कौन थे पूरन भगत? राजकुमार से महान तपस्वी बनने की वो अमर कहानी, जिसने बदला पंजाब का इतिहास – Puran Bhagat

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 24 Jun 2026, 11:32 AM | Updated: 24 Jun 2026, 11:32 AM

Puran Bhagat: एक कहावत है, मेहनत इतनी खामोशी से करो की सफलता शोर मचा दें.. हीरा कितनी भी कोयले के बीच रहे, उसकी चमक कभी कम नही होती है.. हमारे समाज में ऐसे अनगिनत महापुरुष हुए, जिन्होंने समाज सेवा के लिए पूरा जीवन न्यौछावर कर दिया.. जो भले ही दुनिया में प्रचलित नहीं हुए लेकिन उन्होंने अपने कार्यों से लोगो के दिलों में सम्मान हासिल किया .. एक ऐसे ही परोपकारी महापुरुष हुए भगत पूरन सिंह। जिन्होंने अपना पूरा जीवन प्रयावरण को बचाने में लगा दिया था.. उन्होंने विकलांगो औऱ जरूरतमंदो के लिए एक ऐसी संस्था शुरु की, जिसके दम पर विकलांगो को मुख्यधारा के साथ चलने की ताकत मिली थी। जो पिंगल के भगत कहलाते थे।

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कौन थे पूरन भगत सिंह

भगत पूरन सिंह, जिनका जन्म  4 जून 1904 को पंजाब के लुधियाना जिले के रोहनो जिसे वर्तमान में राजेवाल के नाम से जाना जाता है, के पास खन्ना  गांव में हुआ था। पिता छिब्बू मल्ल पेशे से बैंकर थे और माता  मेहताब कौर एक गृहणी थी.. भगत पूरन सिंह को उनके माता पिता ने नाम दिया  रामजी दास.. सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन अचानक पिता का बिजनस ठप हो गया और उनका इस सदमें के कारण निधन हो गया। उनकी मां बेहद धार्मिक महिला थी, और रामजी दास अपनी मां के बेहद करीबी थे, जिसकर आध्यात्मिकता की ओर उनका झुकाव खुद ही होने लगा। पिता की मौत के कारण घर में आर्थिक तंगी आ गई.. लेकिन मां ने अपने बेटे का पढ़ाई के प्रति जूनून देखा था, नतीजा उन्होंने बच्चे की पढ़ाई को रूकने नहीं दिया औऱ एक डॉक्टर के घर में रसोइया का काम करने लगी, ताकि बेटे की शिक्षा न रूके।

जिसके बाद वो लाहौर चली गई , जहां वो घरेली सहायिका के तौर पर काम करती थी। औऱ रामजी दास छात्रावास में रहते थे.. साल 1923 में उन्होंने लुधियाना में दसवीं की परीक्षा दी थी, लेकिन वो फेल हो गए, जिससे उन्हें उनकी मां ने लाहौर बुला लिया। जहां वो देहरा साहिब लाहौर की सेवा में भी लगे रहते थे। देहरा साहिब लाहौर की सेवा के दौरान उनका झुकाव सिख धर्म की तरफ होने लगा। सिख धर्म में परोपकार और सेवा की भावना ने उन्हें इतना प्रभावित किया था कि उन्होंने सेवा पंथी सिख धर्म अपना लिया और अपना नाम रामजी दास से बदल कर भगत पूरन सिंह रख लिया।

विकलांगो के प्रति लगाव

गुरुद्वारें में रहते हुए पहली बार उनकी मुलाकात एक 4 साल के कुष्ठ रोगी से हुई थी.. जिसे उसके परिवार  वालों ने उसके रोग के कारण त्याग दिया था.. और बस यहीं से भगत पूरन सिंह के जीवन ने नई करवट ली। उन्होंने गुरुद्वारे में रह कर लोगो का देसी तरीके से इलाज करना सीखा.. वो वहां आने वाले मरीजो का इलाज करते थे। समय बीतता गया, वो लोगो की सेवा में लगे रहे.. लेकिन जब देश आजाद हुआ, तब उन्होंने तय किया कि बंटवारे के समय पीड़ितों की सहायता की जायें.. उन्होंने 1947 में अमृतसर के एक शरणार्थी शिविर में बतौर डॉक्टर काम करना शुरु कर दिया था।

जिसमें तब 25 हजार शरणार्थी रहा करते थे। उन्होंने 1947 से 1958 तक भगत पूरन सिंह का कोई स्थायी घर नहीं था, वो जरूरतमंदो और विकलांगो की मदद करने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते थे, वो लोगों के चंदा इकट्टा करते थे ताकि विकलांगो की मदद के लिए कुछ बड़ा किया जा सकें, और इस दौरान ही उनकी मुलाकात हुई देश राज बिंद्रा से.. जिन्होंने भगत पूरन सिंह का समाज सेवा के प्रति जूनून देखा औऱ वो उनके काफी प्रभावित हुए,. उन्होंने तय किया कि वो दोनो मिलकर गरीबों और विकलांगों की देखभाल के लिए अखिल भारतीय पिंगलवारा चैरिटेबल सोसाइटी नाम की धर्माथ संस्था खोली। ये संस्था आज आज भी अमृतसर के ग्रैंड ट्रंक रोड स्थित तहसीलपुरा में विकलांगो की सेवा करती है।

पर्यावरण से जुड़े मुद्दे पर चर्चा

भगत पूरन सिंह केवल यहीं तक सिमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने पर्यावरण की रक्षा के लिए अनगिनत वृक्षारोपण अभियान आयोजित किए थे। पर्यावरण को बचाने के लिए उन्होंने मानव शिक्षा’ , ‘ केवल धर्म ही राष्ट्र को उत्थापित करता है’ , ‘ पौधे लगाओ या नष्ट हो जाओ’ , ‘ मार्ग ‘ और ‘बढ़ती जनसंख्या’ जैसे संगीन मुद्दों पर किताबे लिखी, जो लोगो को आने वाली समस्याओं के प्रति जागरूक करने के लिए थे। वो अक्सर पिंगलवारा सोसाइटी के माध्यम से पर्यावरण संबंधी मुद्दों से जुड़ी किताबें और पर्चे लोगो को वितरित किया करते थे। उनके किये गए असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए 1981 में भारत सरकार नेउन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।

पर्यावरण को बचाने के लिए लगा दिया जीवन

हालांकि जब 1984 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर ऑपरेशन ब्लू स्टार करवाया था तो भगत पूरन सिंह ने उससे नाराज होकर पुरुस्कार औऱ पदक दोनों ही लौटा दिये थे। भगत पूरन सिंह ने अपना पूरा जीवन परोपकार, संगत सेवा, पर्यावरण को बचाने के लिए लगा दिया.. जिसका प्रभाव ऐसा था कि साल 1991 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था, हालांकि वो पुरुस्कार उन्हें नहीं मिला था, लेकिन उनका नामांकित होना ही उनकी उपलब्धि का प्रमाण था।

5 अगस्त 1992 को को अमृतसर में 88 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। उनका जाना एक बड़ी क्षति थी, लेकिन उन्होंने हजारों विकलांगों और गरीबो को जीने की तब नई राह दिखाई, जब वो हार मान गए थे। उनका उपलब्धियों के कारण पंजाब में वो हमेशा एक सम्मानिय महापुरुष रहेंगे।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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