Delhi midnight women safety: रात के ठीक 12 बज रहे हैं। पूरा शहर अब धीरे-धीरे नींद की आगोश में समा रहा है। बाजारों की बत्तियां बुझ चुकी हैं, दुकानें बंद हैं और सड़कों की चहल-पहल पूरी तरह शांत पड़ चुकी है। इक्का-दुक्का कारें, कोई थका-हारा ऑटो या तेज़ी से निकलती बाइक सड़क पर बस यही गिनती की गाड़ियां नज़र आती हैं। अमूमन ऐसे सन्नाटे में किसी महिला का अकेले दिखना लोगों को असहज कर देता है, लेकिन शनिवार की रात कालकाजी की सड़कों पर नज़ारा बिल्कुल जुदा था।
सड़क पर लड़कियों की एक टोली आराम से चहलकदमी कर रही थी। न चेहरे पर कोई हड़बड़ी, न कोई डर। यह नज़ारा उस सदियों पुरानी सोच को सीधी चुनौती दे रहा था, जो मानती है कि अंधेरा घिरते ही महिलाओं का घर में कैद हो जाना ही उनकी हिफाज़त का इकलौता रास्ता है।
‘दिल्ली सेफ नहीं’ की धारणा को सीधी चुनौती| Delhi midnight women safety
राजधानी में अक्सर यह बात हवा में तैरती रहती है कि ‘दिल्ली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है’। इसी डर और धारणा को पीछे छोड़ते हुए ‘वुमन वॉक एट मिडनाइट’ कैंपेन शनिवार रात कालकाजी की सड़कों पर उतरा। इस पहल का सीधा मतलब है महिलाओं को भी रात के समय पब्लिक स्पेस में उतना ही हक मिले, जितना किसी और को है। दिल्ली की जमीन पर यह कैंपेन साल 2016 में शुरू हुआ था। देखते ही देखते इस खूबसूरत सोच ने एक दशक का सफर पूरा कर लिया है।
बीते 10 सालों में यह आवाज सिर्फ दिल्ली की गलियों तक सीमित नहीं रही। यह कारवां चंडीगढ़, बेंगलुरु, गुवाहाटी, फरीदाबाद और जयपुर जैसे शहरों से होता हुआ सरहद पार नेपाल के काठमंडू और दमक तक जा पहुंचा है। इतना ही नहीं, ब्रसेल्स, शिकागो और डबलिन जैसे अंतरराष्ट्रीय शहरों में भी इसके चैप्टर्स शुरू हो चुके हैं। इस पहल में सिर्फ महिलाएं ही नहीं, बल्कि क्वीर कम्युनिटी के लोग, कॉलेज स्टूडेंट्स, आर्टिस्ट्स और कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
सुरक्षा नहीं, खुलकर जीने का हक
कैंपेन की फाउंडर और जानी-मानी थिएटर आर्टिस्ट मल्लिका तनेजा का कहना है कि उनका मकसद सिर्फ सुरक्षा के मुद्दे पर बात करना नहीं है, बल्कि रात के वक्त को खुलकर जीने के अधिकार को वापस पाना है। उनका मानना है कि रात सिर्फ पुरुषों के लिए नहीं होती। मल्लिका बताती हैं कि अब तक इस तरह की कई वॉक हो चुकी हैं और उनकी पूरी कोशिश रहती है कि महीने में कम से कम एक बार यह वॉक ज़रूर रखी जाए।
न कोई नारा, न बैनर—बस रात की ठंडी हवा और गपशप
कैंपेन से जुड़ी दृष्टि बताती हैं कि दिल्ली में इस साल यह वॉक दो बार आयोजित की जा रही है। उनका अंदाज किसी विरोध प्रदर्शन जैसा बिल्कुल नहीं होता। न कोई हाथ में बैनर थामता है, न ही ज़ोरदार नारेबाज़ी होती है। लड़कियां बस एक ग्रुप बनाकर निकलती हैं… सड़क किनारे टहलते हुए गपशप होती है, कहीं नुक्कड़ पर गरमा-गरम चाय की चुस्कियां ली जाती हैं, तो कहीं आइसक्रीम का लुत्फ उठाया जाता है। दृष्टि कहती हैं, “अगर कोई हमें घूरता है या टोकता है, तो अमूमन हम उसे अनदेखा कर देते हैं। हम वहां किसी से बहस करने या झगड़ने नहीं, बल्कि उस पल को खुलकर एंजॉय करने जाती हैं।”
हर मोहल्ले की अपनी वॉक, अपनी टाइमिंग
इस कैंपेन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे कोई भी होस्ट कर सकता है। जो होस्ट करता है, वॉक उसी के इलाके में रखी जाती है। इससे फायदा यह होता है कि लोकल व्यक्ति को पहले से पता होता है कि कौन सी सड़क बंद है, कहां खुदाई चल रही है या किस गली में लाइट की व्यवस्था सही है।
इलाके और माहौल के हिसाब से समय तय किया जाता है। कई बार यह वॉक रात 11 से 1 बजे तक चलती है, तो कई जगहों पर इसे रात 8 बजे से ही शुरू कर दिया जाता है। तादाद की भी कोई बंदिश नहीं है… कभी सिर्फ 4 लोगों की छोटी सी टुकड़ी निकलती है, तो कभी 50 लड़कियों का बड़ा हुजूम एक साथ कदम से कदम मिलाकर सड़कों पर उतर आता है। सन्नाटे को तोड़ती ये हंसी और बातें आज शहर को यह याद दिला रही हैं कि रातें सबकी हैं।














































