India Indonesia Sabang Port: दुनिया ने हाल ही में देखा कि महज 32 किलोमीटर चौड़ा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज किस तरह वैश्विक राजनीति, कूटनीति और ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। ईरान युद्ध के दौरान इस समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ते ही तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दुनिया की करीब 20 फीसदी ऊर्जा आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है। अब हिंद महासागर में भारत और इंडोनेशिया ऐसी रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे क्षेत्र का नया “होर्मुज” माना जा रहा है।
सबांग पोर्ट पर भारत-इंडोनेशिया की रणनीतिक साझेदारी| India Indonesia Sabang Port
भारत और इंडोनेशिया ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी समुद्री रणनीति को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। दोनों देशों ने इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट को संयुक्त रूप से विकसित करने पर सहमति बनाई है। इस परियोजना के तहत बंदरगाह को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा और यहां भारत की रणनीतिक भागीदारी भी बढ़ेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। सबांग बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित है और भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के इंदिरा प्वाइंट तथा ग्रेट निकोबार पोर्ट परियोजना से महज 100 मील यानी करीब 160 किलोमीटर की दूरी पर है।
क्यों इतना अहम है मलक्का जलडमरूमध्य?
चेन्नई से समुद्री रास्ते पर आगे बढ़ने पर जहाज पहले बंगाल की खाड़ी, फिर अंडमान सागर पार करते हुए मलक्का जलडमरूमध्य तक पहुंचते हैं। सदियों पहले भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच मसालों के व्यापार ने इस समुद्री मार्ग को वैश्विक पहचान दिलाई थी। यह जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है और आज दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है।
दुनिया के करीब 25 प्रतिशत समुद्री व्यापार का आवागमन इसी रास्ते से होता है। हर साल लगभग 2.8 ट्रिलियन डॉलर (करीब 2,800 अरब डॉलर) मूल्य का सामान, जिसमें कच्चा तेल, गैस, कोयला, पाम ऑयल, मशीनरी और उपभोक्ता सामान शामिल हैं, इसी मार्ग से गुजरता है। सिंगापुर, जो इसके दक्षिणी छोर पर स्थित है, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों में गिना जाता है।
भारत के लिए क्यों है यह समुद्री लाइफलाइन?
भारत का चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य पूर्वी एशियाई देशों के साथ होने वाला बड़ा व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते ही होता है। पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला, मशीनरी और कंटेनर ट्रैफिक के लिए यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” को मजबूत करने और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संपर्क बढ़ाने में भी इसकी अहम भूमिका है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से भी यह जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया से निकलने वाला बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से पूर्वी एशिया के देशों तक पहुंचता है।
चीन के लिए क्यों है सबसे बड़ी चिंता?
मलक्का जलडमरूमध्य चीन की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री लाइफलाइन माना जाता है। चीन के आयातित तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया और अफ्रीका से इसी मार्ग के जरिए पहुंचता है। इसके साथ ही चीन के निर्यात आधारित व्यापार का भी बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर है।
इसी कारण वर्ष 2003 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने “मलक्का दुविधा” का जिक्र करते हुए कहा था कि यदि किसी युद्ध या संकट के दौरान यह मार्ग बंद हो गया, तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
सबांग और ग्रेट निकोबार की जोड़ी बदल सकती है तस्वीर
सबांग पोर्ट इंडोनेशिया के आचेह प्रांत में मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी मुहाने पर स्थित है। यहां से गुजरने वाले जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। वर्ष 2018 में भी दोनों देशों के बीच इस बंदरगाह को लेकर सहयोग की रूपरेखा बनी थी, लेकिन अब इस परियोजना को नई गति मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर भारत अंडमान-निकोबार में ग्रेट निकोबार परियोजना पर तेजी से काम कर रहा है। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, बिजली संयंत्र और आधुनिक टाउनशिप विकसित की जा रही है। इसका उद्देश्य भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के पास एक बड़े समुद्री और लॉजिस्टिक्स हब के रूप में स्थापित करना है।
चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का जवाब
विशेषज्ञों का मानना है कि सबांग और ग्रेट निकोबार परियोजनाओं का संयुक्त प्रभाव भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर रणनीतिक पहुंच दिला सकता है। इसे चीन की “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” और “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के जवाब के रूप में भी देखा जा रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हम्बनटोटा और म्यांमार के क्याउकफ्यू जैसे बंदरगाहों में चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच सबांग पोर्ट भारत के लिए संतुलन बनाने वाला अहम ठिकाना साबित हो सकता है।































