Bargi Dam water tunnel: मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र के लिए लंबे समय से जिस परियोजना का इंतजार किया जा रहा था, वह अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। करीब 17 साल पहले शुरू हुई महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत कटनी जिले के स्लीमनाबाद में बन रही देश की सबसे बड़ी वाटर टनल लगभग तैयार हो चुकी है। 11.95 किलोमीटर लंबी इस सुरंग में अब केवल 108 मीटर खुदाई का काम बाकी है, जिसे जून 2026 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस परियोजना के पूरा होते ही बरगी बांध का पानी पहली बार विंध्य क्षेत्र के रीवा, सतना, मैहर और पन्ना जिलों तक पहुंचेगा। इसके अलावा कटनी जिले को भी पीने के पानी की बड़ी सुविधा मिलने वाली है। सरकार का दावा है कि इस योजना से क्षेत्र की लगभग 1.85 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिलेगा।
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17 साल तक चुनौतियों से जूझती रही परियोजना | Bargi Dam water tunnel
साल 2008 में शुरू हुई इस परियोजना को पूरा करना आसान नहीं था। लगभग 1500 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना के सामने कई बार ऐसे हालात आए जब काम पूरी तरह ठप होने की स्थिति में पहुंच गया। खुदाई के दौरान इंजीनियरों को संगमरमर, चूना पत्थर, मिट्टी और विशाल चट्टानों का मिश्रण मिला। इन कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों के कारण कई बार मशीनों के महंगे कटर टूट गए। जानकारी के अनुसार, करीब 67 करोड़ रुपये मूल्य के कटर बदलने पड़े।
साल 2013 में तो सुरंग के भीतर मीथेन गैस का रिसाव भी हुआ, जिसके कारण चार महीने तक काम रोकना पड़ा। इतना ही नहीं, लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत वाली अमेरिकी मशीन भी परियोजना की चुनौतियों के सामने ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई।
जर्मन मशीन कर रही अंतिम खुदाई
टनल के अंतिम हिस्से में इस समय एक अत्याधुनिक जर्मन टनल बोरिंग मशीन (TBM) काम कर रही है। 100 मीटर से अधिक लंबी यह विशाल मशीन अब आखिरी 108 मीटर की खुदाई पूरी करने में जुटी हुई है। सुरंग के अंदर तापमान और नमी का स्तर इतना अधिक है कि वहां काम करने वाले मैकेनिक लगातार तीन घंटे से ज्यादा समय तक काम नहीं कर सकते। उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए नियमित निगरानी की जा रही है।
यह मशीन केवल खुदाई ही नहीं करती, बल्कि सुरंग को स्थायी आकार देने का काम भी साथ-साथ करती है।
जमीन से 30 मीटर नीचे बन रही है सुरंग
परियोजना की जटिलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह सुरंग जमीन से लगभग 30 मीटर नीचे बनाई जा रही है। अंदर का वातावरण किसी भूमिगत नदी जैसा महसूस होता है। टनल के भीतर प्रवेश करते ही हर तरफ पानी दिखाई देता है। कई हिस्सों में करीब तीन फीट तक पानी भरा रहता है। इसी कारण सुरंग के अंदर चलने वाली लोको ट्रेन की रफ्तार महज 3 से 4 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है।
करीब 6.30 किलोमीटर अंदर तक पहुंचने में लगभग 1 घंटा 20 मिनट का समय लगता है। सुरंग के भीतर हर मिनट करीब 32 हजार लीटर भूजल बाहर निकाला जा रहा है। इसके लिए पांच डीवाटरिंग स्टेशन लगातार काम कर रहे हैं।
तिमंजिला इमारत जितनी चौड़ी है सुरंग
इस वाटर टनल का व्यास 10.14 मीटर है, जो लगभग एक तीन मंजिला इमारत की ऊंचाई के बराबर चौड़ाई मानी जा सकती है। इसकी मजबूती सुनिश्चित करने के लिए अंदर M-50 ग्रेड सीमेंट की विशेष रिंग्स लगाई गई हैं। प्रत्येक रिंग का वजन लगभग 1420 किलोग्राम है और इन्हें 100 साल से अधिक समय तक टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यही रिंग्स सुरंग को मजबूत संरचना प्रदान करती हैं।
किसानों और आम लोगों को मिलेगा बड़ा फायदा
नर्मदा घाटी विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश राजौरा के अनुसार, परियोजना के पूरा होने के बाद विंध्य क्षेत्र की 1.85 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। इससे खेती की उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ किसानों की आय में भी सुधार होने की उम्मीद है।
साथ ही कटनी जिले में पेयजल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों को भी राहत मिलेगी। वर्षों से जिस नर्मदा जल परियोजना का इंतजार किया जा रहा था, वह अब जमीन पर उतरने के बेहद करीब पहुंच चुकी है। अगर सब कुछ तय समय के अनुसार रहा, तो जून के अंत तक देश की इस ऐतिहासिक जल सुरंग का निर्माण पूरा हो जाएगा और विंध्य क्षेत्र में विकास का एक नया अध्याय शुरू होगा।






























