महार जाति को लेकर मशहूर विदेशी लेखक ने डॉ अंबेडकर की जीवनी में क्या लिखा है?

👤 vickynedrick@gmail.com | Nedrick News 🕒 Published: 24 फ़रवरी 2024, 12:00 AM 🔄 Updated: 24 फ़रवरी 2024, 12:00 AM
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भीमराव आंबेडकर एक ऐसा नाम है जिसके बगैर भारत के संविधान की परिकल्पना भी नही की जा सकती. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बाब साहेब का कद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समानांतर है. ज्यादातर लोग यह बाब साहेब को महज संविधान निर्माता के तौर पर जानते है, लेकिन ऐसा कतई नही है उन्होंने संविधान के साथ देश की प्रगति के लिए समाज में अनेक कुरीतियों को भी खत्म करने का कार्य किया.

ऐसा कहा जाता है की बाबा भीमराव आंबेडकर अपने दौर में सबसे ज्यादा पढ़े लिखों की श्रेणी में आते थे. उनकी अपनी लाइब्रेरी में 35000 से ज्यादा पुस्तकों का संग्रह था. जानकारों के मुताबिक यदि उन्हें कोई भोजन पर आमंत्रित करता था, तो वह कहते थे कि खाना लेकर मेरे घर आ जाओ बाहर जाने और खाना खाने और बेफजूल की बातों में मेरा कम से कम एक घंटा व्यर्थ होगा जिसे मैं किसी अच्छे कार्य में लगा सकूं तो व्यर्थ होगा. इस लेख में आज हम आपको मशहूर लेखर क्रिसतोफ जाफ्रलो ने बाबा साहेब की जीवनी में महार जाति को लेकर क्या लिखा है, इसके बारे में बताएंगे.

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बाबा साहेब के परिवार का विवरण

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू मिलिट्री छावनी में हुआ था. उनके पिता रामजी सकपाल और दादा सेना में कार्यरत थे. बाब साहेब के पिता 1866 में अंग्रेजों की सेना में भर्ती हुए और तरक्की पाते हुए सूबेदार के पद तक पहुंचे. उसके बाद वह सैनिक स्कूल हेडमास्टर नियुक्त हुए, बाबा साहेब की मां भी एक बड़े सैनिक विरासत के महार परिवार से थीं. साथ ही उनके नाना और उनके छह भाई मेजर, सूबेदार के पद पर रह चुके थे.

बाबा साहेब के पिता ने 1890 में अंग्रेजों की सेना में महारों की तरफ से चलाए गए अभियान में सक्रिय सद्स्य के रूप में कार्य किया था. 1892-1893 के मध्य अंग्रेजी हुकूमत ने निर्णय लिया था कि महारों को ब्रिटिश सेना में बड़े स्तर पर भर्ती नहीं किया जाएगा. क्योंकि मराठा जातियों के लोग बैरकों में महारो के साथ आपसी मेलजोल नही बढ़ाना चाहते थे. इस तरह डॉ अंबेडकर के पिता महारों की पीढ़ी के अंतिम सदस्य थे जिन्होंने ब्रिटिश सेना में काम किया.

महार जाति को लेकर कही है ये बात

अब आते हैं विदेशी लेखक क्रिस्तोफ जाफ्रलो की पुस्तक पर…उन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर की जीवनी लिखी. जिसका हिंदी रुपांतरण किया योगेंद्र दत्त ने. पुस्तक में बताया गया है कि डॉ अंबेडकर जिस महार जाति में जन्मे थे वह मांग यानी रस्सी बनाने वाले और चंभार यानी चमड़े का काम करने वाली जाति के मध्य पड़ने वाली एक अछूत जाति थी. इस जाति को जिस तरह के कार्य करने को दिए जाते थे, उसके कारण उन्हें छिटपुट व्यवसायिक कार्यों में छूट भी मिल जाती थी. इन सब बातों का फायदा उठाते हुए, महार…नेतृत्व अपने हाथों में लेते गए. इसके पीछे आंशिक रूप से उनकी संख्या का भी हाथ था.

1931 में बॉम्बे प्रेजीडेंसी की अछूतों की कुल आबादी में से 68.9 प्रतिशत महार ही थे, जबकि चंभारों की आबादी में 16.2 प्रतिशत और मांगों की आबादी 14.9 % थी. पूरी आबादी में मराठों की आबादी 20.2 प्रतिशत से कम लेकिन ब्राह्मणों की आबादी 4.4 प्रतिशत से अधिक थी. महार ऐसे कार्य करते थे जिनकी वजह से उन्हें ऊंची जाति के लोग के संपर्क में आने का मौका मिलता, जिससे उन्हें कुछ अलग तरह की जिम्मेदारियां निभाने का मौका मिल जाता. एक विदेशी लेखक ने अपनी पुस्तक में इन सभी बातों का जिक्र किया है.

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