Saudi Arabia Iran Relations: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे मध्य पूर्व को तनाव के दौर में ला खड़ा किया है। दोनों देश लगातार एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहे हैं, जिससे क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक ऐसा देश है, जिसकी भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में है। यह देश है सऊदी अरब, जो एक तरफ अमेरिका का करीबी सहयोगी माना जाता है, तो दूसरी ओर हाल के वर्षों में उसने ईरान के साथ भी अपने रिश्तों को काफी बेहतर किया है।
ईरान के निशाने से दूर रहा सऊदी अरब| Saudi Arabia Iran Relations
इस साल फरवरी में शुरू हुए मध्य पूर्व संघर्ष के दौरान ईरान ने कई अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों पर हमले किए। हैरानी की बात यह रही कि जिन देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं, उनमें सऊदी अरब सबसे कम प्रभावित रहा। यहां तक कि ईरान ने अपने पुराने सहयोगी ओमान पर भी हमले किए, लेकिन सऊदी अरब के खिलाफ कोई बड़ा सैन्य कदम नहीं उठाया। इससे दोनों देशों के रिश्तों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
खामेनेई के अंतिम संस्कार में भेजा बड़ा प्रतिनिधिमंडल
दोनों देशों के बीच बढ़ती नजदीकियों की झलक हाल ही में भी देखने को मिली। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में जहां अधिकतर खाड़ी देशों ने दूरी बनाए रखी, वहीं सऊदी अरब ने तेहरान में अपना बड़ा प्रतिनिधिमंडल भेजा। इसके साथ ही मौजूदा तनाव के दौरान भी सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरघची के बीच लगातार बातचीत जारी है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देश संवाद के जरिए रिश्तों को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं।
कुछ महीने पहले तक अलग थी तस्वीर
दिलचस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले हालात बिल्कुल अलग नजर आ रहे थे। 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, तब कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि सऊदी अरब भी इस अभियान में शामिल हो सकता है। हालांकि, इन खबरों ने इसलिए भी हैरानी पैदा की क्योंकि इससे दो साल पहले ही चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ था। इसी समझौते के बाद दोनों देशों के राजनयिक संबंध बहाल हुए और कई उच्चस्तरीय मुलाकातें भी हुईं।
विदेश नीति में बड़ा बदलाव
सऊदी अरब लंबे समय तक ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी बढ़ती सैन्य ताकत को लेकर रियाद की चिंता भी किसी से छिपी नहीं रही। लेकिन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है। अब रियाद टकराव की बजाय संतुलन और कूटनीतिक संवाद को प्राथमिकता देता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि कभी कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे दोनों देशों के बीच अब रिश्तों में नरमी देखने को मिल रही है।
‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ से बनाई दूरी
सऊदी अरब के बदले रुख की एक बड़ी मिसाल तब सामने आई, जब अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ शुरू करने की योजना बनाई। रियाद ने इस पहल में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। माना जाता है कि सऊदी अरब के इस फैसले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस योजना को आगे बढ़ाने से पहले ही रोकना पड़ा। इसके बाद अमेरिका ने नाराजगी जाहिर करते हुए सऊदी अरब से अपने कई रक्षा उपकरण भी हटा लिए, लेकिन रियाद ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया।
तटस्थ रहकर साध रहा संतुलन
मौजूदा हालात में सऊदी अरब खुद को ऐसे देश के रूप में पेश करना चाहता है, जिसके अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलित संबंध हों। यही कारण है कि वह इस संघर्ष में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा होने की बजाय तटस्थ रहने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। बदलती क्षेत्रीय राजनीति में सऊदी अरब की यही नीति आने वाले समय में मध्य पूर्व की कूटनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।





























