Subhash Chandra Bose in Germany: हिटलर की सेना में सिख योद्धा? इतिहास का वो काला पन्ना जिसे भुला दिया गया

Shikha Mishra | Nedrick News Germany Published: 12 मार्च 2026, 11:41 पूर्वाह्न | Updated: 12 मार्च 2026, 11:44 पूर्वाह्न

Subhash Chandra Bose in Germany: जब भारत ब्रिटेन का गुलाम था उस वक्त ब्रिटेन ने भारतीयों का ही इस्तेमाल करके उनका शोषण किया था, लगभग पूरे भारत में उनका शासन था, लेकिन बावजूद इसके केवल एक शख्स था जिन्होंने अंग्रेजी हुकुमत के नाक में दम कर दिया था। तमाम कोशिशो के बाद भी वो कभी अंग्रेजो के हाथ नहीं लगे थे, जी हां हम बात कर रहे है नेताजी सुभाष चंद्र बोस की.. जिन्होंने आजाद हिंद फौज बनाई थी, ये बोस ही थे जिन्होंने अंग्रेजी हुकुमत से आजादी के नाजी के क्रूर शासक हिटलर से भी हाथ मिलाया था, और उन्हें अपने सेना के कुछ जवान भी दिये थे, जिसमें ज्यादातर सिख जवान ही थे।

सिख जवानो ने हिटलर को जिताने और सुभाष चंद्र बोस की साख करने के लिए अपनी शहादत दे दी.. हालांकि दुख की बात ये है कि इन सिपाहियों के बारे अब चर्चा भी नहीं की जाती है। अपने इस लेख में हम हिटलर की नाजी सेना में मौजूद उन सिख जवानो की शहादत और उनके सुभाष चंद्र बोस के प्रति निष्ठा की कहानी को जानेगें।

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भारत के बाहर इंडियन नेशनल आर्मी

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी का शासक हिटलर ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था। वहीं दूसरी तरफ सुभाष चंद्र बोस ने भी अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए 1942 में आजाद हिंद फौज गटन किया जिसमें करीब 40 हजार भारतीय पुरुष और महिलायें शामिल थी, इसमें हिंदू, मुसलमान और सिख तीनो धर्मो के सिपाही थे। इसे भारत के बाहर इंडियन नेशनल आर्मी कहा गया। इस फौज को तैयार करने में जापान में युद्धबंदियों को आजाद किया गया और वो बोस की इस लड़ाई का हिस्सा बन गए।

लीजन फ्रीज इंडियंस- दरअसल हिटलर ने भारतीय युद्ध बंदियों का सही इस्तेमाल करते हुए लीजन फ्रीज इंडियन इकाई की शुरुआत नाजी सेना के अंतर्गत की थी। जिसमें सिख सैनिक भी शामिल थे। लीजन में शामिल हुए युद्धबंदियों ने भी नाजी सेना का साथ केवल इसी लिये दिया ताकि उन्हें ब्रिटेश की कैद से मुक्ति मिल सके। इसे बनाने में बोस का बड़ा योगदान था।  युद्धबंदियो में लगभग सभी ब्रिटिश सेना के वो जवान थे जिन्हें युद्ध में हारने के दौरान बंदी बना लिया गया था, और उनके छूटने के कोई चांसेस नहीं थे।

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सिख सैनिको ने नाजी सेना जॉइन किया

ऐसे में जब कैद भारतीय सिपाहियों को आजाद हिंद फौज और लीजन फ्रीज इंडियंस से जुड़ने का मौका मिला तो उन्होंने इसे देख के लिए कुछ कर दिखाने का बेहतर अवसर समझा। हालांकि सिख सैनिको ने नाजी सेना को केवल इसी एक उद्देश्य से जॉइन किया था, वो लोग कभी भी नाजिवादी विचारधारा का समर्थन नहीं करते थे। वहीं ब्रिटिश सेना से उन लोगो युद्ध किया बिना किसी विशेष पहचान के। कहा जाता है कि कई सिख सैनिक थे नाजी सेना में क्योंकि सिख रैजीमेंट न होते हुए भी नाजी सेना में सिख सैनिक पगड़ी पहन कर अपनी संस्कृति और परंपरा को मानते थे लेकिन वर्दी ये हिटलर की सेना की ही पहनते थे।

सुभाष चंद्र बोस ने हिटलर से मुलाकात की

29 मई 1942 को सुभाष चंद्र बोस ने हिटलर से मुलाकात की  थी, जहां बोस ने हिटलर से भारत में प्रवेश के लिए पऩडुब्बी की सहायता मांगी थी, बदले में उन्होंने आजाद हिंद फौज के सिपाहियो को नाजी सेना में मदद के लिए देने का वादा किया था, हालांकि दोनो के बीच कोई ऑफिशियल संधि नहीं हुई थी,  लेकिन दोनो की मुलाकात के बाद जो फैसला लिया गया था उसके बाद ये तो तय हो गया दोनो के रिश्ते बेहतर है। ये केवल एक रणनीतिक गठबंधन था, जिसका उद्देश्य केवल ब्रिटेन को कमजोर करना मात्र था। इसके लिए नेताजी ने नाजियो के कैद में रह रहे भारतीय युद्धबंदियों को भी रिहा कर देने की बात कही थी।

जब आप दूसरे विश्वयुद्ध के इतिहास को जानते है ते समझ पाते है कि ब्रिटेन की तरफ से सैनिकों का बलि दी गई.. जिसमें सिख सैनिको को बहुत अधिकारि मात्रा में धकेला गया । युद्ध के दैरान शहीद होने वाला केवल शहीद होता है, लेकिन सिखो की पगड़ी और दाढ़ी ने सिखों  के साहस को नाजियों के बीच और ज्यादा सम्मान दिलाया। नाजी सेना हो या आजाद हिंद फौज दोनो का एक ही मकसद था, ब्रिटेन मुक्त क्षेत्र। इसलिए लिए विदेशी सेना में भी भारतीय ने अपना छाप छोड़ी है। हिटलर कितना क्रूर था वो किसी को बताने की जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी उसने सिख जवानों को सम्मान दिया था।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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