India China Tension: भारत के तेजी से बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक प्रभाव के बीच चीन की एक चाल आखिरकार उसी पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन और कई बड़े मेट्रो प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी टनल बोरिंग मशीन (TBM) की आपूर्ति में आई देरी ने भारत को बड़ा सबक दिया। अब सरकार ने फैसला किया है कि ऐसी महत्वपूर्ण मशीनों के लिए विदेशी, खासकर चीन पर निर्भरता कम कर स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके लिए कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित करने वाली नई इंसेंटिव योजना लाने की तैयारी चल रही है।
कैसे अटका भारत का बड़ा प्रोजेक्ट? India China Tension
टनल बोरिंग मशीन (TBM) का इस्तेमाल मेट्रो, रेलवे और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं में सुरंग बनाने के लिए किया जाता है। इन मशीनों की तकनीक जर्मनी की कंपनी Herrenknecht के पास है, लेकिन लंबे समय से इनका निर्माण चीन की फैक्ट्रियों में होता रहा है। यहीं से समस्या शुरू हुई। जब भारत के लिए इन मशीनों की सप्लाई की बारी आई, तो चीन ने एक्सपोर्ट क्लीयरेंस में देरी कर दी। इससे मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन समेत कई परियोजनाओं की गति प्रभावित हुई। तकनीक जर्मन कंपनी की होने के बावजूद निर्माण चीन में होने के कारण भारत को सप्लाई चेन से जुड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
अब चीन पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी
इस अनुभव के बाद भारत सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि भविष्य में ऐसी रणनीतिक मशीनों के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं रहा जाएगा। सरकार घरेलू स्तर पर हाई-टेक कंस्ट्रक्शन मशीनों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी नई योजना पर काम कर रही है। योजना का उद्देश्य केवल देश की जरूरतें पूरी करना नहीं है, बल्कि भारत को इन मशीनों का वैश्विक सप्लायर बनाना भी है। अगर यह पहल सफल होती है तो भविष्य में भारत में बनी मशीनें दुनिया के कई देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल हो सकती हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर की असली ताकत हैं ये मशीनें
आम तौर पर लोग एक्सप्रेसवे, मेट्रो या पुल देखते हैं, लेकिन इन्हें बनाने वाली भारी मशीनों की भूमिका कम चर्चा में रहती है। क्रेन, अर्थमूवर, माइनिंग एक्सकेवेटर और टनल बोरिंग मशीनें किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की रीढ़ मानी जाती हैं। BCG और CII की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट सेक्टर दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। वर्ष 2025 तक इस उद्योग की घरेलू मांग 17 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुकी है और इसमें हर साल 10 से 12 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ रही है। यह 2.5 प्रतिशत से बढ़कर करीब 4 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और अगले पांच वर्षों में 6.5 प्रतिशत तक जाने की संभावना जताई गई है।
माइनिंग सेक्टर में भी बढ़ेगी मांग
देश में इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर ऊर्जा और एडवांस टेक्नोलॉजी के विस्तार के साथ लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में खनन क्षेत्र में आधुनिक मशीनों की जरूरत भी तेजी से बढ़ेगी। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का माइनिंग और कंस्ट्रक्शन आउटपुट लगभग 430 अरब डॉलर का है, जो देश की जीडीपी का करीब 11 प्रतिशत योगदान देता है और 7 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका से जुड़ा है। यदि एडवांस ड्रिलिंग सिस्टम, विशाल एक्सकेवेटर और अन्य भारी उपकरण देश में बनने लगें, तो आयात पर निर्भरता काफी कम हो सकती है।
अभी किन चुनौतियों से जूझ रहा है भारत?
हालांकि आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ चुके हैं, लेकिन कुछ बड़ी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। फिलहाल भारत में बनने वाले कंस्ट्रक्शन उपकरणों में औसतन करीब 50 प्रतिशत ही स्थानीय कल-पुर्जों का इस्तेमाल होता है। हाइड्रोलिक सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट और अंडरकैरेज जैसे महंगे व महत्वपूर्ण कंपोनेंट अभी भी बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं। साधारण मशीनों में स्थानीयकरण 85 से 90 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, लेकिन भारी एक्सकेवेटर जैसी हाई-टेक मशीनों में यह आंकड़ा अभी भी 55 से 60 प्रतिशत के बीच है।
सरकार की प्रस्तावित योजना का मुख्य फोकस इसी अंतर को कम करना और महत्वपूर्ण मशीनों व कंपोनेंट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ाना होगा।
भारत बन सकता है दुनिया का नया सप्लायर
वैश्विक स्तर पर माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट उद्योग का आकार 420 से 440 अरब डॉलर के बीच माना जाता है। हर साल लगभग 150 अरब डॉलर की मशीनों का आयात होता है। भारत का निर्यात पिछले दशक में लगभग तीन गुना बढ़कर 4.9 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, खाड़ी देशों और दक्षिण अमेरिका में तेजी से बढ़ रहे इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के चलते नए अवसर भी बन रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई देश अब “चीन+1” रणनीति अपना रहे हैं और चीन के विकल्प की तलाश में हैं। ऐसे माहौल में यदि भारत घरेलू निर्माण क्षमता मजबूत कर लेता है, तो वर्ष 2047 तक वैश्विक निर्यात बाजार में करीब 20 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने की क्षमता रखता है। इससे भारत न केवल अपनी रणनीतिक निर्भरता कम करेगा, बल्कि दुनिया के लिए भरोसेमंद इंफ्रास्ट्रक्चर मशीनरी सप्लायर के रूप में भी उभर सकता है।
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