Real Estate Market Crisis: देश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान रियल एस्टेट बाजार में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है। बड़े शहरों से लेकर उभरते हुए शहरी इलाकों तक घरों और फ्लैटों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में जिन लोगों ने समय रहते संपत्ति खरीद ली, वे खुद को फायदे की स्थिति में मान रहे हैं। वहीं, घर खरीदने की तैयारी कर रहे लाखों लोगों के मन में एक सवाल लगातार बना हुआ है कि क्या भारतीय प्रॉपर्टी बाजार अब गिरावट की ओर बढ़ रहा है या अभी कीमतों का सफर जारी रहेगा।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर रियल एस्टेट मार्केट को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। कहीं प्रॉपर्टी बबल फूटने की बात हो रही है तो कहीं बिक्री रुकने और कीमतों में भारी गिरावट आने की भविष्यवाणी की जा रही है। इन दावों ने आम खरीदारों को असमंजस में डाल दिया है।
वैश्विक हालात का पड़ रहा है असर| Real Estate Market Crisis
आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रियल एस्टेट विशेषज्ञ प्रदीप मिश्रा के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था आज वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ी हुई है। दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाले आर्थिक या राजनीतिक घटनाक्रम का असर भारत पर भी पड़ता है। उनका कहना है कि मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय तनाव और युद्ध जैसे हालात ने कच्चे तेल की कीमतों और रुपये की स्थिति को प्रभावित किया है। जब क्रूड ऑयल महंगा होता है तो केवल ईंधन ही नहीं, बल्कि परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत भी बढ़ जाती है। इसका सीधा असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ता है।
क्यों नहीं घट रही प्रॉपर्टी की कीमत?
प्रदीप मिश्रा बताते हैं कि निर्माण उद्योग में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल और उपकरण विदेशों से आते हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से इनकी लागत बढ़ जाती है। लोहा, सीमेंट, फिनिशिंग मटेरियल और अन्य निर्माण सामग्री महंगी होने से बिल्डरों की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में डेवलपर्स के लिए प्रॉपर्टी की कीमतों में बड़ी कटौती करना आसान नहीं होता। यही कारण है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में संपत्तियों के दाम एक निश्चित स्तर से नीचे नहीं आ रहे हैं।
क्रैश और करेक्शन में है बड़ा अंतर
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर जिस “मार्केट क्रैश” की चर्चा हो रही है, उसकी वास्तविकता अलग है। उनके मुताबिक क्रैश उस स्थिति को कहा जाता है जब बैंकिंग व्यवस्था संकट में आ जाए, डेवलपर्स दिवालिया होने लगें और लोग घबराकर अपनी संपत्तियां बेचने लगें। भारत में फिलहाल ऐसी कोई स्थिति नहीं है। इसके विपरीत बाजार में जो बदलाव दिख रहा है, उसे “मार्केट करेक्शन” कहा जा सकता है।
क्या है मार्केट करेक्शन?
जब किसी क्षेत्र में संपत्तियों की कीमतें वास्तविक मूल्य से काफी ऊपर चली जाती हैं, तो समय के साथ बाजार उन्हें संतुलित करता है। मौजूदा समय में कुछ प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स में 5 से 10 प्रतिशत तक का ठहराव या मामूली गिरावट इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह बाजार की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी परिपक्वता और स्थिरता का संकेत है।
अफोर्डेबल हाउसिंग की कमी बनी बड़ी वजह
भारतीय रियल एस्टेट बाजार की सबसे बड़ी ताकत लगातार बनी रहने वाली मांग है। देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो निवेश के लिए नहीं बल्कि रहने के लिए घर खरीदना चाहते हैं। हालांकि, समस्या यह है कि मध्यम वर्ग की जरूरत के हिसाब से सस्ते और किफायती घरों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। एक तरफ हाई नेटवर्थ निवेशक और बड़े खरीदार लग्जरी प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम परिवार अपने बजट के अनुरूप घर तलाश रहा है।
खरीदार अब सोच-समझकर ले रहे फैसला
बढ़ती महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं का असर लोगों की क्रय शक्ति पर जरूर पड़ा है। अब परिवारों को स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य जरूरी खर्चों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। यही वजह है कि घर खरीदने का फैसला पहले की तुलना में अधिक सोच-समझकर लिया जा रहा है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारतीय रियल एस्टेट बाजार में किसी बड़े क्रैश की संभावना नहीं दिखती। बाजार फिलहाल एक संतुलन और सुधार के दौर से गुजर रहा है, जबकि मजबूत मांग इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है।
































