Gurmukh Singh Musafir: देश को आजादी दिलाने में ऐसे कई सूरमा हुए जिन्होंने अपनी अच्छी खासी नौकरी, एक सफल जिंदगी को छोड़ कर आजादी का कांटोभरा रास्ता अपनाया.. देश की आजादी के लिए अपनी जान की बलि देने वाले भी कई देखे होंगे, लेकिन आजादी के बदले अपने परिवार को एक एक करके दुनिया से जाते देखना और फिर भी अपने संकल्प पर अडिग रहने वाले बेहद कम है.. ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर.. एक ऐसे योद्धा है जिन्होंने न केवल आजादी की लडाई के लिए आवाज उठाई, बल्कि उन्होंने अपने लोगो की आंखे खोलने के साहित्य का सहारा लिया। उनकी लिखी रचनायें सोते हुए भारत में चेतना लाने का काम करने लगी थी.. और इसी रचनाओं में से एक बागी दी धी पर बनी फिल्म को राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला है.. जो कि पहली पंजाबी फिल्म भी बन गई है। अपने इस लेख में हम पंजाब के पूर्व सीएम ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर के बारे में जानेंगे.. साथ कैसे वो आज भी पंजाबी की हवाओं में अपनी रचनाओं के जरिए जीवित है।
बागी दी धी को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार
25 नवंबर 2022 को पीटीसी मोशन पिक्चर्स के बैनल तले बनी फिल्म बागी दी धी पंजाबी बॉक्स ऑफिस पर रीलिज हुई थी। इस फिल्म का निर्माण किया है पंजाब के मशहूर निर्माता मुकेश गौतम ने.. जो कि अभिनेत्री यामि गौतम के पिता भी है। ये फिल्म पंजाब के मशहूर साहित्यकार, लेखक और पंजाब के पांचवे सीएम ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर की रचनाओं पर आधारित है, जिसकी कहानी गदर आंदोलन के आसपास घूमती है। एक 14 साल की बच्ची की कहानी को पर्दे पर उतारा गया था जिसके पिता बागी हो जाते है.. लेकिन ऐसे में वो बच्ची अपने पिता की कमजोरी बनने की बजाय उनकी ताकत बन कर बहादुरी से सारी मुसिबतो का सामना करती है। इस फिल्म को 70वें राष्ट्रीय पुरुस्कार में सर्वश्रैष्ठ पंजाबी फिल्म के खिताब से नवाजा गया है.. जिसके बाद एक बार फिर से ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर चर्चा में आ गए।
ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर का जीवन
पंजाब के अधवाल कैम्पबेल पुर, जिसे बाद में अटक जिला भी कहा गया था में 15 जनवरी 1899 में चड्डा कबीले के खत्री परिवार में जन्मे थे ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर। आज ये क्षेत्र पाकिस्तान के रावलपींडी में पड़ता है। एक अच्छे परिवार से होने के कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा था, इसलिए अपनी स्कूलिंग करवने के बाद आगे की पढ़ाई उन्होंने रावलपिंडी से की थी। पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें 1918 कल्लर के खालसा हाई स्कूल बतौर टीचर नौकरी मिल गई थी। उनकी पढ़ाने की कला इतनी गहीन थी कि स्कूल में उन्हें लोगो ने ज्ञानी कहना शुरु कर दिया था। करीब 4 सालो तक वो टीचर की नौकरी करते रहे थे, लेकिन जलियावालां बाग नरसंहार के बाद उनका मन अंग्रेजो के खिलाफ कुपित हो गया..वहीं सिख गुरुद्वारों के लिए शिरोमणि अकाली दल का संघर्ष चल रहा था। जिसे महंतो के भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए शुरु किया गया था.. उन्होंने तय कर लिया था कि वो आजादी की लड़ाई में कूदेंगे और 1922 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ कर गुरुद्वारा सुधार के लिए अकाली आंदोलन में शामिल हो गए। अपने पहले ही आंदोलन गुरु का बाग में प्रदर्शन करने के दौरान उनकी गिरफ्तारी हो गई जिससे वो जेल भेज दिए गए।
1978 में मिला साहित्य अकादमी पुरुस्कार
साल 19199 में हुए जलियांवाला नरसंहार को देखने के बाद उन्होंने कविताओं और रचनायें लिखनी शुरु की.. उनकी रचनाओं में पंजाब में आजादी का संघर्ष नजर आता था, वो देशभक्ति जगाने वाली समाजिक ताने बाने से परिपूर्ण उस समय आम इसांन को जिन संघर्षों से गुजरना पड़ता था उसे लेक रचनायें करते थे। उन्होंने 9 कविता संग्रह, 8 कहानी संग्रह के साथ-साथ गांधी जी और नेहरू की आत्म कथा भी लिखी थी। उनकी कहानी उरवर पार के लिए उन्हें मरणोपरांत 1978 में साहित्य अकादमी पुरुस्कार दिया गया था। उनकी रचनाओं के कारण ही उन्होंने ही अपना उपनाम मुसाफिर रखा था। 1920 के दशक में उन्होंने अपना पूरा समय आजादी की लड़ाई और रचनाओं में लगाया था.. 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान वो फिर जेल गए.. उनके योगदान को पहचान मिली और 12 मार्च 1930 में सिखों के सर्वोच्च धार्मिक पीठ श्री अकाल तख्त का जत्थेदार नियुक्त किया गया था।
अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए उठाई आवाज
ये उपलब्धि बहुत बड़ी थी… करीब एक साल तक जत्थेदार रहने के बाद वो सेवानिवृत हुए और राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। गांधी जी की आजादी की लड़ाई अब मुसाफिर की भी लड़ाई हो गई थी.. 1942 में भारत छोड़ो आदोंलन में वो फिर से जेल गए थे.. वही दूसरी तरफ उनके पिता, एक बेटी और एक बेटे की मौत हो गई थी। लेकिन मुसाफिर के मजबूत स्तंभ की तरह टिके रहे.. उन्होंने परिवार के जाने का गम मनाने के बजाय देश की आजादी के संघर्ष को चुना। देश आजाद हुआ और वो 1947 में संविधान सभा के सदस्य चुने गए.. राजनीति की तरफ ये उनका पहला कदम था। तब उन्होंने नागरिकता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों जैसे अहम मुद्दे पर आवाज उठाई थी। मुसाफिर की प्रतिभा को कांग्रेस ने करीब से देखा था, इसलिए 1949 में उन्हें पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनाया गया. जहां वो 12 सालो तक इस पद पर रहे थे। यहां से उन्होंने आधिकारिक रूप से पंजाब की राजनीति में कदम रखा था। साल 1952 में जब भारत में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए तब मुसाफिर अमृतसर निर्वाचन क्षेत्र से खड़े हुए और उन्होंने जीत दर्ज की।
77 साल की उम्र में निधन
उनकी पैठ ऐसी थी कि जब 1957 और 1962 में लोकसभा चुनाव हुए तो मुसाफिर से हैट्रिक लगाई। इतना ही नहीं 1966 में जब पंजाब तीन अलग अलग टुकड़ो में भाषा के आधार पर बांटा गया तब उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया.. और नए पंजाब के वो पहले सीएम बने थे। हालांकि 1 नवंबर 1966 से 8 मार्च 1967 तक ही सीएम रहे थे, 196 में वो पहली बार अमृतसर निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चाव लड़ने के लिए खड़े हुए लेकिन वो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सत्यपाल डांग से हार गए। लेकिन फिर भी 1968 से 1974 तक वो राज्यसभा सदस्य रहे थे। 18 जनवरी 1976 को दिल्ली में उनका 77 साल की उम्र में निधन हो गया था। उनके मरने के बाद उन्हें भारत का दूसरा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण पुरुस्कार दिया गया था। कहने के लिए तो केवल एक ही बंदा था.. लेकिन जितने रोल उन्होंने प्ले किये.. उसने ही उन्हें महान बना दिया।












































