Electoral Bonds: बीजेपी को मिला सबसे ज्यादा 6,060 करोड़ रुपये का चुनावी चंदा, जानिए दूसरे और तीसरे नंबर पर कौन सी पार्टी है

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 15 मार्च 2024, 05:30 AM Updated: 15 मार्च 2024, 05:30 AM
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लोकसभा चुनाव 2024 से पहले चुनाव आयोग ने अपनी वेबसाइट पर चुनावी बांड पर डेटा प्रकाशित किया। यह डेटा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सामने आया, जिसमें भारतीय स्टेट बैंक को बांड से संबंधित सभी डेटा चुनाव प्राधिकरण को सौंपने का निर्देश दिया गया था। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने यह डेटा 12 मार्च को चुनाव आयोग को सौंपा था और इसे 15 मार्च की शाम 5 बजे तक सार्वजनिक किया जाना था।

हालांकि, चुनाव आयोग ने यह डेटा एक दिन पहले 14 मार्च को जारी कर दिया। चुनाव आयोग द्वारा जारी चुनावी बॉन्ड के आंकड़ों में बॉन्ड खरीदने वालों के नामों की सूची 337 पेज लंबी है, जबकि बांड भुनाने वाले राजनीतिक दलों की जानकारी 426 पन्नों में जारी की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी चुनावी बॉन्ड पाने वाली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

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बीजेपी के बाद इस पार्टी ने मारी बाज़ी

चुनावी बॉन्ड के जरिए बीजेपी को सबसे ज्यादा रुपये का चंदा मिला है। बीजेपी को 12 अप्रैल, 2019 से 24 जनवरी, 2024 तक 6,060 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। यह भुनाए गए सभी बांडों का 47.5% है। बीजेपी के बाद ममता बनर्जी की पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने बाज़ी मारी है। टीएमसी को चुनावी चंदे के तौर पर 1,609 करोड़ रुपये मिले हैं। वहीं, कांग्रेस की बात करें तो वह तीसरे नंबर पर है। कोंग्रेस को चुनावी चंदे के तौर पर 1,421 करोड़ रुपये मिले हैं। सूची में अगला स्थान भारत राष्ट्र समिति का है। उन्होंने चुनावी बांड में 1214 करोड़ रुपये जुटाए। इसके बीजू जनता दल को 775 करोड़ रुपये मिले। बीजेडी के बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) है, जिसने चुनावी चंदे में 639 करोड़ रुपये एकत्र किए।

अप्रैल 2019 से फरवरी 2024 का है डेटा

भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने भारतीय स्टेट बैंक द्वारा साझा किए गए विवरण के बाद चुनावी बांड पर यह आंकड़े जारी किए। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इसे 15 मार्च तक ECI वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए। SBI ने रिपोर्ट में कहा कि उसने अप्रैल 2019 से फरवरी 2024 तक विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा 22,217 चुनावी बांड की खरीद और उपयोग पर पूरे डेटा का खुलासा किया है।

अभी भी उठ रहे हैं सवाल

इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम 2018 में नरेंद्र मोदी सरकार ने शुरू की थी और कहा गया था इससे राजनीतिक फंडिंग को लेकर पारदर्शिता आएगी। लेकिन सिर्फ बॉन्ड खरीदने वालों और राजनीतिक दलों को मिले पैसे के ब्यौरे से यह साफ नहीं हो पाता कि किसने किसको पैसा दिया। यह जानना भी संभव नहीं है कि किसी पार्टी विशेष को फंड देने के पीछे दानकर्ता का मकसद क्या है। चुनावी बांड के खिलाफ याचिका दायर करने वाले एडीआर के वकील प्रशांत भूषण ने भी यह बात उठाई है। इस मुद्दे को लेकर एडीआर फिर सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।

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