Gurudwara Nanak Darbar Moscow: साल 2005.. मॉस्को के नागतिन्स्कया मेट्रो स्टेशन के पास एक क्षेत्र वार्शाव्स्कॉय शोज सिख गुरुबाणी से गूंज रहा था। सैकड़ो सिख यहां इकट्टछा था.. जो सिखों के दसो गुरु साहिबानो को याद कर अरदास कर रहे थे.. उन्हें कोटी कोटी धन्यवाद कह रहे थे। उनके बताये रास्ते पर चलने के अपने प्रण को फिर से दोहरा रहे थे। लेकिन सबसे हैरानी की बात तो ये थी कि हां मौजूद ज्यादातर सिख भारतीय नहीं बल्कि अफगानी थे.. लेकिन जब बात सिख परंपरा को बनाये रखने की हो, गुरुओं की परंपरा और संस्कृति को बनाये रखने की हो, तो सामी की दीवारे भी ढह जाती है। ये सिख इक्ट्ठा हुए थे यहां एक ऐसे ऑकेजन के लिए। जिसके लिए पिछले 5 दशको से मॉस्को में रहने वाले सिख संघर्ष कर रहे थे.. यहां पहली बार सिख गुरुद्वारा स्थापित किया गया था। सिखो सामने दरबार साहिब में रखें पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब की अरदास कर रहे थे.. और पूरा इलाका उस अरदास की संगीत में गुरुमय, सिखमय हो रहा था। इस गुरुद्वारे के लिए किया गया संघर्ष आज सार्थक जो हो गया था। कैसे स्थापित हुआ गुरुद्वारा.. जानेंगे इस लेख में विस्तार से…
मॉस्को में गूंजा वाहेगुरु का नाम
रूस का मास्को शहर.. रूस की राजधानी और सबसे बड़ा शहर है… जो कि मोस्कवा नदी पर स्थित है। करीब 130 लाख की जनसंख्या वाला ये शहर यूरोप का सबसे आबादी वाला शहर है। मास्को में सिख ने पहली बार 1950 में जाना शुरु किया था। जब भारत और रूक के बीच के रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के दौरान सिख छात्रों को मास्को जाने और वहां रहने का मौका मिला। रूस में सिख धर्म धीरे धीरे जब बड़ना शुरु हुई तब वहां पहली बार गुरु नानक देव जी का प्रचार प्रसार शुरु हुआ और रूस में गुरु नानक देव जी को यहां के लोग परंपरागत रूप से नानक कदमदार के नाम से बुलाते है। हालांकि रूस में सिखो की आबादी कम है, खास सोवियत संघ के विघटन के बाद ये आबादी और कम हो गई। सोवियत संघ के रहते साम्यवाद को समर्थन देने वाले सिखों को वहां अस्थाई रूप से रहने की इजाजत दी गई थी।
गुरुद्वारा नानक दरबार बना आस्था का केंद्र
जो ज्यादातर या तो छात्र थे या मीडिया में नौकरी करने वाले लोग.. जो भारतीय संस्कृति और भाषा के आदान प्रदान का माध्यम बनते थे, लेकिन 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और मास्को रूस की राजधानी बना। विघटन के बाद वहां की स्थिति के संभलने तक सिख रूस से कटने लगे थे, लेकिन 2000 में फिर से सिख आबादी बढ़ी। सिखों ने मास्को में व्यापार और नौकरी को बढ़ाने और बेहतर जीवन के लिए आना शुरु कर दिया। इस दौ रान जो सिख वहां पहले से रह रहे थे, वो काफी लंबे समय से सिख गुरुद्वारे के लिए संघर्ष कर रहे थे। कहा जाता है कि जब तक सरकार ने सिख पूजा स्थल के लिए अनुमति नहीं दी थी तब तक सिख समुदाय मास्को में किराए के एक कैंटीन हॉल में अरदास के लिए जमा होते थे.. और इसी स्थान पर अपने सामूहिक कार्यक्रम किया करते थे।
लेकिन जैसे जैसे आबादी बढ़ी गुरुद्वारे की जरूरत भी बढ़ी और 1996 में मॉस्को गुरुद्वारा समिति को पंजीकृति कराया, लेकिन रूस सरकार से गुरुद्वारा बनाने की परमिशन लेना आसान नहीं थी। करीब 9 सालो के संघर्ष के बाद सरकार ने परमिशन तो दी, लेकिन आधिकारि गुरुद्वारे की नहीं बल्कि “सांस्कृतिक केंद्र” के रूप में मान्यता दी गई है.. यानि कि कानूनी रूप से ये एक सांस्कृतिक केंद्र ही है,.. लेकिन अफगानी सिखों और भारतीय सिखों ने मिलकर यहां गुरुद्वारा स्थापित किया और 2005 में इसका उद्घाटन किया। इस गुरुद्वारे को यहां के सिख गुरुद्वारा नानक दरबार कहते है। गुरुद्वारा नानक दरबार सभी जाति और सभी धर्मों के लोगो के लिए खुला है।
सिखों की एकजुटता और साहस का संगम
वहीं ये गुरुद्वारा 24 घंटे सातों दिन खुला रहते है ताकि कोई जरूरतमंद कभी यहां से लौट कर न जायें। हर रविवार को यहां नियमित अरदास और भजन कीर्तन का आयोजन किया जाता है। बच्चों को सिख धर्म से जुड़ी परंपराओं के बारे में शिक्षा दी जाती है। यहां लगभग रोजाना 100 से 200 लोग गुरु साहिब के दर्शन आते है। सिखों की एकजुटता और साहस का संगम कैसा होता है ये आपको मॉस्को के इस गुरुद्वारे में देखने को मिलता है, जहां किसी देश की दीवार नहीं है बल्कि यहां सब सिख है, जो गुरू भक्ति, गुरु सेवा के लिए अपना जीवन लगा रहे है। ये गुरुद्वारा मॉस्को में फलते फूलते सिख धर्म और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का प्रतीक है।














































