Ladakh Elected Body: लद्दाख के भविष्य और संवैधानिक सुरक्षा को लेकर चल रही खींचतान के बीच स्थिति काफी हद तक साफ हो गई है। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने या दिल्ली और जम्मू-कश्मीर की तरह विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग पर फिलहाल विराम लग गया है। इसके बजाय, संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख के लिए एक बिल्कुल अलग और अनूठा प्रशासनिक ढांचा तैयार करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए करीब 8 से 10 प्रमुख बिंदुओं पर स्थानीय नेतृत्व से राय मांगी गई है, ताकि आम सहमति बनने के बाद ही कानून का मसौदा तैयार किया जा सके।
हाल ही में नई दिल्ली में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद यह बात सामने आई कि लद्दाख को एक ऐसी चुनी हुई संस्था दी जाएगी, जिसके पास कानून बनाने, प्रशासनिक काम देखने और वित्तीय मामलों से जुड़े अधिकार होंगे। हालांकि, यह साफ कर दिया गया है कि यह व्यवस्था किसी भी तरह से पूर्ण राज्य के दर्जे जैसी नहीं होगी। दोनों पक्षों के बीच अब अगले दौर की बातचीत अक्टूबर के पहले पखवाड़े में होनी तय हुई है।
‘सहमति के बिना नहीं थोपा जाएगा कोई भी मॉडल’| Ladakh Elected Body
लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा के मुताबिक, प्रस्तावित केंद्र शासित प्रदेश स्तरीय निकाय के गठन को लेकर बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ी है। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के प्रतिनिधि इस बात पर राजी हैं कि इस नई संस्था के चुनाव मौजूदा हिल काउंसिलों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से कराने के बजाय सीधे जनता द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से कराए जाने चाहिए।
मुख्य सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि लद्दाख कभी अलग राज्य नहीं रहा, बल्कि पहले जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था और बाद में केंद्र शासित प्रदेश बना। उन्होंने कहा कि लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों (LAHDC) और नए प्रस्तावित प्रदेश स्तरीय निकाय के बीच अधिकारों का स्पष्ट बंटवारा होना जरूरी है। मंशा साफ है कि वहां के लोगों की सहमति के बिना कोई भी ढांचा थोपा नहीं जाएगा। छठी अनुसूची की शुरुआती मांग पर लंबे विचार-विमर्श के बाद ही अनुच्छेद 371 वाला यह विशेष प्रस्ताव सामने आया है। इसके अलावा, 24 सितंबर की घटना से जुड़े मामलों को वापस लेने और पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रस्ताव भी उपराज्यपाल के विचारार्थ भेजा जाएगा।
स्थानीय संगठनों में भारी मायूसी, बैठक पर उठाए सवाल
दूसरी तरफ, लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के नेताओं ने इस बातचीत के नतीजों पर गहरा असंतोष जताया है। दिल्ली में अपनी बात रखते हुए स्थानीय नेताओं ने तीखा तंज कसा कि यह बैठक मशहूर व्यंग्यकार जसपाल भट्टी के व्यंग्य जैसी बेनतीजा साबित हुई, जिससे स्थानीय लोगों में विश्वास बढ़ने के बजाय अविश्वास और गहरा गया है।
नेताओं ने आरोप लगाया कि अचानक बुलाई गई इस बैठक का मकसद 10 सितंबर से प्रस्तावित लेह-कारगिल पदयात्रा से लोगों का ध्यान भटकाना हो सकता है। उनका कहना था कि महीनों के इंतजार के बाद भी सरकार ने कोई ठोस कानूनी मसौदा सामने रखने के बजाय सिर्फ सवालों की एक सूची थमा दी और उनकी मुख्य मांगों पर कोई ठोस चर्चा नहीं की। इस दौरान लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष छेरिंग दोरजे, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, केडीए के असगर अली करबलई, सज्जाद कारगिली और लद्दाख के सांसद मोहम्मद हनीफा जान ने संयुक्त रूप से कहा कि जब तक ज़मीन, नौकरियों और पर्यावरण की ठोस सुरक्षा का लिखित मसौदा सामने नहीं आता, तब तक लद्दाख के लोगों की चिंताएं दूर नहीं होंगी।












































