गोदावरी नदी के किनारे इस शहर में हुई थी गुरु गोविंद सिंह जी की हत्या ?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 05 मार्च 2024, 05:30 AM Updated: 05 मार्च 2024, 05:30 AM
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आज्ञा भई अकाल की तभी चलायो पंथ,

सब सीखन को हुकम है गुरु मान्यो ग्रन्थ…

ये दशमेश गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के मुख से निकले अंतिम शब्द हैं. अपने जीते जी औरंगजेब और दुष्ट पहाड़ी राजाओं से उन्होंने सिख संस्कृति को बचाए रखा. औरंगजेब को इन्होंने सबसे ज्यादा परेशान किया. गुरु गोविंद सिंह जी ने ही श्रीगुरुग्रंथ साहिब जी को जीवित गुरु के रुप में स्थापित किया. जिस जगह पर गुरुजी ज्योतिजोत में समाहित हुए..उस जगह पर आज के समय में एक बड़ा गुरुद्वारा स्थित है…जो सिखों के पांच तख्तों में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

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महाराजा रणजीत सिंह ने बनवाया यह गुरुद्वारा

गुरुद्वारा श्री हजूर साहिब, सिखों के 5 तख्तों में से एक है. यह स्थल नांदेड़ नगर में गोदावरी नदी के किनारे स्थित है. इस गुरुद्वारे को सत्य का क्षेत्र भी कहा जाता है. सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने इसे 1832 और 1837 के बीच बनवाया गया था. गोदावरी नदी के किनारे बसा यह शहर सिखों के प्रमुख स्थलों में गिना जाता है. यहां दुनिया भर से साल भर लाखों लोग माथा टेकने आते है.

दरअसल, 1708 में गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने प्रिय घोड़े दिलबाग के साथ इसी स्थान पर अंतिम साँस लिया था. हालांकि, 1708 से पहले भी गुरु गोविंद सिंह जी इस स्थान पर अपने अनुयायियों के साथ लंबे समय तक रहे थे. इस क्षेत्र में उन्होंने श्री गुरुग्रन्थ साहिब जी के विचारों का प्रचा र प्रसार भी किया था. 1708 में जब इस जगह पर गुरुजी आए तो सरहिंद के नवाब वजीर खान ने षड्यंत्र के तहत धोखे से उनकी हत्या करा दी. इसी स्थान पर गुरुजी ने श्री गुरुग्रंथ साहिब जी को सिखों का जीवित गुरु घोषित किया था.

यहां साल भर चलता है लंगर

गुरुजी की इच्छा थी कि उनके अनुयायियों में से एक श्री संतोख सिंह जी नांदेड़ में ही रहें, ताकि गुरु का लंगर चलता रहे. भाई संतोख सिंह जी उस समय सामुदायिक रसोईघर की देखरेख करते थे. गुरुजी ने ये भी कहा कि संतोख सिंह जी के अलावा अन्य सिख चाहें तो वापस पंजाब जा सकते हैं लेकिन गुरु प्रेम से आसक्त सिखों ने पंजाब वापसी न कर, नांदेड़ में ही रहने का निर्णय लिया. मौजूदा समय में गुरुजी के इच्छानुसार यहां सालभर लंगर चलता है.

गुरुजी के अनुयायियों ने इस स्थान पर गुरुजी की याद में एक छोटा गुरुद्वारा बनाकर उसमें श्री गुरुग्रंथ साहिब जी की स्थापना की थी. उसी जगह पर बाद में महाराजा रणजीत सिंह जी ने एक विशाल गुरुद्वारे का निर्माण कराया, जिसे श्री हजूर साहिब जी के नाम से जाना जाता है.

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