Punjabi sath institution: जैसे जैसे भारत विकास की तरफ बड़ रहा है, कहीं न कहीं लोग भारत की मूल संस्कृति को छोड़ कर पश्चिमी संस्कृति की तरफ जा रहे है। लेकिन इसके बाद भी केवल सिख धर्म और खालसा नियम ही है ऐसे संस्कृति है जिनपर आज भी पश्चिमी सभ्यता के साथ साथ अपनी मूल संस्कृति को लेकर चल रहे है। गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा हर एक सिख अनुयायी के लिए बताये गए नियमों को आज भी वो पूरी शिद्दत से फॉलो करते है। पंच ककार धारण करना हो, नगर कीर्तन हो, शब्दबाणी का पाठ हो या पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की सिमरन हो जिसने भी अमृत चखा है वो सच्चा सिख है।
लेकिन जो गुरु के रास्ते पर चलता है वो भी सच्चा सिख ही कहलाता है। मगर विडंबना ये है कि मौजूदा समय में पंजाब जो कि सिखो की नगरी कहलाती है, अपनी मूल पहचान से दूर जा रहा है, जिसे बचाने की जिम्मेदारी ली है सथ्थ ने,, सथ्थ जो सिख गुरुओ के बताये दो नियमों के अनुसार काम करते है। जो पंजाब की साहित्यिक पहचान को बचाये रखने, पंजाबी भाषा और पंजाबियत को बचाये रखने के लिए वैश्विक तौर पर काम कर रही है। अपने इस लेख में सथ्थ के बारे में जानेंगे।
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सथ्थ की शुरुआत कैसे हुई – Punjabi sath institution
पंजाब के दोआबा क्षेत्र में मौजूद है एक गांव लांबड़ा… जालंधर-नकोदर रोड पर बसे एक छोटे से गांव लांबड़ां में एक छोटे से अस्पताल से सथ्थ नाम की संस्था को शुरू किया था डॉक्टर श्री निर्मल सिंह जी ने। जो कि सथ्थ के प्रमुख सेवादार भी है। इस संस्था को 5 मई 1991 में डॉक्टर निर्मल सिंह, प्रोफेसर निरंजन सिंह धेसी और डॉ नाहर सिंह ने मिलकर स्थापित किया था। इस संस्था के जरिए पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब के बीच एक रिश्ता स्थापित करके भारत और पाकिस्तान के पंजाब की सांस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरो को आपस में सांझा करना है। ऐसा करने से भाषाई और पंजाब की सांस्कृति धरोहरो को सुरक्षित रखने की बड़ी पहल की गई।
सथ्थ सिख किन गुरुओं की विचारधारा पर काम करती? – Punjabi sath institution
सथ्थ सिख दो दो गुरुओ की विचारधारा पर कार्य करती है। पहले गुरु नानक देव जी.. जिनके किरत करो, किरस करो, और वंड छको के आधार पर काम करता है। जिसका मतलब है काम करो, किफायत करों और मिलकर बांटकर खाओं। इसके बाद अगर आपके पास समय हो तो उस समय को सामाजिक कामों में, संगत सेवा में लगाओ। दूसरा मंत्र है सिखों के तीसरे गुरु श्री अमरदासजी का, …. उन्होंने कहा कि मन तू जोति सरूप है, अपना मूल पछाण। जब तक व्यक्ति अपनी मूल मन की पहचान नहीं कर लेता तब तक व्यक्ति का जीवन सार्थक कैसे हो सकता है? इसलिए सबसे पहले अपने अंदर झांको, अपनी अच्छाई बुराई को पहचानों तभी आप गुरू को पा सकते है। डॉ निर्मल कहते है कि सथ्थ दरअसल पंजाब के लोकजीवन, विरासत, मां बोली, पर्यावरण को बचाने के लिए जो भी काम कर रहा है, उसके कारण आज उसकी 40 ब्रांच बन गए है।
सत्थ का अपना प्रकाशन – Punjabi sath institution
सथ्थ का अपना पंचनद नामक प्रकाशन है, जिसमें एक सौ चालीस किताबे छापी जा चुकी है, इस किताबों में सथ्थ के कार्यकर्ता इस संस्था के साथ काम करते वक्त जो भी महसूस करते है, सेवादार बनने के बाद जो भी अनुभव उन्हें होता है वो कविता, कहानी के जरिये बताते है इनके अलावा भी दुखांत किस्से, रस्मों-रिवाज, देशज बाल साहित्य, लोकजीवन, किस्सा शहीदे आजम भगत सिंह, कूका लहर जैसी लोकप्रियता किताबें छापी गई है। सथ्थ ने उन सभी पंजाबियों को अपनी मूलता के करीब लाने की कोशिश की है जो अपनी मिट्टी की पहचान को भूल चुके है। मिट्टी की शुद्धता ही समाज को शुद्ध कर सकती है।
पंजाब की पंजाबियत खोने लगी – Punjabi sath institution
किसी भी संस्कृति की पहचान वहां की मिट्टी से ही होता है। पंजाब के लोगो का ध्यान असल में दो अलग अलग फांको में बंट गया है, एक नशाखोरी तरफ और दूसरी राजनीतिक उतार चढ़ाव में.. जिसके कारण पंजाब की पंजाबियत खोने लगी। विकास की गाड़ी की तेज रफ्तार के कारण पंजाब ने अपनी मूल संस्कृति को खो दिया है, जिसे सथ्थ बचाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। डॉ निर्मल ने सथ्थ द्वारा लांबड़ां गांव के ही एक स्कूल में विरासती म्यूजियम भी बनवाया है, जहां सैकड़ों साल पुरानी चीजें जिसमें खेती के औजार, पानी निकालने के स्त्रोत, कई प्रकार के चरखें, बीज रखने वाली मिट्टी की बर्तन, चूल्हों के कई प्रकार, कांसे के बर्तन, सूफी संतों की मालाएं, सूक्तियों की पांडुलिपियां, लोक कवियों के तस्वीर, कीर्तन करने के लिए इस्तेमाल होने वाले सदियों पुराने वाद्य यंत्र रखे गए हैं।
ये संग्रहालय बिना किसी बाहरी अनुदान के ही चलता है।…. डॉ निर्मल मानते है कि हमारा कल्चर और संस्कृति को बचाने के लिए सबसे बेहतर जरिया गांव ही है.. शहर वाले अपनी मूल पहचान से दूर होने लगे है, वहीं सथ्थ बाहरी आंडबरो को फॉलो करने के बजाये मूल चीजो से खुद को जीवंत करने की , पंजाबी की संस्कृति को जीवंत करने की कोशिश कर रहा है। सथ्थ जैसी संस्थायें हो तो पंजाब की न तो पंजाबियत खत्म होगी और न ही कोई बाहरी आडंबर मूल संस्कृति से दूर कर सकेगी।






























