Silent Village India: भारत के गांव अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, संस्कृति और सादगी के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं। कहीं हरे-भरे खेत लोगों का मन मोह लेते हैं तो कहीं पहाड़ों के बीच बसे छोटे-छोटे गांव किसी स्वर्ग से कम नहीं लगते। आमतौर पर गांवों की सुबह पक्षियों की चहचहाहट और बच्चों की खिलखिलाहट से शुरू होती है, लेकिन भारत में एक ऐसा गांव भी है जहां चारों ओर अजीब सी खामोशी पसरी रहती है। यहां न बच्चों की आवाज सुनाई देती है और न ही लोगों की सामान्य बातचीत। यही वजह है कि इस गांव को लोग ‘साइलेंट विलेज’ (Silent Village) के नाम से जानते हैं।
यह गांव जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की गंडोह तहसील के भालेसा क्षेत्र में स्थित डडकई (Dhadkai/Dadkai) है। प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह गांव जितना खूबसूरत है, उसकी कहानी उतनी ही भावुक और हैरान करने वाली भी है।
पहाड़ों के बीच बसा है यह अनोखा गांव| Silent Village India
डडकई गांव ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ है। ठंडी हवाएं और शांत वातावरण इसे बेहद आकर्षक बनाते हैं। यह गांव मिनी कश्मीर के नाम से मशहूर भद्रवाह से करीब 105 किलोमीटर दूर स्थित है। देखने में यह किसी पर्यटन स्थल जैसा लगता है, लेकिन यहां रहने वाले लोगों की जिंदगी एक बड़ी चुनौती से जुड़ी हुई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार गांव में करीब 105 परिवार रहते हैं। इनमें आधे से अधिक लोग जन्म से ही सुनने और बोलने में असमर्थ हैं। खासकर बच्चों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है, जिसके कारण पूरे गांव का माहौल बाकी जगहों से बिल्कुल अलग नजर आता है।
क्यों कहा जाता है ‘साइलेंट विलेज’?
डडकई में रहने वाले कई लोग अपनी बात इशारों के जरिए समझाते हैं। यहां सामान्य बातचीत बहुत कम सुनाई देती है और बच्चों की चहल-पहल भी लगभग नहीं के बराबर होती है। इसी वजह से लोगों ने इसे ‘साइलेंट विलेज’ कहना शुरू कर दिया। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यहां गूंगे और बहरे बच्चों के जन्म के मामले कई दशकों से सामने आते रहे हैं। बताया जाता है कि इस समस्या का पहला रिकॉर्ड वर्ष 1901 में दर्ज किया गया था। उसके बाद समय के साथ ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती चली गई।
वैज्ञानिक क्या मानते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या के पीछे मुख्य वजह अनुवांशिक (Genetic) हो सकती है। उनका कहना है कि एक ही समुदाय या करीबी रिश्तों में लंबे समय तक शादियां होने के कारण यह आनुवंशिक समस्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती गई। हालांकि गांव के कुछ लोग इसे किसी अभिशाप या स्थानीय मान्यता से भी जोड़कर देखते हैं। गांव में इस विषय को लेकर कई तरह की कहानियां और मान्यताएं प्रचलित हैं, जिन पर स्थानीय लोग आज भी विश्वास करते हैं। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अब तक इसे आनुवंशिक कारणों से जोड़कर देखा जाता है।
सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है असर
इस समस्या का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव के सामाजिक जीवन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। जिन परिवारों में गूंगे और बहरे सदस्य हैं, वहां रिश्ते करने से कई लोग हिचकिचाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर लगातार चिंता में रहते हैं। कई परिवार बेहतर इलाज और भविष्य की उम्मीद में गांव छोड़कर दूसरे शहरों और राज्यों में भी बस चुके हैं। इसके बावजूद गांव के अधिकांश लोग तमाम कठिनाइयों के बीच सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं।
सेना बनी गांव की उम्मीद
डडकई गांव की स्थिति को देखते हुए भारतीय सेना की राष्ट्रीय राइफल्स ने इस गांव को गोद लिया है। सेना यहां रहने वाले लोगों की मदद के लिए लगातार काम कर रही है। बच्चों के लिए विशेष शिक्षा की व्यवस्था की गई है और उन्हें साइन लैंग्वेज सिखाने के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है, ताकि वे बेहतर तरीके से संवाद कर सकें। इसके अलावा गांव में स्वास्थ्य सेवाओं, भोजन, कपड़ों और अन्य जरूरी सुविधाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
































