US New H-1B Fees: अमेरिका में नौकरी करने का सपना देख रहे भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स को एक और बड़ा झटका लग सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन H-1B वीजा प्रोग्राम को लेकर एक ऐसा नया नियम लाने की तैयारी में है, जिसका सीधा असर वहां काम करने वाले विदेशी टैलेंट पर पड़ेगा। ब्लूमबर्ग लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप सरकार ने H-1B प्रोग्राम पर 1,03,265 डॉलर (करीब 99 लाख रुपये) की भारी-भरकम अतिरिक्त फीस लगाने का ड्राफ्ट प्रस्ताव तैयार किया है।
सबसे खास बात यह है कि इस नए नियम के दायरे में वे विदेशी वर्कर्स भी आएंगे, जिन्हें अमेरिका के भीतर से ही कंपनियों द्वारा हायर किया जाता है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) द्वारा जारी ड्राफ्ट रूल के अनुसार, यह फीस उन सभी लोगों पर लागू होगी जिन्हें सालाना 85,000 के नियमित H-1B कोटे (मास्टर्स डिग्री कैप सहित) के तहत वीजा मिलता है।
पुरानी फीस से कैसे अलग है नया प्रस्ताव? US New H-1B Fees
इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका के बाहर से होने वाली नियुक्तियों पर 1 लाख डॉलर की ‘एंट्री फीस’ लगाई थी। उस आदेश ने दुनिया भर की टेक कंपनियों को हिलाकर रख दिया था। हालांकि, बोस्टन के एक फेडरल जज ने उस फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति का यह आदेश गैरकानूनी टैक्स जैसा है। कोर्ट ऑफ अपील्स ने भी सरकार की आपातकालीन याचिका को खारिज कर दिया था।
पुराने नियम में राष्ट्रपति के एंट्री बैन अधिकारों का इस्तेमाल किया गया था, जिसके चलते अमेरिका के भीतर पहले से मौजूद छात्र और वर्कर्स इसके दायरे से बाहर थे। लेकिन नया प्रस्ताव सीधे अमेरिका के अंदर होने वाले ‘स्टेटस चेंज’ और इन-कंट्री हायरिंग को भी अपने शिकंजे में लेता है। हालांकि, नए ड्राफ्ट में कुछ राहत भी दी गई है। यूनिवर्सिटीज, अस्पतालों और नॉन-प्रॉफिट रिसर्च संस्थानों को इस भारी फीस से छूट मिलेगी।
पैसों का इस्तेमाल कहां होगा?
DHS के प्रस्ताव के अनुसार, इस फीस से होने वाली भारी कमाई का इस्तेमाल अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम के आधुनिकीकरण, नेशनल सिक्योरिटी बैकग्राउंड चेक और वीजा फ्रॉड की रोकथाम के लिए किया जाएगा। इस फंड का दो-तिहाई हिस्सा सीधे सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) और इमिग्रेशन कोर्ट्स को संचालित करने वाले विभाग (EOIR) को दिया जाएगा।
भारतीयों और छात्रों पर क्यों पड़ेगा सबसे बुरा असर?
अमेरिका में हर साल जारी होने वाले कुल H-1B वीजा का लगभग 70 फीसदी हिस्सा अकेले भारतीय प्रोफेशनल्स को मिलता है।
- भारतीय छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) के जरिए 12 से 36 महीने काम करते हैं और फिर H-1B वीजा हासिल करते हैं।
- यदि किसी कर्मचारी को स्पॉन्सर करने के लिए कंपनी को 99 लाख रुपये से अधिक की अतिरिक्त फीस देनी पड़ी, तो कंपनियां फ्रेश ग्रेजुएट्स और भारतीय प्रोफेशनल्स को नौकरी पर रखने से हिचकेंगी।
- इससे टेक और फाइनेंस सेक्टर में भारतीय युवाओं के लिए अमेरिकी कंपनियों के दरवाज़े कम हो सकते हैं।













































