जब कैंसर पीड़ित चंद्रशेखर के पिता दिल्ली AIIMS में  तड़प रहे थे, नहीं मिली थी भर्ती, जानिए पूरी कहानी

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 11 अगस्त 2024, 05:30 AM Updated: 11 अगस्त 2024, 05:30 AM
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भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद आज भले ही सांसद हों, भले ही वे सत्ता में आ गए हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उन्हें अपनी जाति के कारण काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा था। गरीबी में पले-बढ़े चंद्रशेखर उर्फ ​​रावण ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया है। एक समय तो उनकी गोली मारकर हत्या करने की साजिश तक रची गई थी। इसके अलावा उन्हें 16 महीने जेल में बिताने पड़े थे। लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा दिन भी था जिसकी याद आज भी उनकी रूह को डरा देती है और वे खुद को बेहद असहाय महसूस करते हैं। आइए आपको बताते हैं उस किस्से के बारे में।

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बचपन से सहा भेदभाव

3 दिसंबर 1986 को सहारनपुर में जन्मे चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सहारनपुर के ठाकुर छज्जू सिंह पुंडीर एएचपी इंटर कॉलेज से प्राप्त की। एक इंटरव्यू में वे बताते हैं कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा। चंद्रशेखर कहते हैं कि कई बार ऊंची जातियों के बच्चे हमें पीटते थे। जब हम इस बारे में प्रिंसिपल या टीचर से शिकायत करते थे तो वे उल्टा हमें ही डांटते थे।

How to meet Chandrashekhar Azad Ravan
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पिता के साथ भेदभाव की कहानी

चंद्रशेखर आज़ाद के पिता गोवर्धन दास शिक्षक थे। आज़ाद के दो भाई हैं: बड़े भरत सिंह और छोटे कमल किशोर। आज़ाद कहते हैं कि शिक्षक होने के बावजूद मेरे पिता को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। पहली बार उन्हें ऊंची जाति के गांव में भेजा गया। जब वे स्कूल गए तो लोग उनसे पूछने लगे, “मास्टर जी, आपका गिलास कहाँ है?” यहाँ आपको अपना गिलास अलग रखना पड़ता है। जब वे घर गए तो उन्होंने मुझे पूरी घटना के बारे में बताया, जिसे सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा।

Chandrasekhar's father AIIMS story
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वो दिन जिसे आज भी नहीं भूला पाए चंद्रशेखर

ANI को दिए एक इंटरव्यू में चंद्रशेखर आज़ाद ने 11  साल पहले हुई उस घटना का जिक्र किया हीसे वह आजतक नहीं भूले हैं। इंटरव्यू में उन्होंने बताया, ‘मेरे पिता को कैंसर था। मैं उन्हें एम्स में भर्ती कराना चाहता था, लेकिन मेरे पास कोई कॉन्टैक्ट या सिफारिश नहीं थी। मैंने बहुत भागदौड़ की, लेकिन मेरी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं अपने पिता को एम्स में भर्ती नहीं करवा पाया। 11 जनवरी 2013 को देहरादून में मेरे हाथों उनकी मृत्यु हो गई। मैं आज भी उस घटना को नहीं भूल पाया हूँ। मैं अपने पिता की मदद करने में लाचार था और उस दिन से मैंने कसम खाई कि आज के बाद मैं अपने किसी भी प्रियजन को ऐसे नहीं जाने दूँगा। मैं अपनी गरीबी और लाचारी को इस मामले में कभी बाधा नहीं बनने दूँगा और मैं अपने परिवार के किसी भी सदस्य को ऐसे नहीं जाने दूँगा। जो मेरे पिता के साथ हुआ, मैं अपने किसी भी प्रियजन के साथ ऐसा नहीं होने दूँगा।’

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