ढाक की गूंज और धुनुची का धुआं, जानिए क्यों इसके बिना अधूरी है मां दुर्गा की विदाई | Dhunuchi Dance

Rajni | Nedrick News Ghaziabad Published: 02 अक्टूबर 2026, 11:40 PM Updated: 02 अक्टूबर 2026, 11:40 PM
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Dhunuchi Dance: हवा में सुलगते धूनो की दिव्य और सुगंधित महक, कानों में गूंजती ढाक की वो मदहोश कर देने वाली थाप, और उस धुएं के बीच आस्था की आग को हाथों में थामे थिरकते कदम.. यह कोई साधारण नृत्य नहीं, बल्कि साक्षात आदि-शक्ति मां भवानी की आराधना का सबसे ऊर्जावान स्वरूप है। ‘धुनुची नृत्य’-दुर्गा पूजा का वो धड़कता हुआ दिल है, जहाँ आस्था, शक्ति और समर्पण मिलकर एक ऐसा विहंगम दृश्य रचते हैं कि देखने वाले की सांसें थम जाती हैं।

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क्या होती है Dhunuchi Dance?

धुनुची (Dhunuchi) मिट्टी का बना एक पारंपरिक पात्र होता है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से दुर्गा पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में आरती और धुएँ के माध्यम से वातावरण को शुद्ध करने के लिए किया जाता है।

यह देखने में एक बड़े कप या प्याले जैसी होती है, जिसके नीचे पकड़ने के लिए एक लंबा और मजबूत स्टैंड (हैंडल) लगा होता है। यह मुख्य रूप से पकी हुई लाल मिट्टी से बनाई जाती है, ताकि गर्म होने पर भी इसे आसानी से हाथ में पकड़ा जा सके। आधुनिक समय में यह पीतल या तांबे की भी मिलने लगी है।

धुनुची के अंदर सबसे पहले सूखे नारियल के छिलके (छाल) और कपूर रखकर आग जलाई जाती है। जब नारियल के छिलके सुलगने लगते हैं, तो उसके ऊपर ‘धूनो’ (Dhuno) डाला जाता है। धूनो, शाल (Sal) के पेड़ से निकलने वाली एक प्राकृतिक राल (Resin/लोबान) होती है।
धूनो के आग के संपर्क में आते ही उसमें से एक बहुत ही गाढ़ा, सुगंधित और पवित्र सफेद धुआं निकलने लगता है।

इसे धूपदानी का एक बड़ा रूप माना जा सकता है। इसका मुख्य उपयोग मां दुर्गा की आरती के समय वातावरण को सुगंधित और दिव्य बनाने के लिए होता है। इसी जलती हुई धुनुची को हाथ में (या दांतों से पकड़कर) लेकर श्रद्धालु ढाक की थाप पर प्रसिद्ध ‘धुनुची नाच’ करते हैं।

Dhunuchi Dance का धार्मिक महत्व

धुनुची नाच का धार्मिक महत्व बहुत गहरा है। यह केवल एक लोक नृत्य या कला नहीं है, बल्कि माँ दुर्गा की आराधना की एक उच्च आध्यात्मिक और तांत्रिक क्रिया मानी जाती है। सनातन परंपरा और बंगाली संस्कृति में इसके धार्मिक महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है।

1. आदि-शक्ति को ऊर्जा और हौसला प्रदान करना

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा और दुष्ट राक्षस महिषासुर के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था, तब देवी की सेना और उनके भक्तों ने माँ के भीतर की ऊर्जा और उत्साह को बढ़ाने के लिए उनके सामने यह नृत्य किया था। इसलिए, यह नृत्य वीर रस और शक्ति का प्रतीक है, जो भक्त के भीतर भी साहस का संचार करता है।

2. ‘अग्नि तत्त्व’ द्वारा शुद्धि और बुरी शक्तियों का नाश

हिंदू धर्म में अग्नि को पंचतत्वों में सबसे पवित्र और शुद्ध माना गया है। धुनुची में सुलगती अग्नि और उसमें से निकलने वाला ‘धूनो’ (लोबान) का धुआं वातावरण से सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों, तामसिक ऊर्जाओं और बुरी नजर का नाश करता है। यह धुआं पूरे पूजा स्थल को एक दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र (Positive Energy Zone) में बदल देता है।

3. पूर्ण आत्म-समर्पण (Surrender) का प्रतीक

धुनुची नाच कोई आसान नृत्य नहीं है। धधकती हुई आग से भरी मिट्टी की धुनुची को हाथों में, और कई बार अनुभवी डांसर इसे अपने दांतों या माथे पर संतुलित करके नाचते हैं। धार्मिक दृष्टि से, यह इस बात का प्रतीक है कि भक्त माँ की भक्ति में इतना लीन हो चुका है कि उसे शारीरिक कष्ट, डर या अहंकार का कोई बोध नहीं है। यह माँ के चरणों में अपना सर्वस्व सौंप देने की पराकाष्ठा है।

4. यज्ञ का छोटा स्वरूप

शास्त्रों में धूप और दीप दिखाने को एक प्रकार का ‘मानसिक और लघु यज्ञ’ माना गया है। धुनुची से उठने वाला सुगंधित धुआं जैसे-जैसे आकाश की तरफ जाता है, ऐसा माना जाता है कि वह भक्तों की प्रार्थनाओं और श्रद्धा को सीधे स्वर्ग लोक में देवताओं तक पहुंचा रहा है।

दुर्गा पूजा के दौरान धुनुची नाच मुख्य रूप से महा अष्टमी और महा नवमी के दिन किया जाता है. हालांकि, कुछ पंडालों में इसकी शुरुआत सप्तमी से ही हो जाती है और यह विजयादशमी तक चलती

Rajni

rajni@nedricknews.com

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