ATF Prices Rise: हवाई यात्रा करने वालों के लिए आने वाले दिनों में खर्च बढ़ सकता है। सरकारी तेल कंपनियों ने 9 जून से एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी विमान ईंधन की कीमतों में करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी है। राजधानी दिल्ली में एटीएफ की कीमत 1,04,927 रुपये प्रति किलोलीटर से बढ़कर 1,15,927 रुपये प्रति किलोलीटर हो गई है। ऐसे समय में यह फैसला आया है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पहले से ही दबाव में है।
हालांकि केंद्र सरकार ने एयरलाइनों को राहत देने के लिए एक नई मूल्य स्थिरीकरण योजना भी शुरू की है, लेकिन इसके बावजूद यात्रियों को सस्ते टिकट मिलने की उम्मीद फिलहाल कम नजर आ रही है।
पश्चिम एशिया संकट का सीधा असर| ATF Prices Rise
विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को झटका दिया है। इसी का असर विमान ईंधन की कीमतों पर भी पड़ा है। मार्च 2026 में जहां एटीएफ की कीमत करीब 60.50 रुपये प्रति लीटर थी, वहीं मई 2026 तक यह बढ़कर 142 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई। यानी महज दो महीनों में कीमतें लगभग ढाई गुना तक बढ़ गईं।
एयरलाइनों के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है क्योंकि किसी भी एयरलाइन की कुल परिचालन लागत में एटीएफ की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत होती है। संकट के समय यह हिस्सा 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। ऐसे में इंडिगो, एयर इंडिया और अकासा जैसी कंपनियों के लिए लागत नियंत्रण एक बड़ी चुनौती बन गया है।
क्या है सरकार की नई मूल्य स्थिरीकरण योजना?
बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने 10 हजार करोड़ रुपये का ATF प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड बनाया है। इस योजना के तहत सरकारी तेल कंपनियों को ब्याज मुक्त अग्रिम राशि दी जाएगी, ताकि वे घरेलू एयरलाइनों को अपेक्षाकृत स्थिर दर पर ईंधन उपलब्ध करा सकें। योजना के अनुसार एयरलाइनें अधिकतम तीन साल तक तय कीमत पर ईंधन खरीद सकेंगी। इसके लिए 86.32 रुपये प्रति लीटर का FOB बेंचमार्क तय किया गया है। एयरपोर्ट शुल्क, तेल कंपनियों के मार्जिन और टैक्स जोड़ने के बाद दिल्ली में इसकी प्रभावी कीमत करीब 115 रुपये प्रति लीटर बनती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें इस स्तर से ऊपर जाती हैं तो सरकार तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई करेगी। वहीं कीमतें कम होने पर अतिरिक्त राशि वापस सरकार को दी जाएगी।
एयरलाइनों को राहत, यात्रियों को नहीं
एयर इंडिया, इंडिगो और अकासा जैसी एयरलाइनों ने इस योजना का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे लागत का बेहतर अनुमान लगाने और भविष्य की योजना बनाने में मदद मिलेगी। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इससे हवाई टिकट सस्ते होंगे? फिलहाल इसका जवाब नकारात्मक दिखाई देता है। जानकारों का मानना है कि इस योजना का मकसद टिकटों की कीमत घटाना नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाली अचानक और भारी बढ़ोतरी को नियंत्रित करना है। यानी फिलहाल यात्रियों को सस्ती उड़ान का लाभ मिलने की संभावना कम है।
योजना की सबसे बड़ी चुनौती
इस योजना को लेकर सबसे बड़ी चर्चा इसकी स्वैच्छिक प्रकृति को लेकर हो रही है। एयरलाइनों के लिए इसमें शामिल होना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई एयरलाइन इस योजना से बाहर रहने का फैसला करती है तो उसे बाजार दर पर ही ईंधन खरीदना होगा, जो वर्तमान में काफी महंगा है। दूसरी तरफ यदि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में गिरावट आती है, तो योजना में शामिल एयरलाइनों को तय दर पर ही ईंधन खरीदना पड़ेगा, जबकि बाहर रहने वाली कंपनियां कम कीमत का फायदा उठा सकेंगी।
तेल कंपनियों पर भी बढ़ सकता है दबाव
सरकारी तेल कंपनियां पहले से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी क्षेत्र में वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं। ऐसे में 10 हजार करोड़ रुपये का यह फंड उन्हें कुछ समय के लिए राहत जरूर देगा, लेकिन यदि वैश्विक संकट लंबा खिंचता है तो इसकी पर्याप्तता पर सवाल उठ सकते हैं।
77 लाख नौकरियों पर भी नजर
सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य केवल एयरलाइनों को राहत देना नहीं है, बल्कि देश की एयर कनेक्टिविटी को बनाए रखना और एविएशन सेक्टर से जुड़ी करीब 77 लाख नौकरियों को सुरक्षित रखना भी है।





























