्योंकि ये किला 90-110 ईस्वी में बनाया गया था। इसकी ईंटें कुषाण काल के समय की मापी गई। इसमें प्राचीन कुषाण साम्राज्य से संबंधित छोटी, पकी हुई लाल ईंटें मिली है। जिसे सम्राट कनिष्क के समय की मानी जा रही है। इतिहासकारों की माने तो ये किला राजा डब ने बनवाया था, जो कुषाण सम्राट कनिष्क के समकालीन शासक थे। असल में हूणों के आक्रमण से बचने और उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए बनाया था। 14.5 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैले इस किले में किले में 36 बुर्ज हैं, जिसमें सबसे ऊंचा बुर्ज 118 फीट ऊंचा है। ये किला दुश्मनों को भ्रमित करने के उद्देश्य से ही बनाया गया था जिसमें घनी गोलाकार संरचनाएँ और संकरे रास्ते बने हुए है। जो घेराबंदी करने में सहायक होती थी। इस किले को ‘तबर-ए-हिंद’ के नाम से भी जाना जाता था, जिसका मतलब होता है ‘भारत का प्रवेश द्वार। मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप में आने के लिए ये सबसे सुगम प्रवेश द्वारा हुआ करता था। यानि की बठिंडा बाहरी आक्रमणकारियों का प्रवेश द्वार होता था, जहां ये किला उन्हें रोकने के लिए बनाया गया था। जो करीब 2000 साल पुराना है। ये एक अभेद्य किला रहा है जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ‘राष्ट्रीय महत्व का स्मारक’ घोषित कर दिया है।
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रजिया सुल्तान से जुड़ा इतिहास – History of Qila Mubarak
दरअसल रजिया सुल्तान सन 1236 में भारत की पहली महिला शासक बनी थी, औऱ दिल्ली की गद्दी पर बैठी थी, लेकिन ये गद्दी उन्हें इतनी आसानी से नहीं मिली थी। उन्होंने अपने भाईयों के बीच अपनी काबिलियत साबित की थी लेकिन, पुरुष प्रधान समाज को एक महिला का शासक बनना स्वीकार नहीं था.. 1240 ईस्वी में बठिंडा के गवर्नर मलिक इख्तियार-उद-दीन अल्तुनिया ने विद्रोह कर दिया था जिसे दबाने के लिए रजिया खुद गई थी, लेकिन अल्तुनिया ने धोखे से रजिया को किला मुबारक में कैद कर लिया औऱ शर्त रखी थी कि जब रजिया उससे शादी करेगी तभी वो रिहा हो सकेगी। रजिया ने मजबूरन हामी भरी और शादी की थी, लेकिन जब अल्तूनिया की सेना दिल्ली में कूच कर रही थी तभी रास्ते में हरियाणा के कैथल में डाकुओ ने रजिया औऱ अल्तूनिया पर हमला कर दिया औऱ दोनो की हत्या कर दी थी। ये किला रजिया के प्यार और त्याग की कहानी कहता है।
सिख धर्म से जुड़ा इतिहास –
किला मुबारक के अंदर आपको सिख गुरुद्लारा भी मिलता है, जो इस स्थान पर सिखों के वर्चस्व औऱ उनके प्रभाव को दर्शाता है। इतिहासकारों के अनुसार प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी अपनी उदासी की यात्रा के दौरान 1515 में किला मुबारक में कुछ समय गुजारने के लिए आये थे। उनके यहां आने के निशान आज भी मौजूद है वहीं उनके बाद नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी भी लगभग हर उस स्थान पर गए थे जहां प्रथम गुरु के चरण पड़े थे औऱ वो लगभग 1665 में किला मुबारक के दौरे पर आये थे।
गुरु साहिब ने सभी शहीद वीरों को अंतिम विदाई
लेकिन बार बार आक्रमण और बदलते समय के साथ किले को काफी नुकसान भी हुआ, जिसके बाद जब दसवे गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1705 में खिदराना दी ढाब जिसे अब मुक्तसर कहा जाता है, को जीता था, गुरु साहिब के साथ छोड़ कर चले गए 40 सिख योद्दाओ ने माता भाग कौर के नेतृत्व में फिर से गुरु साहिब की सेना में शामिल होकर भीषण युद्ध लड़ा था, मुगलो की सेना पीछे हट गई थी और गुरु साहिब ने सभी शहीद वीरों को अंतिम विदाई देकर अपनी विजय के बाद किला मुबारक गए थे।
किला मुबारक सिख सम्राज्य का हिस्सा
जिसके बाद ये किला काफी समय तक मुगलो के पास ही थी लेकिन 1754 में, पटियाला रियासत के बाबा अला सिंह ने कमजोर हो चुकी मुगल सेना से लोहा लिया औऱ किला मुबारक पर कब्जा कर लिया। जिससे किला मुबारक सिख सम्राज्य का हिस्सा बन गया। बाबा अला सिंह ने किला मुबारक का नाम बदल कर गुरु गोबिंद सिंह के नाम पर गोबिंद गढ़ कर दिया था। उन्होंने किले परिसर के भीतर एक गुरुद्वारा बनवाया जो कि सिख गुरु गोबिंद सिंह जी के याद में बनाया गया था। इसके अलावा पटियाला के राजा करम सिंह ने दूसरे गुरुद्वारे का निर्माण कराया था। जो कि आध्यात्मिक ऊर्जा और ऐतिहासिक श्रद्धा से भर देता है। सिख पर्वों के दौरान सैकड़ो सिख यहां जमा होते है।
इस किले में फ्री एंट्री है, साथ ही ये सोमवार को बंद रहता है। सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक आप किले में जा सकते है। ये किला असल में आपको इतिहास की उस सैर पर ले जाता है, जो आपको बताता है कि भारत की भव्यता क्या रही होगी.. पंजाब की भव्य़ता क्या रही होगी। किला मुबारक का इतिहास, इसकी भव्यता आपको खुद पर गौरव करने का मौका देती है।






























