Guru Amar Das ji: जब बात ज्ञान प्राप्ति की हो तो उम्र नहीं देखी जाती, कोई 35 साल की छोटी उम्र में वो ज्ञान पा लेता है जिसके लिए कोई 60 सालों तक भटकता रहता है। जी हां, सिख धर्म में गुरु गद्दी पर कौन विराजमान होगा, इसके लिए न तो कभी परिवारवाद देखा गया और न ही चुने हुए गुरु की उम्र देखी गई। जहां प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी अपने बेटों को छोड़कर अपने शिष्य भाई लहना जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और गुरु अंगद देव जी कहलाये तो वहीं गुरु अंगद देव जी ने 60 सालों तक वैष्णव धर्म का पालन करने वाले गुरु अमर दास जी को न केवल अपने शिष्य स्वीकार किया बल्कि 72 साल की उम्र में उन्हें गुरु गद्दी का उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया था। 60 पार करने के बाद भी गुरु अमर दास दूसरे गुरु की पूरे दिल से सेवा करते थे, उन्हें अक्सर तरह तरह के तानों को सहना पड़ता लेकिन वो अपनी विनम्र स्वभाव से सब कुछ शांति से सहते, और कभी किसी बात के लिए शिकायत न करते थे, लेकिन 72 साल की उम्र में उनके साथ आधी रात में एक ऐसी घटना घटी जिसने दुसरे गुरु को काफी ठेस पहुंचाया, और उन्होंने तीसरे गुरु की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें 12 महावरदान दिए। अपने इस लेख में हम उन 12 बख्शीस के बारे में जानेंगे, जिसने तीसरे गुरु की भक्ति को हमेशा के लिए अमर कर दिया।
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जानें 12 बख्शीस कौन सी है?
पहली बख्शीश- निमाण्यां दे माण.. ये वरदान कहता है कि इस संसार में जो व्यक्ति मान-सम्मान से वंचित हैं, अगर वो गुरु की शरण में आयेगा तो गुरु अमरदास जी के शरण मात्र में आने से उन्हें मान मिलेगा।
दूसरी बख्शीश.. निताण्यां दे ताण..जो व्यक्ति शारिरीक और मानसिक रूप से कमजोर है, शक्तिहीन है..गुरु उन्हें आत्मिक व शारीरिक बल देने वाले बनेंगे।
तीसरी बख्शीश.. निओट्यां दी ओट और निसारियां दी आस: इतनी बड़ी दुनिया में जिनका कोई सहारा या आसरा नहीं होगा, गुरु साहिब उनके परम सहारे बनेंगे।
चौथी बख्शीस- निसारियां दें आसरे – जो व्यक्ति संसारिक दुखो से, परेशानियों से पूरी तरह से निराश हो चुके है.. गुरु साहिब उन्हें नई आशा और जीवन देने वाले बनेंगे।
पांचवी बख्शीश.. निथाव्यां दे थान.. जो व्यक्ति अपने घर बार से अलग हो गया है.. जिनका कोई घर-बार, कोई ठिकाना नहीं है, गुरु साहिब उन्हें अपनी शरण-स्थान में रखने वाले होंगे।
छठी बख्शीश- निलज्ज्यां दी लज्ज..जो व्यक्ति समाज में अपनी प्रतिष्ठा या इज्जत खो चुका है, गुरु साहिब की शरण उनकी लाज और मर्यादा को बचाये रखेगी।
सातवी बख्शीश- निपतियां दी पत ..गुरु की शरण में आने वाले सभी लोग जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया हो..जिनकी प्रतिष्ठा-हीन हो चुकी है.. गुरु साहिब का सानिध्य उनके गौरव और सम्मान को वापिस देगा।
आठवीं बख्शीश- निगतियां दी गत: वो लोग जो धर्म से भटके गए है.. जो अपवित्र हो चुके है, गुरु की शरण में आने से ऐसे लोगों का उद्धार होगा, उन्हें मोक्ष व सद्गति प्रदान होगी।
नौवीं बख्शीश- निधाइयां दी धीर: हर वो व्यक्ति जिनका को मददगार नहीं होगा, जिसे चारों तरफ से केवल निराशा ही मिले.. जिनका कोई पक्ष लेने वाला नहीं हो, तो गुरु साहिब हमेशा ऐसे व्यक्ति का साथ देने वाले होंगे।
दसवीं बख्शीस- निथीहियां दी थज: जो नासमझ है, अज्ञानी है, असहाय है.. गुरु साहिब उनका मार्गदर्शन कर सही मार्ग और आत्मिक ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले होंगे।
ग्यारहवी बख्शीश- निरजोरियां दा जोर: जो चारो तरफ से लाचार और बेबस हो चुके है.. ऐसे लोग जब गुरु की शरण में आयेंगे तो गुरु साहिब उनकी बड़ी ताकत बनेंगे।
बारहवी बख्शीस- पीरां दे पीर: वो सभी गुरुओ के गुरु यानि की परमपिता परमेश्वर और समस्त आध्यात्मिक गुरुओं और पीर-पैगंबरों के सिर ताज बनेंगें। उनके जैसा कोई नहीं होगा।
गुरु अमरदास जी ने महिलाओ के उत्थान के लिए उठाये ठोस कदम
गुरु अमरदास जी ने 73 साल की उम्र में गुरु गद्दी संभाली थी, जिसके बाद उन्होंने समाजिक सुधारों और महिलाओ के उत्थान के लिए कई ठोस कदम उठाया । उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया.. वहीं पर्दा प्रथा का अंत किया और आदेश दिया कि उनके दरबार में कोई महिला पर्दा नहीं करेगी। साथ ही उन्होंने सिखों में विधवाओं के फिर से शादी करने की अनुमति दी.. पहले पंगत पाछे संगत की परंपरा शुरु कर उन्होंने जातिगत भेदभाव को गहरा विरोध किया। उनके दरबार में आने वाले हर व्यक्ति को पहले सबके साथ लंगर चखना पड़ता था फिर वो गुरु से मिल सकते थे। उन्होंने सिख धर्म के बढ़ावा देने के लिए 22 अलग अलग क्षेत्रों में मंजी बनाया था।
उन्होंने अपने जीवन काल में 907 शबदो की रचना की, जो सिखों के पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब में मौजूद है, इसी के साथ उन्होंने खुशी महसूस कराने वाली आनंद साहिब की रचना की थी.. जो आज भी रोजाना गुरुद्वारों में पढ़ी जाती है। इसके अलावा शादी, मृत्यु और अन्य हिंदू रीति रिवाजों को छोड़ कर सिख रीति रिवाजो की शुरुआत भी गुरु अमर दास जी ने ही की थी। 1 सितंबर 1574 को 95 साल की उम्र में वो गोविंगवाल साहिब में वो ज्योति ज्योत में समां गए थे.. लेकिन सिख धर्म को बढ़ावा देने और आज उसके एक गैरजातिवादी, गैर भेदभाववादी धर्म के होने के पीछे सबसे बड़ा योगदान तीसरे गुरु अमरदास जी का ही है। आपको ये जानकारी कैसी लगी हमे कमेंट करके जरूर बतायें।












































