दीवार में चुनवाए गए साहिबज़ादों का बदला कैसे लिया बंदा सिंह बहादुर ने? Banda Singh Bahadur avenged

👤 Shikha Mishra | Nedrick News 📍 Ghaziabad 🕒 Published: 29 जून 2026, 07:53 AM 🔄 Updated: 29 जून 2026, 07:53 AM
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Banda Singh Bahadur avenged: मुगलिया सल्तनत को भारत की सबसे शक्तिशाली और सबसे ज्यादा राज करने वाली इस्लामिक सल्तनत मानी जाती है। इसका शासन भारत में 1526 से बाबर के लोधी वंश के अंतिम सुलतान इब्राहिम लोधी को हरा कर शुरु हुआ था..जो 1857 की क्रांति के असफल होने के बाद अंतिम शासक बहादुर शाह जफर के बर्मा विस्थापित होने तक था। 300 सालों के मुगलो के काल में, खासकर औरंगजेब के शासन में इस्लामिक कट्टरपंथी इस कदर बढ़े थे कि जबरन गैर मुसलमानों  को इस्लाम अपनाने के लिए प्रताड़ित किया गया।

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साहिबजादों की शहादत का बदला एक संत ने लिया

मुगलों ने पंजाब में सबसे ज्यादा अत्याचार किये.. खासकर मुगल सिखों से बहुत ज्यादा घृणा.. फारूखशियार और जकारिया खान जैसे क्रूर मुगल सेनापतियों ने ऐलान किया था कि जो छिपे हुए सिखों की जानकारी देगा उसे 25 रूपय औऱ जो उनका सिर काट कर लायेगा, उसे 100 रूपय इनाम मिलेगा, लेकिन उससे भी ज्यादा क्रूर थी वो घटना जब दसवें गुरू गोबिंद सिंह के दोनो छोटे साहिबजादों को सरहिंद के नवाब वजीर खान ने जिंदा दीवार में चुनवा कर शहीद कर दिया गया था, इस एक घटना ने सिख लड़ाकों के अंदर रोष भर दिया.. लेकिन क्या आप ये जानते है कि दोनो छोटे साहिबजादों की शहादत का बदला एक संत ने लिया था.. जिसे खुद दसवे गुरु ने योद्धा बनाया था। जिन्होंने अपने शाहस औऱ वीरता से न केवल साहिबजादों की शहादत का बदला लिया था बल्कि पहला सिख शासन भी स्थापित किया था।

1708 में दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी सचखंड चले गए थे. लेकिन जब वो दक्षिण की तरफ अपनी यात्रा कर रहे थे, तब इस दौरान नांदेड़ में गोदावरी नदी के किनारे उन्होंने एक तेजस्वी साधु को देखा..जिसका नाम था माधवदास बैरागी। माधवदास ने जब गुरु साहिब को देखा तो वो उनकी तरफ खिंचा चला आया.. और गुरु साहिब की सेवा में चल गया.. गुरु साहिब ने उनकी गुरु भक्ति देखी और उन्हें अपने पास बुला कर कहा कि वो बैरागी बनने के लिए बल्कि बहादुर योद्धा बनने के लिए पैदा हुए है और धर्म के रक्षक बनेंगे.. उन्होंने माधवदास को अमृत चखाया और उन्हें सिख धर्म की दीक्षा दी, साथ ही नाम दिया गुरबख्श सिंह।

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खालसा धर्म के रक्षक बंदा सिंह

गुरबख्श सिंह सदैव गुरू की सेवा में रहते और संगतों की सेवा को ही उन्होंने अपना ध्येय बना लिया। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उनका समर्पण देखकर उन्हें गुरु का बंदा कहा.. जिससे उन्हें बंदा सिंह कहा जाने लगा.. 1708 में नांदेड़ में गुरु साहिब सचखंड चले गए और लेकिन उन्होंने खालसा धर्म के रक्षक के तौर पर बंदा सिंह को सेनापति नियुक्त कर दिया। सिख धर्म का प्रचार करने के लिए उन्होंने दसवे गुरु साहिब के नाम से सिक्के जारी किये थे। जेएस गरेवाल अपनी किताब ‘सिख्स ऑफ़ पंजाब’ में लिखा है कि गुरु साहिब ने बंदा सिंह को अमृत चखने के बाद एक तलवार, 5 तीर और 3 साथी दिए थे साथ ही ये भी आदेश दिया कि वो अब से मुग़लों के ख़िलाफ़ सिखों का नेतृत्व करेंगे।

बंदा सिंह ने सिख किसानो को अपनी सेना का हिस्सा बनाया

गुरु साहिब के जाने के बाद बंदा सिंह का एक ही मकसद था कि वो दोनो छोटे साहिबाजादों की मौत का बदला लेंगे.. और उन्होने 1709 में मुगलो के उस भ्रम को भी तोड़ दिया कि वो सदैव अजेय रहेंगे, उन्हें कोई हरा नही सकेगा। औरंगजेब की मौत हो चुकी थी और नया शासक बना बहादुर शाह प्रथम.. जो दक्षिण में मुगलो का अधिकार कायम करने की कोशिष कर रहा था, जिसने बंदा सिंह को बड़ा मौका दिया पंजाब में सिखों को एकजुट करने का और मुगलो की पंजाब से पकड़ कमजोर करने का।

वो 1709 में सतलुज नदी के किनारे पहुंचे और सिख किसानो को अपनी सेना का हिस्सा बनाया और सोनीपत और कैथल में मुग़लों का ख़ज़ाना लूटा और अपनी सेना को मजबूत करने के लिए खर्च किया, जिससे उनकी सेना भी बढ़ी और मजबूत भी हुई.. मात्र 3 महीने में ही बंदा सिंह की सेना 8 हजार से 19 हजार तक पहुंच गई, उनकी सेना में 5 हजार घुड़सवार हो गए थे। अपनी सेना लेकर वो सरहिंद के एक कसबे समाना पहुंचे जहां उन्होंने मुगल सेना के बीच कत्लेआम कर दिया था।

 35 हजार सेना के साथ दुश्मन का सीना चीरने के लिए हुंकार

उन्होंने ईट का जवाब पत्थर से देना शुरु कर दिया था, वहां रहने वाले मुग़ल सूबेदार के साथ साथ सिख सैनिकों ने मुगलो की 10 हजार सैना को मार गिराया था, ये पहली बार था जब सिखों ने मुगलो के सदैव विजय रहने के भ्रम को तोड़ दिया था। बंदा सिंह की बहादुरी के चर्चे पूरे पंजाब में होने लगे, जिसके कारण उन्हें बंदा सिंह बहादुर कहा जाने लगा। लेकिन उनका असली मकसद अभी भी पूरा होना बाकि था.. उन्होंने मई 1710 में सरहिंद पर हमला कर दिया.. और यहीं था छोटे साहिबजादों को शहीद करने वाला मुगल नवाब वजीर खान। सरहिंद से करीब 35 किलोमीटर दूर चप्पर चिड़ी के मैदान पर बंदा सिंह बहादुर अपनी 35 हजार सेना के साथ दुश्मन का सीना चीरने के लिए हुंकार भरने लगे। बंदा सिंह बहादुर ने अपने बहादुर लड़ाके फतेह सिहं को वजीर खान के तोप को ध्वस्त करने की जिन्मेदारी सौंपी और उन्होंने तोप ध्वस्त कर दिया।

जब बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद फतेह किया

तोप के ध्वस्त होते हुए फतेह सिंह वजीर खान तक सेना को चीरते हुए पहुंच गए.. औऱ वजीर खान का सिर धड़ से अलग दिया था, और इसी के साथ बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद के लौहगढ़ किले पर कब्जा कर लौहगढ़ को अपनी राजधानी घोषित कर दी थी। वजीर खान की मौत बंदा सिंह बहादुर का बदला था.. और सच्ची श्रद्धांजलि दोनों छोटे साहिबजादों की शहादत को। बंदा सिंह बहादुर की सेना इतनी ताकतवर थी कि उन्होंने सिख सम्राज्य का विस्तार लाहौर की सीमा तक कर लिया था।

जिनके मुगलो को पहली बार सोचने पर मजबूर किया था कि बंदा सिंह बहादुर के रहते हुए मुगलो को पंजाब से भागना होगा, लेकिन कश्मीर के सूबेदार अब्दुल समद ख़ाँ ने बंदा सिंह बहादुर को सरहिंद छोड़ने पर मजबूर कर दिया और गुरदास नांगल गाँव में रहने लगे थे, लेकिन समद ख़ाँ ने गांव को घेरे रखा, बंदा सिंह ने 8 महीने तक किसी तरह से उसका सामना किया लेकिन 8 महीने बाद सैना को भूख से तड़पते देख कर उन्होंने  दिसंबर 1715 में समर्पण कर दिया। जहां उन्हें 300 सिखों के साथ दिल्ली लाया गया, वहां इस्लाम अपनाने के लिए तमाम यातनायें दी गई लेकिन जब वो नहीं झुके तो उन्हें यातनायें देकर 9 जून 1716 में शहीद कर दिया गया। सही मायने में सिख सल्तनत को मजबूत करने का श्रैय उन्हें ही जाता है। बंदा सिंह बहादुर की बहादुरी को सदैव सिख समुदाय सलाम करता है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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