Punjab History 1980: मौजूद समय में अगर आप किसी राज्य के मुद्दों तो सबसे ज्यादा ज्वलित होते देखते है तो वो ज्यादातर नोर्थइस्ट के राज्य है, अक्सर नॉर्थईस्ट के रहने वालों को भारत के अन्य राज्यों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, उनकी सुरक्षा को लेकर उठने वाली संसद की आवाज भी सुनी जा सकती है लेकिन इन मुद्दों के बीच जिन्हें वाकई में नेगलेट किया गया, जहां सबसे ज्यादा इस वक्त मदद की जरूरत है, वो है पंजाब.. पंजाब जिसने एत नहीं दो नहीं बल्कि 3 बंटवारे सहें है, समय के साथ कभी धर्म के नाम पर तो कभी भाषा के आधार पर कई बार बंट तो गया, मगर पंजाब ने अपनी वास्तविकता को, अपनी मूल पहचान को बनाये रखने की भरसक कोशिश की…मगर अब शायद पंजाब फिर से अपनी पहली पहचान नहीं पा सकेगा। पंजाब ऐसे कई बदलाव हुए जिसके कारण हम पंजाब के बदलावों को सकारात्मक भी मान सकते है.. क्योंकि 80 के दशक में पंजाब की जो स्थिति थी, पंजाब फिर से कभी उस स्थिति में जाने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा। अपने इस वीडियो में हम बात करेंगे कि पंजाब की स्थिति में कैसे और कब कब बदलाव हुए और उसका मौजूदा स्थिति पर क्या असर होगा।
पंजाब तीन बंटवारों का दर्द!
80 के दशक के पंजाब की बात करें तो पंजाब खालिस्तानी समर्थक संगठनो की मांग की आग में जलने लगा था। जरनैल सिंह भिंडरांवाले और उनके समर्थकों ने जिस तरह से मुसलमानों के लिए पाकिस्तान दिया गया था वैसे ही सिखों के लिए भारत से अलग खालिस्तान की मांग शुरु कर दी थी, लेकिन ये मांग शांति से नहीं थी, बल्कि उसके लिए मासूम लोगो को खून बहाने से भी बाज नहीं आये.. उनकी अराजकता के कारण पूरा पंजाब जल रहा था.. वो इतने पर ही नहीं रूके थे, उन लोगो ने सरकार को झुकाने के लिए स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था, जिसके कारण ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था।
हालांकि इस एक ऑपरेशन ने भले ही भिंडरेवाला और उसके समर्थकों का सफाया किया हो लेकिन स्वर्ण मंदिर को हुए नुकसान के कारण सिख समुदाय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गई.. और उनकी निर्मम हत्या भी इसी कारण हुई.. मगर सिखों की स्थिति अब भी कहां सुधरने वाली थी, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ एक बड़ी साजिश के तहत दंगे कराये गए, नतीजा सैकड़ों सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया.. सिखों को शांति से जीने के लिए कई सालों तक संघर्ष करना पड़ा.. धीरे धीरे वो अपनी जमीन तलाश ही रहे थे कि कश्मीर में रह रहे सिखों को 90 के दशक में वहां से भी त्रासदी झेलनी पड़ी। पूरा 80 का दशक सिखो के लिए केवल अंगारों पर चलने जैसा था.. हालांकि 90 के दशक में सिखों की स्थिति कुछ सुधारने लगी और पंजाब की भी.. मगर साल 2023 में फिर से पंजाब के 80 के दशक जैसे पंजाब में तब्दील करने की बड़ी साजिश का पता चला।
23 अप्रैल 2023 को पंजाब से अमृतपाल सिंह संधू नाम के एक कुख्यात आरोपी को गिरफ्तार किया गया..अमृतपाल संधू ये वहीं शख्स है, जिसने पंजाब में फिर से खालिस्तान की मांग को न केवल तेज किया बल्कि पाकिस्तान के साथ मिलकर उन सिखो को भी टारगेट किया जा रहा था जो खालिस्तान बनाने में उसका साथ देते। 17 जनवरी 1993 को अमृतसर के बाबा बकाला के जल्लूपुरा खेरा में जन्मा अमृतपाल सिंह एक कट्टरपंथी खालिस्तानी मुखिया है। करीब एक दशक तक दुबई में रह कर खालिस्तान समर्थको की एक टोली बनाई.. और सितबंर 2022 में पंजाब लौट आया। लेकिन वो शायद सबकी नजरो में न आता अगर उसने पंजाब दे लिट यानि की पंजाब के वारिस नाम से एक अभियान न शुरु किया होता।
हालांकि उसके अभियान में युवाओ को संदेश दिया जा रहा था कि वो नशे से दूर रहे, सिख धर्म की सभी परंपरा को मानने का संदेश था, लेकिन जो सरकार को चुभा वो था एक संप्रु सिख राज्य यानि की खालिस्तान बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। खुफिया एंजेसी की जानकारी कहती है कि संधू ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ मिलकर आनंदपुर खालसा फौज नाम की एक नीजि मिलिशिया की स्थापना की, जिसमें उसने कई आधुनिक हथियाओं का भंडारण किया।
जब सरकार को इसकी जानकारी लगी तो ये समझते देर न लगी कि 80 के दशक की अराजकता को फिर से वापिस लाने की तैयारी है.. लेकिन इस बार पंजाब फिर से 80 के दशक के पंजाब में तब्दील नहीं होने वाला, वो इसका रिस्क ही नहीं ले सकता था, बस फिर क्या था। केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर ऑपरेशन चलाया और संधू को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि संधू की गिरफ्तारी ने ये तो साबित कर दिया कि अब अलगाववादियों की साजिशे काम नहीं करेगी.. लेकिन फिर भी संधू हिरासत के बाद भी पंजाब की राजनीति का सक्रिय हिस्सा बना रहा।
आपको जानकर हैरानी होगी कि संधू ने सार्वजनिक मंचो पर नशा विरोधी भाषण दिये लेकिन वो दुबई और लंदन के उन लोगो के संपर्क में था जो पंजाब में नशे का व्यापार बढ़ा रहे थे। नशाखोरो को इलाज के बहाने नशा मुक्ति केंद्रों में लाया जाता और उन्हें आनंद खालसा फौज में भर्ती करवाने का आरोप लगा।
वहीं 2024 में संधू के भाई को फिल्लौर में गैरकानूनी रूप से मेथम्फेटामाइन ले जाने के मामले में गिरफ्तार किया गया। यानि की संधू का ड्रग्स व्यापार से सीधा कनेक्शन रहा। संधू ने कई मंचो पर कहा कि खालिस्तान की मांग करना उनका अधिकार है। ये एक विचारधारा है, जो किसी के मरने से नहीं मरती.. वो आगे बढ़ती रहती है। खालिस्तान बन कर रहेगा…और जिसने भी उन्हें रोकने की कोशिश की तो उनका हश्र भी वहीं होगा जो इंदिरा गांधी का हुआ था।
पंजाब जो कि पाकिस्तान का एक सीमार्वती राज्य है, आतंकवाद और अलगाववाद दोनो की आग में जला है.. और अब भी जल रहा है, केंद्र और राज्य सरकार के बीच समरसता न होने का फायदा इन खालिस्तानी समर्थको को और मजबूत कर सकता है। ऐसे में जरूरी है कि आपसी तालमेल से इस संवेदनशील मुद्दे को समझा और सुलझाया जाये। नहीं तो स्थिति 80 के दशक से भी ज्यादा बुरी हो सकती है।






























