50 हजार का इलाज, 17 लाख का बिल और मौत! Kanchan Gupta की खौफनाक कहानी सुनकर कांप जाएगी रूह!

Rajni | Nedrick News Lucknow Published: 25 Jun 2026, 06:09 AM | Updated: 25 Jun 2026, 06:09 AM

Kanchan Gupta: किसी को क्या पता था कि लखनऊ के अपोलो अस्पताल (Lucknow Apollo Hospital) में मुस्कुराते हुए ली गई यह तस्वीर कंचन गुप्ता (Kanchan Gupta) की आखिरी तस्वीर बन जाएगी। महज पित्त की थैली (Gallbladder) की पथरी का सामान्य सा ऑपरेशन कराने आईं कंचन ने 30 दिनों तक अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत का खौफनाक दर्द झेला। पीड़ित परिवार का आरोप है कि डॉक्टरों की कथित लापरवाही और इलाज के नाम पर हुए कुप्रबंधन के कारण कंचन की जान चली गई।

क्या यही है हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था, जहां मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं है? जब पूर्व पार्षद कंचन गुप्ता जैसी रसूखदार महिला के साथ अस्पताल में ऐसी लापरवाही हो सकती है, तो आम जनता का क्या होगा? आखिर उस दिन अस्पताल के भीतर ऐसा क्या हुआ जिसने हंसती-खेलती कंचन गुप्ता को मौत के मुंह में धकेल दिया? कंचन के पति पुनीत गुप्ता ने जो आंखों देखी दास्तान बताई है, वो रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

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क्या है पूरा मामला?

@Mithileshdhar के अनुसार बताया जा रहा है कि कन्नौज की रहने वाली कंचन गुप्ता (Kanchan Gupta) भाजपा की पूर्व पार्षद रह चुकी हैं। उनके पति पुनीत गुप्ता भी भाजपा से जुड़े हैं। पुनीत गुप्ता के अनुसार, कुछ समय पहले कंचन के पेट में तेज दर्द उठा था। स्थानीय स्तर पर जांच कराने पर पता चला कि पित्त की थैली की जगह पर पथरी है, जिसके लिए डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी। एक परिचित के सुझाव पर पुनीत अपनी पत्नी को लेकर लखनऊ के प्रतिष्ठित अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल पहुंचे।

50,000 का खर्च और वो ‘आखिरी सेल्फी’

अस्पताल में शुरुआती जांचों के बाद डॉक्टरों ने ऑपरेशन का अनुमानित खर्च करीब 50 हजार रुपये बताया। इसके बाद 21 अप्रैल को ऑपरेशन की तारीख तय की गई। इसी दिन कंचन गुप्ता को अस्पताल में एडमिट किया गया। अस्पताल के बेड पर बैठकर उन्होंने जो सेल्फी ली थी, वह उनकी आखिरी तस्वीर साबित हुई।

एक एंडोस्कोपी और बिखर गईं सांसें

परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले डॉक्टरों ने अंदरूनी जांच के लिए कंचन (Kanchan Gupta) की एंडोस्कोपी (Endoscopy) करने का फैसला किया। आरोप है कि इसी प्रक्रिया के दौरान भारी लापरवाही बरती गई, जिससे कंचन गुप्ता की भोजन नली (Food Pipe) और आंत गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त (रप्चर) हो गईं। इसके कारण शरीर के अंदरूनी हिस्से में भारी ब्लीडिंग और इंफेक्शन (Sepsis) फैल गया।

30 दिनों का दर्द और उठते सवाल

पुनीत गुप्ता के आरोपों के अनुसार, अपोलो अस्पताल के भीतर कंचन गुप्ता के साथ दिन-ब-दिन लापरवाही का जो दौर चला, वह कुछ इस प्रकार था:

  • पहला दिन (भर्ती): अस्पताल के डॉक्टर शुरुआती जांच में ही सही बीमारी और स्थिति को नहीं पकड़ पाए।
  • दूसरा दिन (एंडोस्कोपी की बड़ी चूक): कंचन (Kanchan Gupta) की एंडोस्कोपी की गई। आरोप है कि इसी दौरान उनकी आंत में कट (कट लग जाना) लग गया। इसके बावजूद बिना किसी सीटी स्कैन या सुधारात्मक ऑपरेशन के उन्हें सीधे जनरल वार्ड में भर्ती कर दिया गया।
  • तीसरा दिन (इन्फेक्शन की शुरुआत): शरीर के अंदरूनी हिस्से में इन्फेक्शन (Sepsis) फैलने लगा। कंचन बेइंतहा दर्द से तड़पती रहीं। हालत बिगड़ने पर आखिरकार सीटी स्कैन हुआ, पेट में ड्रेन नली डाली गई और उन्हें आनंद-फानन में आईसीयू (ICU) में शिफ्ट किया गया।
  • चौथा दिन (अंधेरे में परिवार): मरीज पूरे दिन गंभीर हालत में आईसीयू में रहा, लेकिन अस्पताल प्रशासन ने पीड़ित परिवार को मरीज की स्थिति के बारे में कोई सटीक अपडेट नहीं दिया।
  • पांचवां दिन (गलत स्टेंट): परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने पहले दिन जो गलत स्टेंट डाला था, उसे निकाला गया और उसकी जगह एक बड़ा मेटल स्टेंट डाला गया। इसके बाद अगले तीन दिनों (छठे से सातवें दिन) तक मरीज को इसी स्थिति में रखा गया।
  • आठवां दिन (बड़ा ऑपरेशन): कंचन की स्थिति और नाजुक हो गई। रात में पेट का एक बड़ा ऑपरेशन करना पड़ा ताकि अंदर फैला इन्फेक्टेड फ्लूइड निकाला जा सके। इसके लिए पेट में 5 अलग-अलग जगहों पर ड्रेनेज नली लगाई गई और लिक्विड फूड देने के लिए सीधे आंत से जुड़ी एक फूड पाइप (फीडिंग ट्यूब) डाली गई।
  • 13वां दिन (लापरवाही और पैसों की मांग): कंचन की एक नस से फ्लूइड बैग में शुद्ध खून (Pure Blood) आने लगा। इस गंभीर ब्लीडिंग को रोकने के लिए एंजियोग्राफी करके नस को ब्लॉक किया गया। इसके तुरंत बाद डॉक्टरों ने कहा, “मरीज की हालत खराब है, 3 लाख और जमा करिए।” पुनीत ने किसी तरह पैसों का इंतजाम किया। इसके बाद डॉक्टरों ने नया बम फोड़ा कि अब रोज का खर्च 1 से 5 लाख आएगा।
  • 15वां दिन (अस्पताल के हाथ खड़े): डॉक्टरों ने परिजनों से अचानक कह दिया, “इन्हें कहीं और ले जाइए।” पुनीत और उनका परिवार घबरा गया कि इस नाजुक स्थिति में मरीज को कहां लेकर जाएं? इसके बावजूद अस्पताल ने 4 लाख और जमा कराने का दबाव बनाया। पुनीत ने कर्ज लेकर यह रकम भी जमा की। अब तक वह 7 लाख से ज्यादा कैश जमा कर चुके थे और कुल बिल 17 लाख तक पहुंच चुका था—जबकि शुरुआत में ऑपरेशन का खर्च महज 50,000 बताया गया था।
  • 16वां दिन (रेफर का खेल): अस्पताल प्रशासन ने कंचन को यह कहकर रेफर कर दिया कि “हमने पीजीआई (PGI) में डॉक्टरों से बात कर ली है, आप इन्हें वहां ले जाइए।”
  • 17वें से 30वां दिन (पीजीआई में अंतिम संघर्ष): पीजीआई लखनऊ में कंचन को लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। अपोलो अस्पताल में हुए इन्फेक्शन और अंगों के क्षतिग्रस्त होने का असर दिखने लगा था। धीरे-धीरे Kanchan Gupta के हार्ट, लीवर, लंग्स, किडनी और पैनक्रियाज (मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर) ने काम करना बंद कर दिया।
  • 20 मई (आखिरी सांस): अंदरूनी अंगों के फटने के बाद कंचन की हालत लगातार बिगड़ती चली गई और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन अपनी कथित गलतियों को छुपाता रहा और मरीज लगातार दर्द से तड़पती रही। आखिरकार, 30 दिनों के लंबे और दर्दनाक संघर्ष के बाद कंचन गुप्ता की 20 मई को मृत्यु हो गई।

लूट की इंतहा और न्याय की गुहार

पीड़ित पति पुनीत गुप्ता का आरोप है कि इलाज में इतनी बड़ी जानलेवा लापरवाही बरतने के बावजूद अस्पताल प्रशासन भारी-भरकम बिल वसूलता रहा। कंचन गुप्ता (Kanchan Gupta) तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, लेकिन उनके पीछे छूटा यह मामला हमारी पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है। एक हंसता-खेलता परिवार आज न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है। सवाल वही है—क्या चंद रुपयों और लापरवाही की भेंट चढ़ती मासूम जिंदगियों का यह सिलसिला कभी थमेगा?

Rajni

rajni@nedricknews.com

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