Maharaja Ranjit singh: शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह.. जिनके बचपन का नाम बुध सिंह था, उन्होंने मात्र 12 साल की उम्र में अपने पिता महासिंह को खो दिया था, महासिंह जी तब पंजाब के 12 मिसलो में से एक सुकरचकिया मिसल के कमांडर थे। महाराजा जब 4 या 5 साल के थे तब उन्हें चेचक की बीमारी हो गई थी जिससे उनकी एक आँख की रोशनी चली गई.. अभी वो इस दर्द से उबर ही नहीं पाये थे कि उनके सिर से 12 साल की उम्र में पिता का साया हट गया, सुकचरिया मिसल की कमान अब उनके हाथो में थी, लेकिन बालक बुध सिंह को केवल एक छोटा सा इलाका नहीं बल्कि पूरा पंजाब चाहिए था.. जैसे जैसे उम्र बढ़ी वैसे वैसे उन्होंने अपने साम्राज्य का भी विस्तार किया।
वो एक मिसल नायक से अब महाराजा बनने की तरफ बढ़ने लगे और मात्र 19 साल में उन्होंने पंजाब के सभी मिसलों को या तो मैत्रीपूर्ण बातचीत से या ताकत से अपने मिसल में मिला लिया.. जिसका नतीजा ये हुआ कि पहली बार 1801 में पंजाब में सिख सम्राज्य की स्थापना हुई। कहा जाता है कि 18वी सदी में भारत असल में दो ही हिस्सों में बंटा हुआ था.. पंजाब की सतलुज नदी के एक पार था विशाल ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी का साम्रज्य तो वहीं दूसरी तरफ था महाराजा रणजीत सिंह का खालसा सम्राज्या। लगातार मुगलो औऱ अफगानो के हमलो से तंग आकर आखिरकार महाराजा रणजीत सिंह की बनाई नीतियो ने कैसे उनके दुश्मनों को धूल चटाई और सिख साम्रज्य का विस्तार करते हुए कैसे अपने जीते जीते एक अभेद किला बनाये रखा.. अपने इस लेख में इसी कहानी को जानेंगे।
कैसे महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब विजय किया – Maharaja Ranjit singh
महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit singh) ने 1799 में लाहौर पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद उन्होंने 1801 में अमृतसर पर विजय प्राप्त की और पहली बार सिख सम्राज्य की स्थापना की.. हालांकि तब तक अंग्रेजी हुकूमत बंगाल, मगध, समेत बाकि के भारत में अपना दबदबा कायम कर चुकी थी, लेकिन वहीं दूसरी तरफ सतलुज के इस पास महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit singh) ने अपने राज्य को मजबूत बनाने के लिए कश्मीर, पेशावर, सरहिंद, तिब्बत के कुछ क्षेत्र समेत अफगानिस्तान के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया था। महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit singh) वैसे तो सिख थे लेकिन वो सभी धर्मो का सम्मान करते थे, जिससे उनके काफिले में केवल सिख ही नहीं बल्कि हिंदू और मुसलमान भी शामिल हो गए। उनकी युद्ध नीति और बहादुर जाबांजो की बदौलत महाराजा रणजीत सिंह ने भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा को बाहरी आक्रमणकारियो से सुरक्षित कर लिया था।
सदा कौर महाराजा की राजनीति में सबसे मजबूत मार्गदर्शक – Maharaja Ranjit singh
साल 1799 में महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit singh) की सास सदा कौर जो कि कन्हैया मिसल की प्रमुख थी.. और महाराजा की पत्नी मेहताब कौर की मां भी थी, के समर्थन से उनकी 25000 सिख सैनिकों के साथ मिलकर भंगी मिसलो को हरा कर पहली बार लाहौर पर कब्जा किया। सदा कौर महाराजा की राजनीति में सबसे मजबूत मार्गदर्शक भी थी। जिसके बाद वो अमृतसर आ गए.. धीरे धीरे उन्होंने कई ऐसी नीतियो अपनाई जिससे हर धर्म के लोग उन्हें पसंद करने लगे थे। उनका दरबार खालसा दरबार कहलाता था, और उनकी सिख ख़ालसा सेना” को फौज ए खास कहा जाता था, जिन्हे महाराजा ने फ्रांसीसी आधिकारियों की छत्रछाया में आधुनिक यूरोपियन तर्ज पर प्रशिक्षित किया था, जो आसानी से अंग्रेजी सेना को धूल चटा सकते थे। महाराजा ने अपने पूरे जीवन में करीब 20 युद्ध लड़े थे जिसमें वो एक भी नहीं हारे।
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अफगानो को हराकर मुल्तान में सिख सम्राज्य स्थापित – Maharaja Ranjit singh
राज्य विस्तार के दौरान उन्हें सबसे ज्यादा अफगानो ने तंग किया..बस फिर क्या था, उनका परमानेंट इलाज करने के लिए महाराजा ने खरक सिंह और मिस्त्र दीवान चंद के साथ मिलकर मुल्तान में शासन कर रहे अफगानी गवर्नर मुजफ्फर खान को हराकर मुल्तान में सिख सम्राज्य स्थापित किया। लेकिन महाराजा यहीं नहीं रूके..अफगानों के बीच पड़ी दरार और सत्ता पाने की उनकी आपसी लड़ाई का फायदा भी महाराजा को हुआ और उन्होंने 1819 में शोपियन में अफगानो के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.. जिसका नतीजा ये हुआ कि अफगानो को कश्मीर और झेलम घाटी से पीठे हटना पड़ा और महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit singh) के हाथों में कश्मीर भी आ गया। जिसके बाद महाराजा की नजर पेशावर पर थी, जहां अफगान काफी मजबूत थे।
बहादुर सेनापति हरि सिंह नलवा – Maharaja Ranjit singh
लेकिन महाराजा को अफगानों के हमले का डर हमेशा रहता था, इसलिए महाराजा ने अपने सबसे बहादुर सेनापति हरि सिंह नलवा को अफगानों को पेशावर से पूरी तरह से खदेड़ने का आदेश दिया.. हरि सिंह नलवा ने महाराजा की आज्ञा मान कर अफगानो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.. और 1823 से लेकर 1834 तक हरि सिंह नलवा पेशावर इलाके में ही लड़ते रहे.. लेकिन उन्होंने पेशावर से पूरी तरह से अफहानों का सफाया कर दिया और पेशावर सिख सम्राज्य का हिस्सा बन गया।
आज मुल्तान, पेशावर समेत कुछ हिस्सा कश्मीर का पाकिस्तान के पास है, लेकिन एक समय ऐसा था जब यहां महाराजा रणजीत सिंह का एकछत्र राज था। अगर महाराजा ने अफगानों को न खदेड़ा होता तो शायद ये कभी भारत का हिस्सा ही न होते। भले ही आज ये पंजाब का हिस्सा न हो, लेकिन तब भी ये हमेशा पंजाब का ही टूटा हुआ हिस्सा कहलायेगा। महाराजा रणजीत सिंह शायद इसीलिए सबसे महान औऱ साहसी सिख शासक कहलाये। आपको ये जानकारी कैसे लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।




























