Mount Everest glacier melting: मई 2023 की कड़कड़ाती ठंड में समुद्र तल से 5300 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद माउंट एवरेस्ट का खुम्बू ग्लेशियर किसी शांत, वीरान पहाड़ जैसा नहीं बल्कि किसी आलीशान पहाड़ी रिसॉर्ट जैसा नजर आ रहा था। 1600 से ज्यादा टेंट, चारों तरफ धुआं उगलते जनरेटर, एस्प्रेसो कॉफी मशीनों की आवाज, बड़े-बड़े टीवी स्क्रीन, गर्म पानी के शावर और जमीन पर कालीन के नीचे अंडरफ्लोर हीटिंग सिस्टम।
मगर इस लग्जरी और चकाचौंध के बीच एक शख्स हाथ में डायरी और पेन लिए चुपचाप घूम रहा था। वह न तो टेंटों की गिनती कर रहा था और न ही चोटी फतह करने पहुंचे लोगों की तस्वीरें खींच रहा था। वह बस इस बात का बारीक हिसाब लगा रहा था कि इस पूरे कैंप में मौजूद लोग दिनभर में कितनी बार पेशाब करने जा रहे हैं।
यह शख्स कोई आम इंसान नहीं, बल्कि नेपाल के चीफ सर्वे ऑफिसर और जियोस्पेशियल साइंटिस्ट खिमलाल गौतम थे। उस वक्त भले ही लोगों को उनका यह काम अजीब लगा हो, लेकिन तीन साल बाद जुलाई 2026 में जब उनकी यह चौंकाने वाली रिसर्च अंतरराष्ट्रीय साइंस जर्नल ‘रीजनल एनवायरमेंटल चेंज’ में छपी, तो पूरी दुनिया के होश उड़ गए।
सिर्फ एक सीजन में पिघल गई 2,492 टन बर्फ| Mount Everest glacier melting
रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि 2023 के केवल एक क्लाइंबिंग सीजन में इंसानों की पैदा की गई स्थानीय गर्मी की वजह से खुम्बू ग्लेशियर की करीब 2,492 टन बर्फ पिघल गई। गौर करने वाली बात यह है कि यह पिघलन केवल सूरज की गर्मी या मौसम के सामान्य बदलाव से नहीं हुई, बल्कि कैंप में जलते हीटरों, चूल्हों, जनरेटरों और इंसानी शरीर की गर्मी व पेशाब से पैदा हुई।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हर वसंत के मौसम में बेस कैंप पर विलासिता और सुख-सुविधाएं जुटाने के चक्कर में लगभग 30 लाख किलोग्राम (3000 टन) ग्लेशियर की बर्फ पिघलकर बह जाती है। 2023 के सीजन में ही 1,600 टेंटों में खाना बनाने और हीटिंग के लिए 824 एलपीजी सिलेंडर, 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर गैसोलीन जलाया गया था।
154 टन बर्फ पिघलने के लिए इंसानी पेशाब जिम्मेदार
इस स्टडी का सबसे सनसनीखेज पहलू इंसानी पेशाब से जुड़ा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अकेले खुम्बू ग्लेशियर में करीब 154 टन बर्फ पिघलने के लिए पर्वतारोहियों का पेशाब जिम्मेदार रहा। खिमलाल गौतम बताते हैं कि ऊंचाई पर पर्वतारोहियों को डिहाइड्रेशन से बचने के लिए लगातार भारी मात्रा में पानी पीना पड़ता है, जिससे वे रोजाना भारी मात्रा में यूरिन पास करते हैं। बेस कैंप में रोजाना 6,000 लीटर से ज्यादा इंसानी अपशिष्ट बनता है।
हालांकि कैंप के टॉयलेट्स का ठोस कचरा ड्रमों में भरकर नीचे लाया जाता है, लेकिन ज्यादातर लोग खुले ग्लेशियर पर ही पेशाब कर देते हैं। यही ग्लेशियर नीचे रहने वाले स्थानीय लोगों के पीने के पानी का मुख्य जरिया है।
दोगुनी रफ्तार से तप रहा है बेस कैंप
इस स्टडी में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) की वैज्ञानिक वर्जीनिया बर्केट ने भी मदद की। उन्होंने 1991 से 2023 तक के बादलों से मुक्त सैटेलाइट थर्मल डेटा का बारीकी से अध्ययन किया। जब बेस कैंप के तापमान की तुलना ग्लेशियर के बाकी हिस्सों से की गई, तो पता चला कि इंसानी दखल वाले बेस कैंप का तापमान बाकी बर्फीले इलाकों के मुकाबले दोगुनी तेजी से बढ़ा है।
गौतम का कहना है कि 2023 में 478 परमिट जारी हुए थे, जबकि 2026 में यह संख्या बढ़कर करीब 490 तक पहुंच गई। गाइड, शेर्पा, कुक और डॉक्टरों को मिलाकर हर सीजन में यहां 2,000 से ज्यादा लोगों का पूरा अस्थाई कस्बा बस जाता है।
ग्लेशियर फटने और बाढ़ का बड़ा खतरा
त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के क्लाइमेट साइंटिस्ट डॉ. सुदीप ठाकुरि का मानना है कि ईंधन के मुकाबले यूरिन का असर अनुपात में कम हो सकता है, लेकिन यह स्थानीय इकोसिस्टम के लिए टाइम बम जैसा है। साल 2009 के बाद से एवरेस्ट के ग्लेशियरों के पिघलने की दर पहले ही दोगुनी हो चुकी है। गौतम ने आगाह किया है कि इस तरह बर्फ पिघलने से खतरनाक ग्लेशियल झीलें बनती हैं, जिनके फटने (GLOF) से वैसी ही प्रलयंकारी बाढ़ आ सकती है जैसी हाल ही में नेपाल और चीन के सीमावर्ती इलाकों में देखने को मिली। वहीं, 1981 में अकेले एवरेस्ट फतह करने वाले रिसर्चर पीटर हैकेट ने कहा कि इस तरह बर्फ पिघलने से हिमस्खलन का खतरा तो बढ़ेगा ही, साथ ही दुनिया के सबसे पवित्र पर्वत पर जगह-जगह इंसानी कचरे और जमे हुए मलमूत्र के ढेर देखना बेहद शर्मनाक और भयावह है।














































