Russia Oil Sanctions: रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से प्रस्तावित नए टैरिफ वैश्विक तेल बाजार में एक बार फिर अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में रूसी तेल की आपूर्ति का विकल्प तलाशना आसान नहीं होगा। सीमित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बने भू-राजनीतिक जोखिम और दूसरे स्रोतों की सीमित उपलब्धता के कारण वैश्विक बाजार पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
रूसी तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत आधार| Russia Oil Sanctions
मार्केट इंटेलिजेंस फर्म केप्लर के एनालिस्ट सुमित रितोलिया का कहना है कि रूस से आने वाला कच्चा तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे मजबूत सहारा बन चुका है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटों और बढ़ते तनाव के बाद भारत के लिए रूसी सप्लाई का महत्व और बढ़ गया है। उनका मानना है कि यदि इस सप्लाई में किसी तरह की बड़ी बाधा आती है तो इसका सीधा असर भारत की तेल खरीद लागत और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।
अमेरिकी सीनेट में संशोधित बिल पेश
मंगलवार को अमेरिकी सीनेटरों ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़ा एक संशोधित द्विदलीय बिल पेश किया। इस प्रस्ताव में रूसी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर लगाए जाने वाले टैरिफ में बदलाव किया गया है। पहले जहां अप्रैल 2025 में पेश किए गए मसौदे में 500 फीसदी तक टैरिफ का प्रस्ताव था, वहीं अब इसे घटाकर अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है। नए प्रस्ताव में उन देशों को कुछ राहत भी दी गई है, जो रूस के प्राकृतिक गैस निर्यात का 15 फीसदी से कम आयात करते हैं और अपनी खरीद में कमी लाने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं।
भारत और चीन सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं
यह प्रस्ताव खास तौर पर भारत और चीन जैसे देशों के लिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि दोनों रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, जून में रूस ने भारत को प्रतिदिन करीब 26 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति की। यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का आधे से भी अधिक हिस्सा था। मार्च के बाद से रूसी तेल का आयात लगातार बढ़ रहा है और जुलाई में भी इसकी मात्रा जून के बराबर या उससे अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है।
रूसी सप्लाई का विकल्प खोजना आसान नहीं
सुमित रितोलिया का कहना है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अमेरिकी टैरिफ की वजह से रूसी तेल की खरीद में भारी कमी आती है तो उसकी भरपाई कौन करेगा। उनका मानना है कि मौजूदा समय में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बहुत सीमित है। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास जारी तनाव और दूसरे सप्लायर देशों की सीमित क्षमता के कारण रूस की जगह किसी अन्य स्रोत से इतनी बड़ी मात्रा में तेल हासिल करना बेहद मुश्किल होगा।
उनके मुताबिक, अगर रूसी निर्यात में बड़ी बाधा आती है तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
भारत के लिए विकल्प फिलहाल बेहद सीमित
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसे रूसी तेल जैसी मात्रा, भरोसेमंद सप्लाई और प्रतिस्पर्धी कीमत पर कोई दूसरा विकल्प आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से मौजूदा परिस्थितियों में रूस भारत के लिए सबसे व्यावहारिक आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। रितोलिया ने यह भी कहा कि प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ से फिलहाल भू-राजनीतिक अनिश्चितता जरूर बढ़ी है, लेकिन इनका अंतिम स्वरूप क्या होगा और इनका वैश्विक तेल व्यापार पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।





























