China Air Defence System: दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयोजनों में शामिल पेरिस के प्रतिष्ठित यूरोसैटरी डिफेंस फेयर का समापन हो गया। इस प्रदर्शनी में अमेरिका, फ्रांस, इजरायल, दक्षिण कोरिया, चीन समेत कई देशों की रक्षा कंपनियों ने अपने सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य तकनीकों का प्रदर्शन किया। हालांकि, इस बार सबसे ज्यादा चर्चा चीन की मौजूदगी से ज्यादा उसके स्टॉल पर दिखाई गई कम दिलचस्पी को लेकर रही।
चीन की सरकारी रक्षा कंपनी नोरिन्को (NORINCO) अपने स्काई ड्रैगन-100, यितियन-II, लेजर वेपन और एंटी-ड्रोन सिस्टम जैसे आधुनिक हथियारों के साथ पहुंची थी। इसके बावजूद यूरोप और नाटो देशों के प्रतिनिधियों की भीड़ चीन के स्टॉल पर नजर नहीं आई। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी वजह केवल तकनीक नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में इन सिस्टमों का प्रदर्शन भी है।
पाकिस्तान बना चीन के एयर डिफेंस सिस्टम की सबसे बड़ी परीक्षा| China Air Defence System
चीन के एयर डिफेंस सिस्टम का सबसे बड़ा खरीदार पाकिस्तान है। पाकिस्तान के पास HQ-9/P जैसे लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, जिन्हें चीन अपनी रक्षा तकनीक की बड़ी उपलब्धि बताता रहा है। हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया सैन्य तनाव तथा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इन सिस्टमों की क्षमता को लेकर कई सवाल उठे।
भारत ने दावा किया कि उसके हमलों में पाकिस्तान के चीनी एयर डिफेंस सिस्टम प्रभावी साबित नहीं हुए और उसने अपने दावों के समर्थन में सबूत भी पेश किए। दूसरी ओर पाकिस्तान ने अलग दावे किए, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों के बीच चीनी सिस्टमों की वास्तविक क्षमता पर चर्चा तेज हो गई। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी हथियार की सबसे बड़ी परीक्षा वास्तविक युद्ध होता है और यही चुनौती चीन के सामने खड़ी हो गई है।
यूरोप क्यों नहीं दिखा उत्साहित?
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम कीमत है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की तुलना में चीन अपने एयर डिफेंस सिस्टम अपेक्षाकृत कम लागत पर उपलब्ध कराता है। यही कारण है कि पाकिस्तान, मिस्र, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों ने चीनी सिस्टम खरीदे हैं। लेकिन यूरोपीय बाजार केवल कीमत नहीं देखता। वहां यह भी परखा जाता है कि हथियार वास्तविक युद्ध में कितना सफल रहा, उसकी लॉजिस्टिक सपोर्ट कैसी है, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता कितनी आसान है और क्या वह नाटो नेटवर्क के साथ पूरी तरह काम कर सकता है। इन मानकों पर चीन को अभी लंबा सफर तय करना बाकी माना जा रहा है।
बदल गया है एयर डिफेंस का पूरा समीकरण
यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रह गया है। अब ड्रोन, क्रूज मिसाइलें और बैलिस्टिक मिसाइलें युद्ध की रणनीति बदल रही हैं। इसी वजह से एयर डिफेंस सिस्टम की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ी है। आज अमेरिका के THAAD और Patriot, यूरोप के SAMP/T NG तथा दक्षिण कोरिया के M-SAM और L-SAM जैसे सिस्टम अंतरराष्ट्रीय बाजार में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
दक्षिण कोरिया ने भी इस क्षेत्र में तेजी से अपनी पहचान बनाई है। यूएई ने दावा किया कि उसके M-SAM सिस्टम ने ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों के दौरान 30 में से 29 लक्ष्यों को सफलतापूर्वक नष्ट किया। इसके बाद सऊदी अरब और इराक जैसे देशों ने भी इस सिस्टम में रुचि दिखाई है।
सिर्फ तकनीक नहीं, भरोसा भी जरूरी
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हथियार खरीदते समय केवल तकनीकी विशेषताएं पर्याप्त नहीं होतीं। ग्राहक यह भी देखते हैं कि हथियार का युद्ध रिकॉर्ड कैसा है, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता कितनी भरोसेमंद होगी तथा भविष्य में रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स आसानी से मिल पाएंगे या नहीं। यही कारण है कि अमेरिकी और इजरायली सिस्टम वर्षों के युद्ध अनुभव के कारण भरोसेमंद माने जाते हैं। यूरोपीय सिस्टमों को नाटो देशों का समर्थन प्राप्त है, जबकि दक्षिण कोरिया तेजी से विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभर रहा है।
ईरान के अनुभव ने भी बढ़ाई चिंता
विश्लेषकों ने ईरान का उदाहरण भी सामने रखा है। ईरान की एयर डिफेंस व्यवस्था में रूसी और कुछ चीनी मूल के उपकरण शामिल हैं। हालिया अमेरिकी और इजरायली हमलों के दौरान इन प्रणालियों के प्रदर्शन को लेकर भी सवाल उठे। हालांकि किसी एक सिस्टम को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इससे चीनी हथियारों की विश्वसनीयता पर बहस और तेज हो गई।






























