US Supreme Court Trump: अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को एक बड़ा कानूनी झटका दिया है। अदालत ने बुधवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए संघीय जेलों में बंद ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए ‘जेंडर-अफर्मिंग हेल्थकेयर’ (लिंग-परिवर्तन से जुड़े इलाज) पर तुरंत प्रतिबंध लगाने की सरकार की मांग खारिज कर दी। शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद निचली अदालत की लगाई गई रोक फिलहाल जारी रहेगी। इसका सीधा मतलब यह है कि मामले में अंतिम कानूनी फैसला आने तक ट्रंप प्रशासन जेलों में इस नीति को जबरन लागू नहीं कर सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी न्याय विभाग (Department of Justice) की उस इमरजेंसी याचिका को खारिज किया, जिसमें निचली अदालत के स्टे को फौरन हटाने की अपील की गई थी। शीर्ष अदालत ने अपने संक्षिप्त आदेश में कोई विस्तृत कारण तो नहीं दिया, लेकिन बेंच में शामिल दो कंजरवेटिव जजों जस्टिस क्लेरेंस थॉमस और सैमुअल अलिटो ने इस फैसले से असहमति जताई।
क्या थी ट्रंप प्रशासन की विवादित नीति? US Supreme Court Trump
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने फरवरी में संघीय जेलों के लिए एक सख्त नीति लागू की थी। इसके तहत कैदियों के जेंडर ट्रांजिशन से जुड़े तमाम मेडिकल और सर्जिकल उपचारों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। सिर्फ दवाओं और सर्जरी पर ही नहीं, बल्कि जेंडर पहचान के मुताबिक जरूरी कपड़े पहनने और बाल हटाने वाले उपकरणों के इस्तेमाल जैसी सामाजिक सुविधाओं पर भी ताला जड़ दिया गया था। हालांकि, कैदियों के लिए केवल मानसिक स्वास्थ्य और मनोरोग से जुड़ी सेवाओं की छूट रखी गई थी।
तीन कैदियों की याचिका और मानसिक स्वास्थ्य का सवाल
सरकार के इस फैसले के खिलाफ न्यू जर्सी, फ्लोरिडा और मिनेसोटा की संघीय जेलों में बंद तीन ट्रांसजेंडर कैदियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और एक क्लास-एक्शन मुकदमा दर्ज कराया। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि हार्मोन थेरेपी और जरूरी इलाज अचानक बंद करने से उनकी जान पर बन आएगी। इससे भयंकर डिप्रेशन, घबराहट और खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या करने के विचार बढ़ सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) की वकील अदिति शाह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख प्रभावित कैदियों को गंभीर और कभी न भर पाने वाले नुकसान से बचाएगा, भले ही इस नीति के खिलाफ लंबी अदालती जंग अभी बाकी हो।
निचली अदालत ने नीति पर क्यों उठाई थी उंगली?
इससे पहले जून में वॉशिंगटन के अमेरिकी जिला जज रॉयस लैम्बरथ ने इन पाबंदियों पर अंतरिम रोक लगा दी थी। जज ने साफ कहा था कि यह नीति प्रशासनिक कानूनों के तहत मनमानी और आधारहीन (arbitrary and capricious) दिखाई देती है। अदालत ने टिप्पणी की थी कि ‘ब्यूरो ऑफ प्रिजन्स’ ने अपने ही सालों के वैज्ञानिक सबूतों और अनुभवों को दरकिनार कर केवल ट्रंप के कार्यकारी आदेश को खुश करने के लिए यह नियम बना दिया। इसके बाद 18 सितंबर को कोर्ट ऑफ अपील्स ने भी इस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
जनवरी 2025 में व्हाइट हाउस में लौटने के बाद से ही ट्रंप प्रशासन ने ट्रांसजेंडर अधिकारों पर लगातार कड़े फैसले लिए हैं, जिनमें आधिकारिक तौर पर केवल पुरुष और महिला जेंडर को मान्यता देना और ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिला जेलों में रखने पर पाबंदी जैसे कदम शामिल हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले सेना और खेलों से जुड़े मामलों में ट्रंप प्रशासन के कुछ प्रतिबंधों को बरकरार रखा था, लेकिन जेलों के इस हेल्थकेयर मामले में फिलहाल सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े हैं।












































