पंजाब से मध्य प्रदेश तक मानवता और अध्यात्म का वो सफर, जिसने एमपी को बनाया सिख इतिहास का गवाह – Sikh history in Madhya Pradesh

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 24 Jun 2026, 11:10 AM | Updated: 24 Jun 2026, 11:10 AM

Sikh history in Madhya Pradesh: जब सिख धर्म की नींव पड़ी, जो जरूरी ये था कि सिख गुरुओ की वाणी, उनके विचार, उनकी मानवता की सेवा की भावना केवल पंजाब की ही धरती तक सिमित न रहे.. और इसलिए आदि गुरु साहिब सिखों धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने आध्यत्म को प्राप्त करने की इस नई विचारधारा को दुनिया के कोने कोने में पहुंचाने के लिए करीब 28 सालों तक यात्रायें की थी.. जिन्हें सिख गुरु साहिब की उदासियां कहते है.. लेकिन इन यात्राओं में कुछ ऐसे स्थान हुए जो सदा के लिए अमर हो गए.. और उन्ही में से एक है आज का मध्य प्रदेश.. जहां केवल गुरु नानक देव जी के ही पावन पाव नहीं पड़े थे, बल्कि ये धरती गवाह है छठे गुरु हरगोबिंद सिंह की बहादुरी की.. जिन्होंने मुगल शासक जहांगीर के तमाम अत्याचार सहें लेकिन झुके नहीं.. वहीं ये पावन धरती सम्मान है उन सिकलीगर सिखों का…जिन्हें दसवें गुरु गोबिंदसिंह जी ने अपने बंदे घोषित किये थे। इन गुरुओ के सम्मान में यहां अनगिनत गुरुद्वारो का निर्माण हुआ. जो प्रमाण है सिख धर्म के मध्य प्रदेश में फलने फूलने की.. जानेंगे कुछ ऐसे ही 5 ऐतिहासिक सिख गुरुद्वारों के बारे में.

गुरुद्वारा इमली साहिब इंदौर – Gurudwara Imli Sahib, Indore

कहा जाता है कि पहले पातशाह गुरु नानक देव जी 1511 में अपनी उदासियों के दौरान मध्य प्रदेश के कई इलाकों में गए थे और वहां उन्होंने धर्म का प्रचार किया था। इंदौर में बना गुरुद्वारा इमली साहिब गुरु साहिब के यहां आगमन की प्रत्यक्ष निशानी है। कहा जाता है कि गुरु साहिब इंदौर में इमली के पेड़ खुद अपने हाथों से लगाया था और उसके पास ही बैठ कर लोगो को प्रवचन दिया करते थे। आज के समय में  इंदौर शहर के मशहूर क्षेत्र राजवाड़ा में गुरु नानक चौक के पास ये इमली का पेड़ मौजूद है।

गुरु साहिब के पवित्र चरण यहां पड़े थे और उन्होंने अपने हाथों से जिस पवित्र पेड़ को लगाया, वो भी आध्यत्मिक शक्ति से भर गया, गुरु साहिब के सम्मान में यहां गुरुद्वारे का निर्माण कराया गया जिसे गुरु द्वारा इमली साहिब कहा गया। हालांकि उस वक्त इंदैर शहर बसा भी नहीं था, लेकिन 1940 में गुरु सिंह सभा इंदौर समिति ने फिर से इस गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार किया और आज यहां एक आलीशान इमारत खड़ी है। ये गुरुद्वारा सिक्खी की परंपरा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

गुरुद्वारा ओमकारेश्वर साहिब – Gurudwara Omkareshwar Sahib

पवित्र नर्मदा नदी के किनारे भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ओमकारेश्वर मंदिर है। जहां खुद पहले गुरु नानक देव जी आये थे। गुरु साहिब ने नर्मदा नदी के किनारे बैठ कर संगतो को सिख धर्म की सीख दी थी..और नर्मदा की परिक्रम भी की थी। जिसके कारण उनके सम्मान में गुरूद्वारा ओमकारेश्वर स्थापित किया गया। दखनी ओंकार के अनुसार गुरु साहिब का ओंकारेश्वर मंदिर के पुजारी के साथ संवाद हुआ था, जिसे दखनी ओंकार कहा गया।

गुरु साहिब ने पंडित को समझाया था कि  ईश्वर की कोई त्रिमूर्ति नहीं है, वो  ‘एक और एकमात्र’ है। ईश्वर एक ‘शाश्वत सत्ता’ और अवर्णनीय है, इसका कोई मानवीय स्वरूप नहीं हो सकता है, जिसे आप ओंकार कहें। गुरु साहिब ने ऐसा संदेश देकर लोगो को इस बात के लिए जागरूक किया कि बाहरी आंडबरो में नहीं बल्कि एक परमपिता परमेश्वर ही सच्चा है। यहां मौजूद गुरुद्वारा गुरुसाहिब के इस महान ज्ञान का प्रतीक है।

गुरुद्वारा दाताबंदी छोड़ ग्वालिय़र Gurudwara Data Bandi Chhor, Gwalior

गुरुद्वारा दाताबंदी छोड़ असल में सिखो के छठे गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब के उस त्याग और सच्ची निष्ठा की निशानी है, जब उन्होंने केवल मानवता की रक्षा के लिए तत्कालीन मुगल सम्राट जहांगीर के खिलाफ जाकर शरण में आये हुए शहजादे खुर्रम जिसे आज हम शाहजहां के नाम से जानते है उनकी मदद की थी, लेकिन जहांगीर को ये द्रोह लगा, और उसने गुरुसाहिब को ग्वालियर के किले में 52 राजाओं के साथ कैद कर दिया। गुरुसाहिब ने ही मीरी और पीरी का संदेश दिया था, और वो पहले गुरु थे जिन्हें  शास्त्र और शस्त्र दोनों  का ज्ञान था.. लेकिन जहांगीर ने उन्हें धोखे से कैद करवा दिया, जहां वो करीब  दो साल तीन महीने तक ग्वालियर किले की जेल में कैद रहे थे, मगर इसी बीच जहांगीर को एक लाइलाज बीमारी हो गई.. जब महल के पीरों ने जहांगीर को देखा तो उन लोगो ने जहांगीर को सलाह की कि वो सिख गुरु को कैद से रिहा कर दें तभी जहांगीर ठीक हो पायेगा। जहांगीर मान गया, मगर गुरु साहिब ने शर्त रखी कि उनके साथ साथ 52 राजाओं को भी रिहा कर दिया जायें। जहांगीर ने ऐसा ही किया.. सालो की यातना के बाद गुरूसाहिब की कृपा उन शासकों पर हुई.. जिसके लिए उन लोगो ने ग्वालियर किले में गुरु साहिब के सम्मान में एक गुरुद्वारा बनवाया जिसे नाम मिला ‘दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा। जो स्वतंत्रता और मानवता की सेवा का प्रतीक कहलाता है।

गुरुद्वारा बड़ी संगत बुरहानपुर – Gurudwara Badi Sangat, Burhanpur

सिखो के दसवे गुरु गुरु गोबिंद सिंह द्वारा मध्य प्रदेश के धरती पर कदम रखने और कभी निम्न जाति के समझे जाने वाले सिकलीगर समुदाय के हथियार बनाने की कला औऱ गुरु साहिब के प्रति उनकी निष्ठा से प्रभावित होकर उन्हे अपनी शरण में लेने की प्रत्यक्ष कहानी कहता है बुरहानपुर का गुरुद्वारा बड़ी संगत। सन् 1708 में अपनी दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान गुरुसाहिब बुरहानपुर में कुछ समय के लिए रूके थे, इस दौरान यहां रहने वाले सिकलीगर समुदाय के लोगो ने गुरु साहिब के सामने अपनी निष्ठा दिखाई.. वो शस्त्र बनाने में माहिर थे, उन्होंने गुरुसाहिब के शस्त्र भेंट किये थे.. उनकी निष्ठा देकर गुरु साहिब ने उन्हें अपनी शरण में ले लिया था। सिकलीगर सिखों की निष्ठा औऱ गुरु साहिब की उदारता की निशानी है गुरुद्वारा बड़ी संगत.. जहां गुरुसाहिब ने अपना बड़ा दिल दिखाया था, और सिकलीगर समुदाय को सिख होने का दर्जा मिला था। यहां दसवे गुरु ने खुद पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया था। यहां आज सफेद संगमरमर से बना हुआ आलीशान गुरुद्वारा है।

सिंधी गुरुद्वारा दतिया – Sindhi Gurudwara, Datia

1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तब सिंध के रहने वाले सिंधी लोग भारत के कई कोने में विस्थापित होकर आ गए थे, उन्हीं में से एक शहर है मध्य प्रदेश का दतिया। हालांकि सभी सिंध सिख धर्म को नहीं मानते लेकिन कुछ सिंधी सिख धर्म के अनुयायी है, जिन्होंने यहां प्रवास के दौरान सिंधी गुरुद्वारे का निर्माण कराया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां रहने वाले सिँधी समुदाय के लोग हर साल गुरु प्रव से 13 दिन पहले रामधुन यात्रा शुरु करते है, जो कि ज्योति मंदिर से शुरु होती है और बड़ी माता मंदिर होते हुए ठाकुर श्री बड़े गोविंद मंदिर जाती है और फिर गुरु नानक देव जी जयंति के दिन इस यात्रा का समापन होता है। जो कि अंत में सिंधी गुरुद्वारे तक होगी। एक निशाल प्रभात फेरी निकाली जाती है.. जो मंदिर से गुरुद्वारे तक चलती है। ये निशानी है यहां सिख और हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण मैत्रीपूर्ण संबंध का। जो आजाद के बाद से चला आ रहा है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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