जब PMO में मिले जासूसी डिवाइस, पूरी कहानी जान चौंक जाएंगे आप!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 08 अप्रैल 2024, 05:30 AM Updated: 08 अप्रैल 2024, 05:30 AM
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भारत के प्रधानमंत्री के कार्यालय यानी PMO में बेहद कड़ी सुरक्षा रहती है, फिर भी यहां फुलप्रूफ सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। अगर PMO में रखी जानकारी लीक हो जाए तो देश को इतना बड़ा नुकसान होगा कि आप सोच भी नहीं सकते। फुल प्रूफ सुरक्षा के बावजूद PMO में कई बार जासूसी मिशन को अंजाम दिया जा चुका है। PMO में हुई जासूसी से जुड़ा एक ऐसा ही किस्सा आज हम आपके साथ शेयर करने जा रहे हैं।

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PMO में जासूस को मिली जानकारी

90 के दशक के जाने-माने आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) अधिकारी मलय कृष्ण धर सुबह-सुबह PMO पहुंचे और अपनी जांच शुरू की। मलय कृष्णा को अपने इंटेलिजेंस से जानकारी मिली थी कि कोई PMO की जानकारी लीक कर रहा है। जासूस को ये आदेश मिला था कि पता लगाया जाए कि ये जानकारी कहां और कैसे लीक हो रही है।

इस घटना का जिक्र मलय कृष्ण धर ने अपनी किताब ओपन सीक्रेट्स: इंडियाज इंटेलिजेंस अनवील्ड में किया है. वह लिखते हैं- ‘जनवरी 1992 में मुझे साउथ ब्लॉक स्थित पीएमओ से जुड़ा मिशन मिला। काम था पीएमओ की इलेक्ट्रॉनिक जांच करके यह पता लगाना कि क्या वहां कोई जासूसी उपकरण लगाए गए थे। इसके लिए मैं संवेदनशील बग डिटेक्शन उपकरण का उपयोग करने जा रहा था।’

मलय कृष्ण धर ने पीएमओ की जासूसी का कारण बताते हुए दावा किया था कि इसकी वजह राजीव गांधी और वीपी सिंह के बीच राजनीतिक दुश्मनी थी।

किसने की पीएमओ की फोन रिकॉर्डिंग

उन्होंने अपनी कितताब में आगे लिखा है, ‘ पीएमओ के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच के दौरान जब मैंने एक वीवीआईपी फोन का निरीक्षण किया तो मैं हैरान रह गया। इस फोन के अंदर एक छोटी मशीन और एक छोटी रेडियो मॉनिटरिंग मशीन थी। लैंडलाइन फोन से पीएमओ में बैठे अधिकारी की बातचीत रिकॉर्ड की जा रही थी।’

मलय कृष्णा के अनुसार, रिकॉर्डिंग के लिए इस्तेमाल किया गया फोन तत्कालीन प्रधान मंत्री के सहायक द्वारा इस्तेमाल किया गया था। यह पीएमओ की सुरक्षा में गंभीर विफलता थी। वह अपनी किताब में आगे लिखते हैं, ”यह डिवाइस उस टेलीफोन में किसी और ने नहीं बल्कि आईबी ने ही लगाई थी और यह काम वीपी सिंह के दौर में किया गया था। जिससे आईबी को पीएमओ में महत्वपूर्ण बदलावों पर लगातार अपडेट मिलते रहे। मेरी समझ के अनुसार, यह रिकॉर्डिंग अंततः राजीव गांधी को भेजी गई थी।”

ऐसे हुआ पर्दाफाश

मलय के मुताबिक, उन्हें इस जासूसी उपकरण के बारे में जनवरी 1992 में पता चला, जब पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। यहां यह बताना जरूरी है कि इससे पहले नवंबर 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिर गई थी और 21 मई 1991 को लिट्टे के हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई थी। उन्होंने अपनी किताब में लिखा, ‘त्वरित राजनीतिक और नौकरशाही बदलाव के दौरान कोई पीएमओ से जासूसी उपकरणों को हटाना भूल गया था। मैंने कुछ इलेक्ट्रॉनिक डिबगिंग तकनीकों का प्रदर्शन करके इसे ठीक किया। मैं देश के सर्वोच्च पद की पवित्रता बनाए रखने के लिए बस इतना ही कर सका।’

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