BRICS summit 2026: नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट के बिजनेस फोरम में शुक्रवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान पहुंचे, जहां उन्होंने पश्चिम एशिया के संघर्ष समेत कई अहम वैश्विक मुद्दों पर अपनी बात रखी। इस दौरान सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि ईरानी राष्ट्रपति ने मंच पर आते ही सबसे पहले संकट के समय साथ खड़े रहने के लिए भारत का आभार जताया। हालांकि, ईरान के साथ भारत का यह तालमेल केवल औपचारिकता भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे नई दिल्ली के ठोस रणनीतिक और आर्थिक हित छिपे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव के बीच भारत को ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार के लिए सुरक्षित समुद्री रास्ते की सख्त जरूरत है। सबसे खास बात यह है कि भारत एक तरफ ईरान के साथ लगातार बातचीत बनाए हुए है, तो दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल के साथ भी अपनी रणनीतिक साझेदारी पूरी मजबूती से आगे बढ़ा रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत की यह ‘संतुलन नीति’ साबित करती है कि वैश्विक दबाव चाहे जिस तरफ से हो, फैसले देशहित को देखकर ही लिए जाएंगे।
12 दिन के भीतर मोदी-पेजेश्कियान की दूसरी बैठक| BRICS summit 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच महज 12 दिनों के भीतर यह दूसरी मुलाकात है। इससे पहले 31 अगस्त को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में दोनों नेताओं की सीधी बातचीत हुई थी, जिसके बाद 11 सितंबर को पेजेश्कियान ब्रिक्स सम्मेलन के सिलसिले में दिल्ली पहुंचे। पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने और राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद पेजेश्कियान की यह पहली भारत यात्रा है। वर्ष 2018 में हसन रूहानी के दौरे के बाद करीब 8 साल में पहली बार कोई ईरानी राष्ट्रपति भारत आया है। पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद महज 10-12 दिनों में दो बार शीर्ष स्तर पर संवाद करके भारत ने साफ संकेत दे दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी बाहरी दबाव की मोहताज नहीं है।
ब्रिक्स का मंच और डॉलर के दबदबे को चुनौती
ब्रिक्स के मंच पर एक अनोखी कूटनीतिक तस्वीर देखने को मिली, जहां एक तरफ ईरान मौजूद था, तो दूसरी तरफ यूएई और सऊदी अरब भी शामिल थे। पश्चिम एशिया के संघर्ष पर इन तीनों देशों का नजरिया अलग-अलग है, लेकिन भारत इन तीनों के साथ समानांतर बातचीत कर रहा है। पेजेश्कियान ने वैश्विक आर्थिक हालात पर बोलते हुए कहा कि आज दुनिया सप्लाई चेन की बाधाओं और राजनीतिक दबाव के लिए आर्थिक प्रतिबंधों के इस्तेमाल जैसे बेहद जटिल दौर से गुजर रही है। उन्होंने ब्रिक्स बैंक में सदस्य देशों से निवेश बढ़ाने की अपील की, ताकि आपसी व्यापार को अमेरिकी डॉलर पर निर्भर किए बिना स्थानीय मुद्राओं में आगे बढ़ाया जा सके।
चाबहार से रूस और यूरोप तक 7,200 किमी का नया रास्ता
भारत के लिए इस पूरी कूटनीति का सबसे बड़ा आधार चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) है। पाकिस्तान को पूरी तरह बायपास करके भारत अब चाबहार के रास्ते रूस और यूरोप तक सीधी ट्रेड कनेक्टिविटी तैयार कर रहा है।
- रूट का खाका: मुंबई से समुद्री मार्ग से कार्गो चाबहार पहुंचेगा, जहां शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल इसका मुख्य केंद्र है। वहां से सड़क मार्ग से मध्य एशिया के लैंडलॉक्ड देशों… कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान तक सीधी पहुंच बनेगी। आगे यह रूट ईरान के बंदर-ए-अंजली से कैस्पियन सागर पार करते हुए रूस के अस्त्राखान पहुंचेगा।
- यूरोप तक विस्तार: अस्त्राखान से रेल और सड़क नेटवर्क के जरिए मॉस्को, सेंट पीटर्सबर्ग और आगे चलकर जर्मनी, पोलैंड, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन तक माल भेजा जा सकेगा।
- बड़ा फायदा: करीब 7,200 किलोमीटर लंबा यह मल्टीमॉडल कॉरिडोर स्वेज नहर और पारंपरिक समुद्री रास्तों के मुकाबले यूरोप की दूरी को 40% तक कम कर देगा, जबकि परिवहन लागत में लगभग 30% की भारी बचत होगी।
ग्वादर बनाम चाबहार: जमीन-आसमान का अंतर
मई 2024 में भारत और ईरान के बीच शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन को लेकर 10 साल का ऐतिहासिक करार हुआ था, जिसके तहत भारत ने 12 करोड़ डॉलर के निवेश और 25 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन तय की। यदि इसकी तुलना पाकिस्तान में चीन के ग्वादर पोर्ट से की जाए, तो दोनों में जमीन-आसमान का फर्क दिखता है। चीन का CPEC प्रोजेक्ट केवल सड़क के जरिए पाकिस्तान को चीन के शिनजियांग से जोड़ता है और बलूचिस्तान में अशांति के चलते इसका काम काफी समय से ठप पड़ा है। इसके उलट, चाबहार भारत को मध्य एशिया, रूस और पूरे यूरोप तक एक व्यापक मल्टीमॉडल नेटवर्क देता है, जहां मौजूदा तनाव के बावजूद भारतीय कंपनी सफलतापूर्वक टर्मिनल का संचालन कर रही है।












































